न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९५
प्रवृत्तिके प्रति कारण मानलिये जाँय तो हानि क्या है? समाधान-यदि एकहीसे
निर्वाह होसके तो दोनोंमें कारणता माननेमें व्यर्थ गौरव है.
ननु तन्मतेऽपि मधुविषसंपृक्तान्नभोजने चैत्यवन्दने च प्रवृत्त्या-
पत्तिः कार्यताज्ञानस्य सत्त्वादिति चेत् । न । स्वविशेषणवत्ताप्र-
तिसन्धानजन्यकार्यताज्ञानस्य प्रवर्तकत्वात् ।
शंका-(त्वत्) प्रभाकरके सिद्धान्तमेंभी विषमिश्रित मधुरान्नभोजनमें तथा (चैत्य)
बुद्धप्रतिमादिके वन्दनमें पुरुषकी प्रवृत्ति हुई चाहिये; क्योंकि-प्रवृत्तिका कारणीभूत
“ विषमिश्रितमधुरान्नभोजनं बुद्धप्रतिमावन्दनं वा मत्कृतिसाध्यम् ” इत्याकारक ज्ञान
विद्यमान है. समाधान-हमारे सिद्धान्तमें हरएक कार्यताज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता
नहीं है किन्तु स्वविशेषणवत्ता प्रतिसन्धानजन्य कार्यताज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता है.
यहां ‘ स्व ’ पदसे प्रर्वतमान पुरुषका ग्रहण है; उसका विशेषण काम्यकर्मस्थलमें
कामना है और नित्यकर्मस्थलमें तत्कालिक शौचादि है; एतादृश विशेषणवत्ताका
पुरुषको जब अपनेमें ( प्रतिसन्धान ) ज्ञान होगा उस विशेषणवत्ताज्ञानको लिङ्गवि-
धया कार्यताज्ञानमें हेतुता है. जैसे “ पाको मत्कृतिसाध्यः, मत्कृतिं विनाऽसत्त्वे सति
मदिष्टसाधनत्वात् ”इस अनुमानजन्य कार्यताज्ञान काम्यस्थलमें प्रवृत्तिका कारण है.
एवं “अहं इदानींतनकृतिसाध्यसन्ध्यावन्दनको ब्राह्मणत्वे सति विहितसन्ध्याकालि-
कशौचादिमत्त्वात् ” इस अनुमानजन्य कार्यताज्ञान नित्यस्थलमें प्रवृत्तिका कारणहै.
काम्ये हि यागपाकादौ कामनास्वविशेषणम् । ततश्च बलवदनि-
ष्टाननुबन्धिकाम्यसाधनताज्ञानेन कार्यताज्ञानम् । ततश्च प्रवृ-
त्तिः । तृप्तश्च भोजने न प्रवर्तते तदानीं कामनायाः पुरुषविशे-
षणत्वाभावात् । नित्ये च शौचादिकं पुरुषविशेषणं तेन शौचा-
दिज्ञानाधीनकृतिसाध्यताज्ञानात्तत्र प्रवृत्तिः ।
भाषा-यागपाकादि काम्य कर्म्मस्थलमें कामना ( स्व ) पुरुषका विशेषण है;
उससे प्रबल अनिष्टासम्बन्धि इष्टसाधनता ज्ञानद्वारा कार्यताका ज्ञान होताहै उस
ज्ञानसे प्रवृत्ति होतीहै. तृप्त हुए पुरुषकी भोजनमें प्रवृत्ति नहीं होती. क्योंकि उस
कालमें कामना पुरुषका विशेषणीभूत नहींहै एवं नित्यकर्मस्थलमें शौचादि पुरुषके
विशेषणरूप हैं इसलिये शौचादिज्ञानाधीन कृतिसाध्यत्वप्रकारकज्ञान होताहै. उससे
( तत्र ) नित्यकर्ममें प्रवृत्ति होतीहै.
ननु तदपेक्षया लाघवेन बलवदनिष्टाननुबन्धीष्टसाधनताविषयक-