न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३०७
आचार्यास्तु आप्ताभिप्रायो विध्यर्थः'पाकं कुर्याः' इत्यादावाज्ञा-
दिरूपेच्छावाचित्ववल्लिङ्मात्रस्येच्छावाचित्वं लाघवात् । एवं
च 'स्वर्गकामो यजेत'इत्यादौ यागः स्वर्गकामकृतिसाध्यतया-
ऽऽप्तेष्ट इत्यर्थः।
भाषा-आर उदयनाचार्य तो आप्तवक्ताके अभिप्रायको विध्यर्थ मानतेहैं; जैसे
"पाकं कुर्याः" इत्यादि वाक्यमें लिङ्को आज्ञादिरूप इच्छावाचकत्व है, वैसेही
लाघवसे सर्वत्र लिङ्मात्रको इच्छावाचकत्व है. एवं " स्वर्गकामो यजेत " इत्यादि
स्थलमें याग स्वर्गकी कामनावाले पुरुषकी कृतिसाध्यतारूपेण आप्तवक्ताकी इच्छाका
विषय है ऐसा वाक्यार्थबोध होता है.
ततश्चाप्तेष्टत्वेनेष्टसाधनत्वादिकमनुमाय प्रवर्तते । कलञ्जभक्ष-
णादौ तदभावान्न प्रवर्तते ।
भाषा-( ततश्च ) उस बोधानन्तर अधिकारी पुरुषकी आप्त इच्छा विषयत्वरूप
हेतुसे स्वेष्टसाधनताके अनुमानद्वारा यागादि क्रियामें प्रवृत्ति होती है अर्थात् विधि-
वाक्यार्थबोधसे पीछे अधिकारी पुरुष "यागो मम स्वर्गकामस्य बलवदनिष्टाननुबन्धीष्ट-
साधनं मत्कृतिसाध्यतया आप्तेनेष्यमाणत्वात् मन्मात्रकृतिसाध्यतयेष्यमाणमद्भोज-
नवत् " इत्याकारक अनुमानद्वारा यागादिक्रियामें प्रवृत्त होताहै.एवं कलञ्जादिके
भक्षणमें अधिकारी पुरुषको आप्त इष्टत्वाभावप्रयुक्त स्वेष्टसाधनत्वज्ञानकाभी अभाव है
अर्थात् ऐसे स्थलमें ' नञ् ' से निषिध्यमाण आप्ताभिप्रायरूप विध्यर्थ अधिकारीको
स्वेष्टसाधनताका अनुमापकभी नहीं होता.
यस्तु वेदे पौरुषेयत्वं नाभ्युपैति तं प्रति विधिरैव तावद्दर्भ इव
श्रुतिकुमार्याः पुंयोगे मानम् ।
शंका-वेदगत लिङादिद्वारा किसकी इच्छाका बोध होगा ? क्योंकि वह अपौ-
रुषेय वाक्य है,उसका आद्यवक्ता कोई नहीं है.समाधान-जो पुरुष वेदको पौरुषेय
अर्थात् पुरुषप्रणीत नहीं मानता है"तंमति तावत्कुमार्य्याः पुंयोगे गर्भ इव श्रुतिकुमार्य्या
पुंयोगे विधिरेव मानम्-अर्थात् जैसे कुमारीकन्याको गर्भवती देखकर उसके पुरुषसंसर्गका
अनुमान होता है वैसेही वेदवचनोंको विधिगर्भित देखकर पुरुषसंसर्गका अनुमान है.
भाव यह कि-वक्तासे भिन्न इच्छाके बोधनमें विधिका सामर्थ्यही नहीं है इसलिये
विधिवाक्यही वेदोच्चारक ईश्वरमें प्रमाणरूप है.