न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९३
षको धूमादिजन्य दुःख नियमसे होता है, इसलिये पाकनिर्माणमें द्वेष हुआ चाहिये
तथापि ऐसे स्थलमें “ पाको मदिष्टसाधनम् ” इत्याकारक इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान
उक्त द्वेषका प्रतिबन्धक है; इसीलिये ( नान्तरीयक ) नियमपूर्वक दुःखके जनक
पाकादिकोंमें पुरुषका द्वेष नहीं होता है.
यत्नं निरूपयति, प्रवृत्तिश्चेति-
भाषा-एवं 'प्रवृत्तिश्च' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार प्रयत्नका निरूपण करते हैं-
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च तथा जीवनकारणम् ॥ १४९ ॥
एवं प्रयत्नत्रैविध्यं तान्त्रिकैः परिदर्शितम् ।
भाषा-प्रवृत्ति, निवृत्ति, तथा जीवनकारण ॥ १४९ ॥ भेदसे तीन प्रकारका
प्रयत्न शास्त्रकारोंने निरूपण किया है.
प्रवृत्तिनिवृत्तिजीवनयोनियत्नभेदात् प्रयत्नस्त्रिविध इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् एक प्रवृत्तिरूप प्रयत्न, दूसरा निवृत्तिरूप प्रयत्न, और तीसरा जी-
नकारणप्रयत्न, इस भेदसे प्रयत्न तीन प्रकारका है.
चिकीर्षा कृतिसाध्येष्टसाधनत्वमतिस्तथा ॥ १५०॥
उपादानस्य चाध्यक्षं प्रवृत्तौ जनकं भवेत् ॥
भाषा-उपादेयपदार्थमें कृतिसाध्यविषयिणी इच्छा तथा कृतिसाध्यत्वविशिष्ट
इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान ॥१५०॥ और उपादेयपदार्थके समवायिकारणका साक्षात्कार
ये सभी प्रवृत्तिरूप प्रयत्नके जनक हैं.
चिकीर्षेत्यादि । मधुविषसंपृक्तान्नभोजनादौ बलवदनिष्टानुबन्धि-
त्वेन चिकीर्षाभावान्न प्रवृत्तिरिति भावः । कृतिसाध्यताज्ञाना-
दिवद्वलवदनिष्टाननुबन्धित्वज्ञानमपि स्वतन्त्रान्वयव्यतिरेका-
त्प्रवृत्तौ कारणमित्यपि वदन्ति । कार्यताज्ञानं प्रवर्तकमिति गुरवः।
भाषा-विषमिश्रित मधुर अन्नभोजनमें मरणरूप प्रबल अनिष्टजनकता है इसलिये
वहां चिकीर्षाके न होनेसे प्रवृत्तिभी नहीं होती. यहां कई विद्वान् लोग ऐसेभी कहतेहैं
कि-जैसे कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान तथा इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान प्रवृत्तिमें स्वतंत्र
कारण है; वैसेही बलवदनिष्टाजनकत्वप्रकारक ज्ञानभी अन्वयव्यतिरेकद्वारा
प्रवृत्तिमें स्वतंत्रहीकारण है. यहां ( गुरु ) प्रभाकर कार्यताज्ञानको प्रवर्तक मानते हैं
अर्थात् प्रवृत्तिके प्रति केवल कृतिसाध्यताज्ञानको हेतुता कहते हैं.