न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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जब पुरुषको ब्रह्मलोक गमनकी या पापनिवारणकी कामना न होय तो पुरुषको यह
सन्ध्यावन्दनादि कर्म करनाभी नहीं चाहिये ( इत्यञ्च ) इस रीतिसे जहां नित्यकर्म-
का अर्थवादादिवाक्योंसे फलश्रवण है वहां अर्थवादवाक्यका केवल नित्यकर्मकी
प्रशंसा में तात्पर्य कल्पना करनाही उचित है. एवं सन्ध्यावन्दनादिकरणमें पुरुषकी
कैसे प्रवृत्ति है ?
ग्रहणश्राद्धादौ नित्यत्वनैमित्तिकत्वयोरिव ( भरणीश्राद्धे काम्य-
त्वनैमित्तिकत्वयोरिव, ) नित्यत्वकाम्यत्वयोरप्यविरोधात् ।
समाधान-ग्रहणकालिक श्राद्धादिकर्ममें जैसे मीमांसक लोगोंने नित्यत्व तथा
नैमित्तिकत्व उभय धर्म मानेंहैं अर्थात् ग्रहणकालिक श्राद्धादि कर्मको जैसे नित्यकर्मभी
मानाहै और नैमित्तिकभी मानाहै एवं भरणीनक्षत्रकालिक श्राद्धको जैसे काम्यकर्म
मानाहै और नैमित्तिकभी मानाहै वैसेही संध्यावन्दनादिकोभी नित्यकर्म मानके
काम्यकर्मभी मानलिया जाय तो नित्यत्व तथा काम्यत्वरूप धर्मद्वयका परस्पर
विरोध नहीं है.
न च कामनाभावेऽकरणापत्तिः । त्रिकालस्तवपाठादाविव
कामनासद्भावस्यैव कल्पनात् ।
शंका-यदि पुरुषको कुछ कामना न होय तो सन्ध्यादि नित्यकर्म नहींभी
करने चाहिये. समाधान-त्रिकाल स्तुतिपाठादिकी तरह सन्ध्यावन्दनादिमेंभी
कामनासद्भाव रहताही है अर्थात् जैसे विष्णुसहस्रनामस्तोत्रादि पाठ विधिविहित काम्य
कर्म नहींभी है तौभी फलकामनासे पुरुषोंकी स्तोत्रपाठोंमें प्रवृत्ति होती है वैसेही
सन्ध्यावन्दनादि कर्म्मस्थलमेंभी फलकामना अवश्य रहतीही है.
ननु वेदबोधितकार्यताज्ञानात्प्रवृत्तिः सम्भवतीति चेत् । न ।
१ यहां यह भाव है कि-नित्यश्राद्ध अग्निष्वात्ताआदि षड्दैवत होताहै और ग्रहणादि नैमि-
त्तिकभी पूर्वोक्त षड्दैवतही होताहै. एवं ग्रहणादिविशेषकालमें एकरूपसे श्राद्धरूप कर्मद्वयकी
प्राप्ति हुई तो “नित्यश्राद्धं न कुर्वीत प्रसङ्गाद्यत्र सिद्ध्यति ॥ श्राद्धान्तरे कृतेऽन्यत्र नित्यत्वासन्न
हापयेत्” ॥१॥ इस मात्स्यवचनसे नित्यत्व तथा नैमित्तिकत्वरूप धर्मद्वयका समावेश एकही
क्रियामें जैसे प्राप्त होताहै ॥ ॥ एवं “ भरणी पितृपक्षे तु महती परिकीर्तिता ॥ अस्यां श्राद्धं
कृतं येन स गयाश्राद्धकृद्भवेत् ”॥ १ ॥ इस मात्स्यवचनसे भरणीश्राद्धमें नैमित्तिकत्व धर्म
तो स्पष्टही है परन्तु गयाश्राद्धवत् कथनसे उसीमें काम्यत्वधर्मका समावेशभी हुआ; क्योंकि
गयाश्राद्धकरनेवालेको “ उद्धरेत्सप्त गोत्राणि कुलमेकोत्तरं शतम् ” इस वचनसे एकोत्तरशत
कुलोंका उद्धारक लिखा है वैसेही संध्यावन्दनादि कर्मोंमेंभी नित्यत्व तथा काम्यत्वरूप धर्मद्व-
यका समावेश विरुद्ध नहीं है.