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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

२७८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
धर्मभी नहीं बन सकता परन्तु विद्वान् लोगोंने इसकोभी उपाधिरूपसे स्वीकार किया
है यान्ते आपके लक्षणमेंही न्यूनता माननी उचित है; एवं आपके लक्षणानुसार
“ ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात् ” इस अनुमानमें ‘ भावत्व ’ धर्मभी उपाधि नहीं हुआ
चाहिये क्योंकि-यह धर्मभी साध्यका व्यापक नहींहै. देखिये-विनाशित्त्वरूप साध्य
तो प्रागभावमेंभी है परन्तु वहां 'भावत्व' रूप उपाधि नहींहै.एवं भावत्वधर्म साध्यका
व्यापक न होनेसे आपके उपाधिलक्षणका लक्ष्यभी नहीं हो सकता परन्तु विद्वान्
लोग इस धर्मकोभी प्रकृतमें उपाधिरूपसे स्वीकार करतेहैं; इसलिये आपके लक्षणमेंही
न्यूनता माननी उचित है.
यद्धर्मावच्छिन्नसाध्यव्यापकत्वं तद्धर्मावच्छिन्नसाधनाव्यापकत्व-
मित्यर्थे तात्पर्यात् । १ ।
समा०-हमारे मूलोक्त “ साध्यस्य व्यापको यस्तु ” इत्यादि ग्रन्थका यह
तात्पर्य्य है कि-उपाधिरूप धर्म यद्धर्मावच्छिन्नसाध्यका व्यापक होय तद्धर्माव-
च्छिन्न साधनका अव्यापक होना चाहिये अर्थात् यादृश धर्मविशिष्ट साध्यके साथ
उपाधिका सहचार होय तादृश धर्मविशिष्ट हेतुके साथ अवश्य व्यभिचार होना
चाहिये. एवं यह लक्षण यावद् उपाधिस्थलमें अनुगत है. प्रथम “ धूमवान् वह्नेः ”
इस स्थलमें 'आर्द्रेन्धनसंयोग' को देखिये.यहां यद्धर्मपदेन पर्वत अयोगोलकअन्यतरत्व
रूप धर्मका ग्रहण करनेसे तदवच्छिन्न आधारतानिरूपित आधेयतासम्बन्धसे पर्वता-
योगोलकअन्यतरत्वावच्छिन्न धूमरूप साध्यके साथ आर्द्रेन्धनसंयोगरूप उपाधिकी
व्यापकता है; तथा पर्वतायोगोलकान्यतरत्वावच्छिन्न वह्निरूप हेतुके साथ उक्त उपा-
धिकी अव्यापकता है । १ ।
मित्रातनयत्वावच्छिन्नश्यामत्वस्य व्यापकं शाकपाकजत्वम् ।
तदवच्छिन्नसाधनाव्यापकं च । २ ।
भाषा-एवं “ स श्यामः मित्रातनयत्वात् ” इस स्थलमें यद्धर्मपदेन 'मित्रात-
नयत्वरूप धर्मका ग्रहण करनेसे समानाधिकरणसम्बन्धेन मित्रातनयत्वावच्छिन्न
श्यामत्वरूप साध्यका व्यापक तथा तादात्म्येन मित्रातनयत्वावच्छिन्न जो मित्रातन-
यत्व उसका अव्यापक शाकपाकजत्वरूप उपाधि है । २ ।
एवं पक्षधर्मबहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्नप्रत्यक्षत्वस्य व्यापकमुद्भूतरूपव-
त्त्वं बहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्नसाधनस्याव्यापकं च । ३ ।
भाषा-‘एवं “ वायुः प्रत्यक्षः प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वात् ” इस स्थलमें यद्धर्मपदेन
‘ बहिर्द्रव्यत्व ’ रूप धर्मका ग्रहण करनेसे बहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्न प्रत्यक्षत्वरूप साध्यका

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७९
व्यापक तथा बहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्न प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वरूप हेतुका अव्यापक उद्भूतरूप-
वत्त्वरूप उपाधि है ३ ।
