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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 350 में से

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पृष्ठ 327

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३०३
भावे तद्भाव इति योगक्षेमसाधारणकारणताया दुःखप्रागभावं
प्रत्यपि सुवचत्वात् । एवमेव प्रायश्चित्तस्यापि दुःखप्रागभाव-
हेतुत्वमिति ।
समाधान-( इत्थम् ) जैसे सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्म करनेवाले पुरुषमें
प्रत्यवायका अभाव रहता है और न करनेवालेमें (तद्भाव) अर्थात् प्रत्यवायाभावका
अभाव प्रत्यवाय रहेगा वैसेही प्रत्यवायाभावकी दुःखप्रागभावके साथ व्याप्ति है अर्थात्
नित्यकर्मद्वारा जिस पुरुषमें प्रत्यवायाभाव रहेगा उसीमें दुःखप्रागभावभी रहेगा और
जिसमें प्रत्यवायाभाव नहीं रहेगा उसमें (तद्भाव) अर्थात् दुःखप्रागभावभी नहीं रहेगा
किन्तु दुःखप्रागभावाभाव अर्थात् दुःखी रहेगा इस रीतिसे योगक्षेम साधारण प्रवृ-
त्तिकारणता दुःखप्रागभावमेंभी बनसकती है एवं प्रायश्चित्तकर्मकोभी योगक्षेम साधार-
णही दुःखप्रागभाव हेतुता है अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक कर्म करणप्रवृत्तिमें उद्देश्य
विधया दुःखप्रागभावही कारण है.
ननु न कलञ्जं भक्षयेदित्यत्र विध्यर्थे कथं नञर्थान्वयः, इष्टसाध-
नत्वाभावस्य कृतिसाध्यत्वाभावस्य च बोधयितुमशक्यत्वाद्वि-
ति चेत् । न ।
शंका—“ न कलञ्जं भक्षयेत् ” इत्यादि विधिवाक्योंमें विध्यर्थ नञर्थका परस्पर
कैसे अन्वय होताहै? क्योंकि आपने पूर्व इष्टसाधनत्वादि विध्यर्थ मानाहै और नञ्का
अभावरूप अर्थ स्पष्टही है. एवं विध्यर्थके साथ यदि नञर्थका अन्वय होय तो “ न
कलञ्जं” इत्यादि वाक्यसे 'कलञ्जभक्षणं पुरुषेष्टसाधनत्वाभाववत् कृतिसाध्यात्वाभावञ्च'
यही बोध होगा सो इसका होना सम्भव नहीं क्योंकि ' कलञ्ज ' नाम शुष्कमांस
विशेषका है उसके भक्षणमें “ कलञ्जभक्षणमिष्टसाधनत्वाभाववत्कृतिसाध्यत्वाभाव-
वच्च ” इत्याकारक बोध बाधित है किन्तु पुरुषको साधारणरूपेण उभयप्रकारक
बोधकलञ्ज भक्षणमें रहताही है इसलिये विध्यर्थके साथ अन्वित हुआ नञर्थ इष्टसाध-
नत्वाभावके तथा कृतिसाध्यत्वाभावके बोधनमें समर्थ नहीं होसकता.
१ अप्राप्तकी प्राप्तिका नाम 'योग' है और प्राप्तके संरक्षणका नाम ' क्षेम ' है. प्रत्यवाया-
भाव स्वतः पुरुषार्थ नहीं,पुरुषार्थसाधनभी नहीं; इसलिये उसमें प्रवृत्तिकारणता प्राप्त न थी परन्तु
दुःखप्रागभावके साथ उसकी व्याप्ति बनाकर उसमें युक्तिसे प्रवृत्तिकारणता प्राप्त करी यही
'योग' है.एवं इष्टसाधनताज्ञानको प्रवृत्तिकारणता सिद्धही थी परन्तु प्रभाकरके कुतर्क जालोंकों
निरासकर उसका संरक्षण किया यही ' क्षेम ' है, इस रीतिसे योगक्षेम साधारण सिद्ध हुई
प्रवृत्तिकारणता दुःखप्रागभावमेंभी सुवच बनसकती है.