न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९७
नैयायिक-(मैवम्) यह कथन आपका युक्त नहीं है; क्योंकि लाघवसे बलवद्
अनिष्टासबन्धि इष्टसाधनत्वविशिष्ट कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानकोही ( तत्र ) प्रवृत्तिमें
कारणता माननी उचित है. एवं साध्यत्व साधनत्व धर्मकाभी परस्पर विरोध नहीं है,
क्योंकि किसीएक कालमें होनेवाले साध्यत्वधर्मका किसी एककालमें होनेवाले साध-
नत्वधर्मके साथ विरोधका होना असम्भव है. भाव यह कि-यद्यपि एककालावच्छेदेन
एक धर्मीमें कृतिसाध्यत्व तथा इष्टसाधनत्वरूप धर्मद्वय विरोधीहैं, तथापि हमको एकका-
लीन कृतिसाध्यत्व इष्टसाधनत्वरूप धर्मके ज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता अपेक्षित नहीं है
किन्तु केवल कृतिसाध्यत्व इष्टसाधनत्वरूप धर्मके ज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता अपेक्षित
है वह धर्मद्वय किंचित् कालभेदसे एकधर्मीमें रहसकते हैं. एवं उनहीको विषय
करनेवाला इष्टसाधनत्वविशिष्ट कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानभी होसकता है और
वही प्रवृत्तिमें कारण है.
नवीनास्तु ममेदं कृतिसाध्यमिति ज्ञानं न प्रवर्तकमनागते तस्य
ज्ञातुमशक्यत्वात्। किंतु यादृशस्य पुंसः कृतिसाध्यं यद्दृष्टं ता-
दृशत्वं स्वस्य प्रतिसन्धाय तत्र प्रवर्तते, तेन 'ओदनकामस्य
तत्साधनताज्ञानवतस्तदुपकरणवतः पाकः कृतिसाध्यस्तादृश-
श्चाहम्' इति प्रतिसन्धाय पाके प्रवृत्तिरित्याहुः। तन्न। स्व-
कल्पितलिप्यादिप्रवृत्तौ यौवने कामोद्भेदादिना सम्भोगादौ च
तदभावात् ।
भाषा-और प्रभाकरके अनुयायी कईएक नवीनलोग तो यह कहतेहैं कि- "इदं
मत्कृतिसाध्यम्" इत्याकारक ज्ञान प्रवृत्तिमें कारणही नहीं है. क्योंकि ( अनागत )
भाविपदार्थमें ( तस्य ) कृतिसाध्यत्वरूप धर्मका ज्ञान होनाही असम्भव है किन्तु
जैसे पुरुषके प्रयत्नसे जिस पदार्थकी सिद्धि जिसने देखी, वह पुरुष अपनेको उस कृत
प्रयत्न पुरुष जैसा मानकर उसी पदार्थकी सिद्धिमें प्रवृत्त होताहै; जैसे पाकमें पुरुषकी
प्रवृत्ति ' ओदनकामस्य ओदनसाधनताज्ञानवतः ओदनोपकरणवतः पाकः कृति-
साध्यः तादृशश्चाहं-अर्थात् ओदनकी कामनावाले तण्डुलादिनिष्ठ ओदनसाधनताज्ञा-
नवाले तथा स्थालीकाष्ठादि ओदनउपकरण सामग्रीवाले पुरुषकी कृतिसे पाकसाध्य
है"और "तादृशश्चाहं-अर्थात् ओदनकामनावान् ओदन साधनताज्ञानवान् तथा ओद-
नोपकरणवान् मैंभी हूं"इत्याकारक ज्ञानद्वारा होती है! ( तन्न ) यह नवीनोंका कथन
सम्यक् नहीं है. क्योंकि अपने संकेतद्वारा कल्पना करी लिपि आदिकी प्रवृत्तिमें तथा
यौवनावस्थामें कामातुर हुए पुरुषकी भोगादि प्रवृत्तिमें उक्तज्ञान नहीं है; अर्थात् "स्व-
२४