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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

३०२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
सेभी सन्ध्यावन्दनादिका फल प्रतीत होताहै. एवं “ पितृगण हमारे पर प्रेम रक्खें
इस मनोरथसे पुरुष पितृगणके उद्देश्यसे प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक दान किया करे ”
इत्यादिअर्थकवचनबोधित पितृप्रीतिरूपही पितृश्राद्धादि नित्यकर्मका फल है.
न च पितृप्रीतिः कथं फलं व्यधिकरणत्वादिति वाच्यम् । गया-
श्राद्धादाविवोद्देश्यत्वसम्बन्धेनैव फलजनकत्वस्य क्वचित्कल्प-
नात् अतएवोक्तं शास्त्रदर्शितफलमनुष्ठानकर्तरीत्युत्सर्ग इति ।
शंका-क्रियाका फल नियमसे क्रियाके कर्ताहीको हुआ करता है.एवं पितृश्राद्ध-
का पितृप्रेमहीरूप फल नहीं बन सकता क्योंकि क्रियाके साथ उसका सामानाधिकरण
नहीं है अर्थात् श्राद्धक्रियाका कर्ता चैत्र और प्रीतिरूप फल उसके पितृगणमें मानना
अनुभवविरुद्ध है. समाधान-गयाश्राद्धकी तरह कई स्थलोंमें उद्देश्यतासम्बन्धसेभी
फलकी कल्पना होसकती है इसलिये “ शास्त्रबोधित क्रियाका फल अनुष्ठानकर्ताहीको
होताहै ” इस प्रवादको मीमांसक लोगोंने ( उत्सर्ग ) प्रायो वाद माना है अर्थात्
अनुष्ठानकर्ताको तो होताही है, परन्तु जहां जिसके उद्देशसे क्रिया करी जावे वहां
उसकोभी फल अवश्य होताहै.
पितॄणां मुक्तत्वे तु स्वस्य स्वर्गफलम्,यावन्नित्यनैमित्तिकानुष्ठा-
नस्य सामान्यतः स्वर्गफलकल्पनात् । पण्डापूर्वार्थं प्रवृत्तिश्च न
सम्भवति । न हि तत्सुखदुःखाभाववत् स्वतः पुरुषार्थो न वा
तत्साधनं प्रत्यवायानुत्पत्तौ कथं प्रवृत्तिरिति चेत् ।
भाषा-और जिन पितृगणके निमित्त श्राद्धादिक्रिया करीहै यदि वे मुक्त होगए हों
तो उसक्रियाकाभी स्वर्गादिफल क्रियानुष्ठानकर्ताहीको होताहै,क्योंकि यावत् नित्यनै-
मित्तिकविहित अनुष्ठानको सामान्यरूपसे स्वर्गफलजनकता शास्त्रसिद्ध है और
फलविशेषानाधायक पण्डापूर्वके उद्देश्यसे तो पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं होसकती, क्योंकि
पुरुषकी प्रवृत्तिका उद्देश्य सुख है या दुःखाभाव है या इन दोनोंके साधन हैं और
पण्डापूर्व स्वयं सुखरूप नहीं है तथा दुःखाभावरूप नहीं है तथा इन दोनोंका साध-
नभी नहीं है.शंका-आपने पूर्वनित्यकर्मका फल प्रत्यवायाभाव माना है वह प्रत्यवा-
याभावभी पण्डापूर्वकी तरह स्वयं सुख नहीं, दुःखाभाव नहीं और इन दोनोंका साध-
नभी नहीं तो उसके उद्देश्यसे सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्ममें प्रवृत्तिका कैसे सम्भव
होसकताहै?
इत्थम् । यथा हि नित्ये कृते प्रत्यवायाभावस्तिष्ठति तदभावे
तदभावः । एवं प्रत्यवायाभावस्य सत्त्वे दुःखप्रागभावसत्त्वं तद-