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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 350 में से

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पृष्ठ 315

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९१
भाषा-एक फलविषयीणी, दूसरी उपायविषयीणी, इस भेदसे इच्छा दोप्रकार-
की है. सुख तथा दुःखाभाव ये दोनों फल हैं. उन दोनों इच्छाओंमें फलइच्छाके
प्रति फलज्ञान कारण है; इसीलिये वह फल स्वतः पुरुषार्थरूप है; क्योंकि-जो ज्ञात
हुआ स्ववृत्तितया वांछित होय अर्थात् स्वविषयक ज्ञानजन्य इच्छाके विषय होय वह
पुरुषार्थ है, यही पुरुषार्थका लक्षण है. फलितार्थ यह कि--जो इतर इच्छाधीन इच्छाके
विषय नहीं है,वह स्वतः पुरुषार्थ है. एवं उपायमें पुरुषार्थता वारण हुई. यदि इष्टसा-
नताज्ञान होय तो जीवको फलसाधक उपायविषयीणी इच्छाभी होती है ॥ १४६ ॥
चिकीर्षा कृतिसाध्यत्वप्रकारेच्छा च या भवेत् ।
तद्धेतुः कृतिसाध्येष्टसाधनत्वमतिर्भवेत् ॥ १४७ ॥
भाषा-कृतिसाध्यत्वप्रकारका इच्छाका नाम चिकीर्षा है. कृतिसाध्यत्वप्रकारक
ज्ञान तथा इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान चिकीर्षाके कारण है ॥ १४७ ॥
चिकीर्षेति । कृतिसाध्यत्वप्रकारिका कृतिसाध्यविषयिणीच्छा
चिकीर्षा । पाकं कृत्या साधयामीति तदनुभवात् । चिकीर्षां
प्रति कृतिसाध्यताज्ञानमिष्टसाधनताज्ञानं च कारणम् । अत
एव वृष्ट्यां कृतिसाध्यताज्ञानाभावान्न चिकीर्षा ॥ १४७ ॥
भाषा-कृतिसाध्यत्वप्रकारिका कृतिसाध्य पदार्थविषयीणी इच्छाका नाम 'चिकीर्षा'
है 'पाकं कृत्या साधयामि' यह कृतिसाध्यविषयीणी इच्छाका परिचायक अनुभव
है. “ इदं मत्कृतिसाध्यम् ” इत्याकारक कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान तथा “ इदं
मदिष्टसाधनम् ” इत्याकारक इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान उक्तचिकीर्षाके निमित्तकारण
हैं. चिकीर्षामें कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानकोभी हेतुता है(अत एव) इसीलिये पुरुषकी
वृष्टिमें चिकीर्षा नहीं होती; क्योंकि वृष्टिमें पुरुषका कृतिसाध्यत्वप्रकारकज्ञान नहींहै.
भाव यह कि- सर्वत्र उभयप्रकारक ज्ञानही चिकीर्षाका जनक है.अन्यतरके न होनेसे
चिकीर्षा नहीं होती ॥ १४७ ॥
बलवद्विष्टहेतुत्वमतिः स्यात्प्रतिबन्धिका ॥
भाषा-अत्यन्त (द्विष्ट) द्वेषका विषय जो दुःख उस दुःखके साधन सर्पादिका
ज्ञान उक्तचिकीर्षाका प्रतिबन्धक है.
बलवदिति। बलवद्विष्टसाधनताज्ञानं तत्र प्रतिबन्धकमतो मधुविष-
संपृक्तान्नभोजने न चिकीर्षा । बलवद्द्वेषः प्रतिबन्धक इत्यन्ये ।