एवं 'ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात्' इत्यत्र जन्यत्वावच्छिन्नसाध्य-
व्यापकंभावत्वम् । ४ ।
भाषा—एवं “ ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात्" इस स्थलमें यद्धर्मपदेन जन्यत्वरूप
धर्मका ग्रहण करनेसे जन्यत्वावच्छिन्न विनाशित्वरूप साध्यका व्यापक तथा तादा-
त्म्येन जन्यत्वावच्छिन्न जो जन्यत्व उसका अव्यापक भावत्वरूप उपाधि है । ४ ।
सद्धेतोस्त्वेतादृशो धर्मो नास्ति यदवच्छिन्नस्य साध्यस्य व्याप-
कं तदवच्छिन्नस्य साधनस्याव्यापकं किंचित् स्यात् । व्यभि-
चारिणि त्वन्तत उपाध्यधिकरणं यत्साध्याधिकरणं यच्चोपाधि-
शून्यं साध्यव्यभिचारनिरूपकमधिकरणं तदन्यतरत्वावच्छिन्न-
स्य साध्यस्य व्यापकत्वं साधनस्य चाव्यापकत्वमुपाधेः
सम्भवतीति ॥१३८॥
भाषा—‘वन्हिमान् धूमात्' इत्यादि सद्धेतुस्थलोंमें तो ऐसा धर्म कोई नहीं
मिलसकता कि यादृशधर्मविशिष्ट साध्यके साथ किसी एक उपाधिरूप धर्मकी
व्यापकता तथा तादृश धर्मविशिष्ट हेतुके साथ उसी उपाधिरूप धर्मकी अव्यापकता
होय और “ धूमवान्वन्हेः” इत्यादि व्यभिचारि स्थलमें तो (अन्ततः) यदि
धर्मान्तर नभी स्फुरण होय तो उपाधिके अधिकरण जो साध्याधिकरण पर्वत महान-
सादि आर उपाधिसे शून्य तथा साध्यव्यभिचारनिरूपक हेतुके अधिकरण जो अयो-
गोलकादि एतद् अन्यतरत्वावच्छिन्न साध्यव्यापकता अर्थात् पर्वत अयोगोलकान्यतर-
त्वविशिष्ट धूमरूप साध्यका व्यापक तथा पर्वतअयोगोलकान्यतरत्वविशिष्ट वह्नयादि
हेतुका अव्यापक आर्द्रन्धनसंयोगादिरूप उपाधिधर्म होसकताहै ॥१३८॥
अत एव लक्ष्यमप्युपाधिस्वरूपमेतदनुसारेण दर्शयति, सर्वे इति-
भाषा-मूलकारके “ साध्यस्य व्यापको यस्तु ” इत्यादि ग्रन्थका ' यद्धर्मा-
वच्छिन्न ' इत्यादि लक्षणहीमें तात्पर्य है (अत एव ) इसीलिये इस लक्षणका लक्ष
उपाधिका स्वरूपभी इसी लक्षणके अनुसार 'सर्वे' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार
दिखलाते हैं-
सर्वे साध्यसमानाधिकरणाः स्युरुपाधयः ॥
हेतोरेकाश्रये येषां स्वसाध्यव्यभिचारिता ॥१३९॥

२८० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-जिन उपाधिरूप धर्मोंका प्रकृतसाध्यके सहित हेतुके किसीएक अधिक-
रणमें व्यभिचार है, अर्थात् उपाधिसाध्य दोनोंही हेतुके किसी एक अधिकरणमें नहीं
रहते वे सभी उपाधिरूप धर्म साध्यसमानाधिकरणही कहेजातेहैं ॥ १३९ ॥
स्वसाध्येति । स्वमुपाधिः स्वं च साध्यं च स्वसाध्ये तयोर्व्यभि-
चारितेत्यर्थः ॥ १३९ ॥
भाषा-यहां 'स्व' पदसे उपाधिका ग्रहण है और इस 'स्व' पदका 'साध्य'
पदके साथ इतरेतरयोगद्वन्द्व है एवं उपाधिसाध्य दोनोंकी व्यभिचारिता हेतुके किसी
एक अधिकरणमें होनीही उपाधिकी साध्यव्यापकता समझनी चाहिये. यह अर्थ सिद्ध
हुआ ॥ १३९ ॥
उपाधेर्दूषकताबीजमाह, व्यभिचारस्येति-
भाषा--एवं 'व्यभिचारस्य' इत्यादि ग्रन्थसे उपाधिमें दूषकता बीज अर्थात्
उपाधि जैसे परकीय अनुमानको दूषित करतीहै उसका मूल कहतेहैं-
व्यभिचारस्यानुमानमुपाधेस्तु प्रयोजनम् ॥
भाषा-व्यभिचारका अनुमान करवाना अर्थात् हेतुको व्यभिचारी सिद्ध करदेना
उपाधिका मुख्य प्रयोजन है.
