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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 330

३०६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
समाधान-‘श्येन’ नामक कर्ममें हिंसात्वधर्मके वारणार्थ हम अदृष्टाद्वारकत्वेन
विशेषण देतेहैं अर्थात् ‘अदृष्टाद्वारकं यद्वैरिमरणानुकूलं कर्म तद्हिंसा’ और श्येनकर्म
तो अदृष्टद्वारा शत्रुनाशक है, इसलिये हिंसा नहीं है अदृष्टाद्वारक शत्रुमरणानुकूल
क्रियाहीका नाम हिंसा है. (अतएव) इसीलिये जिस पुरुषने काशीमरणके उद्देश्यसे
शंकरार्चनादि क्रिया करीहै उस क्रियाकोभी हिंसात्व नहींहै.
न च साक्षान्मरणजनकस्यैव हि हिंसात्वं श्येनस्तु न तथा किंतु
तज्जन्यापूर्वमिति वाच्यम्। खड्गाघातेन ब्राह्मणे व्रणपाकपरम्प-
रया मृते हिंसात्वानापत्तेः।
शंका-अदृष्टाद्वारक मरणजनकत्वकी अपेक्षा साक्षात् मरणजनकत्वरूप
क्रियामें विशेषण देनेमें लाघव है अर्थात् साक्षात् मरणजनिका क्रियाका
नाम ‘हिंसा’ है. ऐसे कथनसे शंकरार्चनादि क्रियाका तथा श्येनादिक्रियाकाभी वारण
होसकता है क्योंकि श्येन शंकरार्चनादि क्रिया साक्षात् मरणजनिका नहीं है किन्तु
स्वजन्य अदृष्टद्वारा है. समाधान-साक्षात् मरणजनिका क्रियाका नाम ‘हिंसा’ नहीं
कहसकते, क्योंकि यदि ऐसा होय तो जहां प्रथम अल्प खड्गपरिहारसे ब्राह्मणको
व्रण हुआहै पीछे उसी व्रणपाकद्वारा उस ब्राह्मणका मरण हुआ. वहां वह मरणरूपा
क्रिया हिंसात्मिका नहीं हुई चाहिये; परन्तु उस क्रियाका हिंसात्मक होना अनुभव
सिद्ध है, इसलिये ऐसी हिंसाके संग्रहार्थ तथा श्येनादि क्रियाके वारणार्थ अदृष्टाद्वारक
मरणजनिका क्रियाहीका नाम ‘हिंसा’ कहना उचित है.
केचित्तु श्येनस्य हिंसा फलं न तु मरणम्, तेन श्येनजन्यखड्गाघा-
तादिरूपा हिंसाऽभिचारपदार्थस्तस्य च पापजनकत्वमतः श्येन-
स्य वैधत्वात् पापाजनकत्वेऽप्यग्रिमपापं प्रतिसन्धाय सन्तो न
प्रवर्तन्त इत्याहुः।
भाषा-और कई एक विद्वान् लोग तो यह कहतेहैं कि-‘श्येन’ नामक कर्मका
साक्षात् शत्रुमरणफलक व्यापारही फल है अर्थात् श्येनकर्म अपने कर्ताके शत्रुपर
खड्गाघातादि करवा देताहै. एवं खड्गाघातादि मात्र श्येनक्रियाका फल है किन्तु
शत्रुमरणरूप फल नहीं है. इसलिये श्येनक्रियाजन्य खड्गाघातादिरूपा हिंसाहीका
नाम ‘अभिचार’ है और उसी खड्गाघातादिरूप अभिचार पदार्थको पापजनकता है
अर्थात् श्येनक्रियाको साक्षात् पापजनकता नहींहै. एवं श्येनक्रियाको विधिविहित
होनेसे यद्यपि साक्षात् पापजनकता नहींहै तथापि परम्परा उत्पन्न होनेवाले
भाविपापको चिन्तन कर सत्पुरुष श्येनादिक्रिया करनेमेंभी प्रवृत्त नहीं होते.