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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 350 में से

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पृष्ठ 323

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९९
ष्टसाधनताज्ञानादिच्छामात्रं कृतिश्च प्रवृत्तिरूपा बोध्या । तेन
जीवनयोनियतसाध्ये प्राणपञ्चकसञ्चारे न प्रवृत्तिः । इत्थंच प्रव-
र्त्तकत्वानुरोधाद्विधेरपीष्टसाधनतादिकमेवार्थः ।
भाषा-एवं वृष्टिआदि असाध्य कार्योंमें पुरुषको स्वकृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान
नहीं होता; इसलिये वृष्टिमें पुरुषकी चिकीर्षा तथा प्रवृत्ति नहीं होती किंतु केवल इष्ट-
साधनत्वप्रकारक ज्ञानसे "वृष्टिर्भवेत्" इत्याकारक इच्छा मात्र होती है। "कृतिसा-
ध्यताज्ञानं प्रवर्त्तकं" इस कथनमें 'कृति' पदसे प्रवृत्तिरूप कृतिका ग्रहण है; इस-
लिये पुरुषके जीवनका कारणीभूत जो विलक्षण प्रयत्न उस प्रयत्नसाध्य प्राणापानादि
प्राणपञ्चक संचारमें पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं है। (इत्थञ्च) इस पूर्वोक्त विचारसे प्रवृत्तिके
प्रति इष्टसाधनत्वादि ज्ञानको हेतुता सिद्ध हुई तो 'यजेत' इत्यादि विधिवाक्यभी
पुरुषकी प्रवृत्तिके बोधक हैं अर्थात् प्रवर्त्तकत्वानुरोधसे विधिवाक्योंकाभी बलवद्
अनिष्टाननुबन्धीष्टसाधनत्वविशिष्ट कृतिसाध्यत्वरूपही अर्थ मानना उचित है।
इत्थं च 'विश्वजिता यजेत' त्यादौ यत्र फलं न श्रूयते तत्रापि
स्वर्गः फलं कल्प्यते ।
भाषा--(इत्थञ्च) इस रीतिसे 'यजेत' इत्यादि विधिवाक्योंका इष्टसाधनत्वादि-
रूप अर्थ माना तो "विश्वजिता यजेत" इत्यादि जिन वाक्योंमें फलविशेषका श्रवण
नहींहै उन सबमें स्वर्गरूप फलकी कल्पना होसकतीहै.
नन्वहरहः सन्ध्यामुपासीतेत्यादाविष्टानुत्पत्तेः प्रवृत्तिः कथम्, न
चार्थवादिकं ब्रह्मलोकादि प्रत्यवायाभावो वा फलमिति वाच्यम्।
तथा सति काम्यत्वे नित्यत्वहान्यापत्तेः, कामनाभावेऽकरणापत्ते
श्च । इत्थंच यत्र फलश्रुतिस्तत्रार्थवादमात्रमिति चेत् । न ।
शंका-"अहरहः सन्ध्यामुपासीत-अर्थात् द्विजातिपुरुष प्रतिदिन सन्ध्योपासन
करे" इत्यादि विधिवाक्यबोधित सन्ध्यावन्दनादिसे कोई फलविशेष नहींहै; इसलिये
ऐसे स्थलमें इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान प्रवर्त्तक नहीं है और ना ऐसे स्थलमें विधिवा-
क्यका इष्टसाधनत्वादि अर्थ माननाही उचित है; क्योंकि कोई इष्ट उत्पन्न नहीं होता
तौ फिर प्रवृत्ति कैसे होतीहै? यदि कहो कि "सन्ध्यामुपासते ये तु सततं शंसित-
व्रताः॥ विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकं सनातनम् " इत्यादि अर्थवादशास्त्रबोधित
ब्रह्मलोकादि अथवा (प्रत्यवाय) पापोंका विनाश होना सन्ध्यादि नित्यकर्मका फल
है तो इसको नित्यकर्म नहीं कहना चाहिये किन्तु काम्यकर्म कहना चाहिये और