उपाधिव्यभिचारेण हेतौ साध्यव्यभिचारानुमानमुपाधेः प्रयोजन-
मित्यर्थः । तथाहि । यत्र शुद्धसाध्यव्यापक उपाधिस्तत्र शुद्धेनै-
वोपाधिव्यभिचारेण साध्यव्यभिचारानुमानम् । यथा धूमवान्
वह्नेरित्यादौ वह्निर्धूमव्यभिचारीतद्व्यापकार्द्रेन्धनसंयोगव्यभि-
चारित्वादिति । व्यापकव्यभिचारिणो व्याप्यव्यभिचारावश्य-
कत्वात् ॥ १ ॥
भाषा-हेतुका यदि किसी एकस्थलमें उपाधिके साथ व्यभिचार होय तो उसीसे
साध्यके साथ हेतुके व्यभिचारकाभी अनुमान होताहै (तथाहि) जिस स्थलमें
उपाधि केवल शुद्धसाध्यकी व्यापक है वहां केवल शुद्ध उपाधि व्यभिचारसेही हेतुमें
साध्यव्यभिचारका अनुमान होताहै. जैसे “ धूमवान् वन्हेः ” इत्यादि स्थलमें यह
अनुमान करसकते हैं कि धूमके व्यापकीभूत आर्द्रन्धनसंयोगका व्यभिचारी होनेसे
वह्निरूप हेतु स्वसाध्यधूमकाभी अवश्य व्यभिचारी है क्योंकि जो व्यापकका
व्यभिचारी होता है वह व्याप्यका व्यभिचारीभी अवश्य होताहै.

यत्र तु किञ्चिद्धर्मावच्छिन्नसाध्यव्यापक उपाधिस्तत्र तद्धर्मवत्यु-
पाधिव्यभिचारेण साध्यव्यभिचारानुमानम् । यथा स श्यामो मि-
त्रातनयत्वादित्यत्र मित्रातनयत्वं श्यामत्वव्यभिचारि, मित्रातनये
शाकपाकजत्वव्यभिचारित्वादिति।बाधानुन्नीतपक्षेतरस्तु साध्य-
व्यापकताग्राहकप्रमाणाभावात् स्वव्याघातकत्वाच्च नोपाधिः ।
भाषा-एवं जिस स्थलमें किञ्चिद्धर्मावच्छिन्न साध्यका व्यापक उपाधिरूप धर्म है
वहां उसी धर्मवाले हेतुके साथ उपाधिव्यभिचारसे साध्यके व्यभिचारकाभी अनुमान
होताहै. जैसे “ स श्यामो मित्रातनयत्वात् ” इत्यादि स्थलमें यह अनुमान करस-
कतेहैं कि-मित्राके अष्टम गौर पुत्रमें शाकपाकजत्वका व्यभिचार होनेसे मित्रातनय-
त्वरूप हेतु श्यामत्वरूप साध्यका व्यभिचारी है. बाधदोषसहकृत पक्षेतरत्वरूप धर्म
किसी स्थलमेंभी उपाधिरूप नहीं होसकता; क्योंकि प्रथम तो उसकी प्रकृतसाध्यके
साथ व्यापकताका ग्राहक प्रबल प्रमाण कोई नहीं है. भला कथञ्चित् व्यापकताका
ग्रहण मानभी लिया जाय तो उसको स्वव्याघातकता है. भाव यह कि, प्रकृतहेतुके
व्यभिचारानुमापकत्वेन उपाधिको दूषकता है.
