न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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बाधित है, इसलिये “देवदत्तो रात्रिभोजी दिवाभुञ्जानत्वे सति पीनत्वात्”इत्याकारक
प्रयोगसे रात्रिभोजनकी सिद्धि होती है. विशेषणतादिसम्बन्धसे अभावका साक्षात्कार
होना अनुभवसिद्ध है इसलिये उसका ग्राहक अनुपलब्धिभी पृथक् प्रमाण नहींहै.
किंचानुपलम्भस्याज्ञातस्य हेतुत्वे ज्ञानाकरणकत्वात् प्रत्य-
क्षत्वं, ज्ञातस्य हेतुत्वे तु तत्राप्यनुपलम्भान्तरापेक्षेत्यनवस्था ।
भाषा-( किञ्च ) अनुपलब्धिको पृथक् प्रमाण माननेवालेसे यह पूँछना चाहिये
कि-जिसको आपने स्वतंत्रप्रमाण माना है वह प्रतियोग्युपलम्भाभाव स्वयं अज्ञात
हुआ अभावका ग्राहक है,किंवा ज्ञात हुआ? यदि अज्ञात हुआ कहो तो ज्ञानाकरणक
ज्ञान होनेसे प्रत्यक्षहीके अन्तर्भूत हुआ और यदि ज्ञात हुआ कहो तो उसमें फिर
अनुपलम्भान्तरकी अपेक्षा होगी क्योंकि उस प्रथम अनुपलम्भके जाननेके लिये कोई
दूसरा अनुपलम्भ अवश्य चाहिये, एवं दूसरेके लिये तीसरा तीसरेके लिये चौथा,
ऐसेही पश्चाद्भाविनी कारणमुखी अनवस्था होगी.
एवं चेष्टापि न प्रमाणान्तरं तस्याः सङ्केतग्राहकशब्दस्मारक-
त्वेन लिप्यादिसमशीलत्वाच्छब्द एवान्तर्भावात् । यत्र तु व्या-
प्यादिग्रहस्तत्रानुमितिरेवेति ॥ १४४ ॥
भाषा-एवं तांत्रिकलोग चेष्टाको पृथक् प्रमाण मानतेहैं सोभी ठीक नहीं; क्योंकि
जैसे ( लिपि ) लिखेहुए अक्षरोंसे वक्तृतात्पर्यके ग्राहक शब्दोंका स्मरण होकर
शाब्दबोध होताहै वैसेही चेष्टाद्वाराभी चेष्टाकारकपुरुषकृतसंकेतग्राहक शब्दोंका स्मरण
होकर शाब्दबोधही होताहै इसलिये चेष्टाकाभी शब्दहीमें अन्तर्भाव है, परन्तु जहां
मूकबधिरादिकोंकी विलक्षण चेष्टाकी क्षुधादिके साथ व्याप्ति गृहीत है वहां “अयं
मूकबधिरो भोजनाभिलाषी मुखप्रसारणादिविलक्षणचेष्टावत्त्वात् ” इत्यादि प्रयोगद्वारा
अनुमितिज्ञानही होता है. यहां यह भाव है कि-कृतसंकेता तथा अकृतसंकेता भेदसे
चेष्टा दोप्रकारकी है; उसमें प्रथमा तो संकेतग्राहक शब्दस्मारका है इसलिये लिपिआ-
दिकी तरह शब्दप्रमाणके अन्तर्भूत है और दूसरी व्याप्तिग्रहणद्वारा अनुमानके
अन्तर्भूत है ॥ १४४ ॥
सुखं निरूपयति, सुखं तु जगतामेवेति-
भाषा-अब ' सुखन्तु ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार सुखका निरूपण करतेहैं-
सुखं तु जगतामेव काम्यं धर्मेण जन्यते ॥
भाषा-संसारमात्रकी कामनाके विषयका नाम 'सुख' है. धर्मसे वह उत्पन्न होताहै.
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