बाधोन्नीतस्तु पक्षेतर उपाधिर्भवत्येव यथा 'वह्निरनुष्णः कृतक-
त्वात्' इत्यादौ प्रत्यक्षेण वह्नेरुष्णत्वग्रहे वह्नीतरत्वमुपाधिः ।
यत्रतूपाधेः साध्यव्यापकत्वादिकं सन्दिह्यते स सन्दिग्धोपाधिः ।
पक्षेतरस्तु सन्दिग्धोपाधिरपि नोद्भावनीयः कथकसम्प्रदायानु-
रोधादिति ।
भाषा-एवं यदि पक्षेतरत्वरूप धर्मभी उपाधिरूपसे स्वीकृत होय तो सर्वत्र
अनुमानोंमें पक्षेतरत्वरूप उपाधिका सम्भव होनेसे अनुमानमात्रका उच्छेद हुआ तो
उपाधिको दूषकता कहां रही ? यही उसको स्वव्याघातकत्व है, परन्तु बाधसहकृत
पक्षेतरत्व धर्मभी उपाधिरूप होसकता है; जैसे “वह्निरनुष्णः कृतकत्वात् ” इत्यादि
स्थलमें पहले स्पार्शन प्रत्यक्षसे वह्निमें उष्णता ग्रहण करी अर्थात् पक्षे साध्याभावरूप
बाधका निश्चय किया तो पीछे वह्नीतरत्वरूप उपाधि कह सकते हैं. परन्तु जिस
स्थलमें उपाधिमें साध्यव्यापकताका सन्देह होताहै उस स्थलमें वह सन्दिग्ध उपाधि
कही जातीहै और पक्षेतरत्वरूप धर्म तो सन्दिग्ध उपाधिरूपसेभी वादी प्रतिवादीको
परस्पर उद्बोधन करना योग्य नहीं क्योंकि ऐसा करनाभी ( कथक ) विचारकुशलोंके
सम्प्रदायसे विरुद्ध है.
३३

२८२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
केचित्तु सत्प्रतिपक्षोत्थापनमुपाधेः फलम् । तथाहि । 'अयोगोल-
कं धूमवद्वह्नेः' इत्यादावयोगोलकं धूमाभाववदार्द्रेन्धनाभावा-
दिति सत्प्रतिपक्षसम्भवात् । इत्थं च साधनव्यापकोपि क्वचिदु-
पाधिः यथा करका पृथिवी कठिनसंयोगवत्त्वात् इत्यादावनु-
ष्णाशीतस्पर्शवत्त्वम् ।
भाषा-कोईएक विद्वान् लोग विरोधिहेतुका उत्थापन करदेनाही उपाधिका
प्रयोजन मानतेहैं. ( तथाहि ) जैसे " अयोगोलकं धूमवत् वह्नेः " इत्यादि स्थलमें
"अयोगोलकं धूमाभाववत् धूमव्यापकार्द्रेन्धनसंयोगाभावात्" इत्याकारक विरोधिहे-
तुका सम्भव होसकताहै. ( इत्थञ्च ) एवं विरोधिहेतु उत्थापकत्वेन उपाधिको दूषकत्व
माननेसे किसीएक स्थलविशेषमें साधनका व्यापकभी उपाधिरूप धर्म होताहै जैसे
"वर्षोपलः पृथिवी कठिनसंयोगवत्त्वात् " इत्यादि स्थलमें 'अनुष्णाशीतस्पर्शवत्त्व'
उपाधि है, इस उपाधिसे प्रकृतहेतुमें व्यभिचारानुमान तो नहीं होसकता परन्तु "वर्षो-
पलः पृथिवीत्वाभाववान् कठिनसंयोगव्यापकीभूतानुष्णाशीतस्पर्शवत्त्वाभावात् " इत्या-
कारक सत्प्रतिपक्ष कहसकतेहैं.
न चात्र स्वरूपासिद्धिरेव दूषणमिति वाच्यम्। सर्वत्रोपाधेर्दूष-
णान्तरसाङ्कर्यादत्र च साध्यव्यापकःपक्षावृत्तिरुपाधिरितिवदन्ति ।
शंका-करका उसी कालमें पिघलके जलरूप होजाती है, इसलिये उसमें कठिन
संयोग वस्तुतः नहीं, एवं ऐसे स्थलमें पक्षेहेत्वाभावरूप स्वरूपासिद्धि दोषही कहना
उचित है. समाधान-उपाधिदोषका सर्वस्थलोंमें दोषान्तरोंके साथ सांकर्य रह-
ताहै अर्थात् ऐसा स्थल कोई एकभी दुर्लभ है कि जिसमें केवल उपाधिदोषही होय
तथा दोषान्तरोंका सम्भव न होसके ( अत्रच ) इस सत्प्रतिपक्ष उत्थापकत्वपक्षमें
विद्वान् लोग साध्यके व्यापक तथा पक्षमें न रहनेवाले धर्मको उपाधि कहते हैं.
शब्दोपमानयोर्नैव पृथक् प्रामाण्यमिष्यते ॥१४० ॥
अनुमानगतार्थत्वादिति वैशेषिकं मतम् ॥
भाषा-( वैशेषिक ) कणादमुनिके सिद्धान्तमें शब्द तथा उपमान स्वतन्त्र
प्रमाण नहीं है ॥ १४० ॥ किन्तु इन दोनोंकी अनुमानहीमें गतार्थता है.
शब्दोपमानयोरिति। वैशेषिकाणां मते प्रत्यक्षमनुमानं च प्रमा-
णम् । शब्दोपमानयोस्त्वनुमानविधयैव प्रामाण्यम् । तथाहि

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २८३
दण्डेन 'गामानय' इत्यादिलौकिकपदानि 'यजेत' इत्यादि वैदिकप-
दानि वा तात्पर्यविषयस्मारितपदार्थसंसर्गज्ञानपूर्वकाणि आकां-
क्षादिमत्पदकदम्बत्वात् 'घटमानय' इतिपदकदम्बवत् । यद्वैते
पदार्था मिथः संसर्गवन्तः, योग्यतादिमत्पदोपस्थापितत्वात्,
तादृशपदार्थवत् । दृष्टान्तेऽपि दृष्टान्तान्तरेण साध्यसिद्धिरिति ।
भाषा-वैशेषिकसिद्धान्तमें प्रत्यक्ष तथा अनुमान ये दोही प्रमाण स्वीकृत हैं
और शब्द तथा उपमानको अनुमानविधयाही प्रमाणता है अर्थात् जुदी प्रमाणता
नहींहै ( तथाहि ) ' दण्डेन गामानय ' इत्यादिलौकिक पद तथा ' यजेत ' इत्यादि
वैदिकपद वक्तृतात्पर्यके विषयभूत जो पदोंद्वारा उपस्थित हुए पदार्थोंका परस्पर संसर्ग,
उस संसर्गका जो ज्ञान तादृश ज्ञानपूर्वक हैं; क्योंकि यह सब आकांक्षा योग्यतादि-
वाला पदसमूह प्रतीत होताहै. जैसे ' घटमानय ' यह पदसमूह आकांक्षा योग्यता-
आदिवाला है इसीलिये वक्तृतात्पर्यके विषयभूत उक्त संसर्गके ज्ञानपूर्वकभीहै अथवा
ये घटपटादि यावत् पदार्थ वक्तृतात्पर्यके विषयभूत परस्पर संसर्गवाले हैं; क्योंकि
जहां तहां इनकी आकांक्षा योग्यतावाले पदोंसेही उपस्थिति होती है ( तादृश ) प्रसिद्ध
पदार्थकी तरह सर्वत्र अनुभव करना उचित है, इत्यादि अनुमानद्वारा प्रयोज्यवृद्धको
अनुभव हो सकताहै और यदि किसीको दृष्टान्तस्थलमेंभी सम्यक् साध्यसिद्धि न
होय तो उसी पदार्थको पक्षस्थापन करके वहां प्रसिद्ध दृष्टान्तान्तरसे साध्यसिद्धि
होसकतीहै.
एवं गवयव्यक्तिप्रत्यक्षानन्तरं गवयपदं गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तक-
मसति वृत्त्यन्तरे वृद्धैस्तत्र प्रयुज्यमानत्वात्, असति च वृत्त्य-
न्तरे वृद्धैर्यत्र यत्प्रयुज्यते तत्तत्प्रवृत्तिनिमित्तकम् । यथा
गोपदं गोत्वप्रवृत्तिनिमित्तकम् ।
भाषा-ऐसेही गवयादिव्यक्ति साक्षात्कारके पश्चात् ' गवय ' पद गवयत्वप्रवृत्ति
निमित्तक है अर्थात् 'गवय' पदका प्रवृत्तिनिमित्तधर्म 'गवयत्व' है; क्योंकि वृद्धलोग
' गवय ' पदका और कहीं प्रयोग न करके केवल गवयव्यक्तिमेंही प्रयोग करतेहैं
अर्थान्तरमें वृत्त्यभाववाले पदका वृद्धलोग जहां जिसका प्रयोग करतेहैं वहां वह पद
उसी धर्मके प्रवृत्तिनिमित्तवाला होताहै जैसे ' गो ' पद गोत्वधर्मके प्रवृत्तिनिमित्त
वाला है अर्थात् ' गो ' पदका प्रवृत्तिनिमित्तधर्म गोत्व है.

२८४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
यद्वा गवयपदं सप्रवृत्तिनिमित्तकं साधुपदत्वादित्यनुमानेन पक्ष-
धर्मताबलाद्गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तकत्वं सिद्ध्यति ।
भाषा-अथवा 'गवय' पद (साधु) शुद्धपद होनेसे अवश्य किसी एक प्रवृत्तिनि-
मित्त धर्मवाला है अर्थात् शुद्ध पद है इसलिये कोईएक इसका प्रवृत्तिनिमित्तधर्म
अवश्य होना चाहिये, इस अनुमानद्वारा पक्षधर्मताके बलसे 'गवय' पदका प्रवृत्ति
निमित्त धर्म गवयत्व सिद्ध होसकता है,
तन्मतं दूषयति, तन्न सम्यगिति-
भाषा-यह पूर्वोक्त वैशेषिकका सिद्धान्त 'तन्न सम्यक्' इत्यादि ग्रन्थसे मूल-
कार दूषित करतेहैं-
तन्न सम्यग्विना व्याप्तिबोधं शब्दादिबोधतः : १४१ ।।
भाषा-यह पूर्वोक्त सिद्धान्त यथार्थ नहीं है, क्योंकि व्याप्तिज्ञानसे विनाभी
शब्दादिसे शाब्दबोध होना अनुभव सिद्ध है ॥ १४१ ॥
व्याप्तिज्ञानं विनापि शब्दादितो शाब्दबोधस्यानुभवसिद्धत्वा-
त् । न हि सर्वत्र शब्दश्रवणानन्तरं व्याप्तिज्ञाने प्रमाणमस्तीति ।
किंच सर्वत्र शाब्दस्थले यदि व्याप्तिज्ञानं कल्प्यते तदा सर्वत्रा-
नुमितिस्थले पदज्ञानं कल्पयित्वा शाब्दबोध एव किं न स्वी-
क्रियत इति ॥ १४१ ॥
भाषा-सर्वस्थलोंमें शब्दश्रवणसे पश्चात् अवश्य व्याप्तिज्ञानके होनेमें कोई प्रबल
युक्ति या प्रमाण नहीं है; क्योंकि व्याप्तिज्ञानके विनाभी शब्दादिजन्य शाब्दबोध अनु-
भवसिद्ध हैं. (किञ्च) सर्वत्र शाब्दबोधस्थलमें यदि आप अनुमितिज्ञानकी अन्यथानुप-
पत्तिसे व्याप्तिज्ञानकी कल्पना करतेहैं तो हम कहतेहैं कि, सर्वत्र अनुमितिस्थलमें पद-
स्मरणकी कल्पनासे शाब्दबोधहीको आप स्वीकार क्यों नहीं करलेते ? भाव यह कि
कल्पना उभयत्र तुल्यही है, विनिगमनाविरहसे आप विपरीतही क्यों नहीं मानलेते ?
त्रैविध्यमनुमानस्य केवलान्वयिभेदतः ॥
द्वैविध्यं तु भवेद्व्याप्तेरन्वयव्यतिरेकतः ॥ १४२ ॥
अन्वयव्याप्तिरुक्तैव व्यतिरेकादथोच्यते ॥
भाषा-केवलान्वयि भेदसे अनुमान तीन प्रकारका है और अन्वयव्यतिरेकभेदसे
व्याप्ति दो प्रकारकी है. उसमें अन्वयव्याप्तिका स्वरूप तो पूर्व कहचुकेहैं; शेष व्यति-
रेकव्याप्तिका स्वरूप यहां कहते हैं-

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २८५
त्रैविध्यमिति । अनुमानं हि त्रिविधं-केवलान्वयिकेवलव्यतिरे-
क्यन्वयव्यतिरेकिभेदात् । तत्रासद्विपक्षः केवलान्वयी यथा 'घटो
ऽभिधेयः प्रमेयत्वात्' इत्यादौ, तत्र हि सर्वस्यैवाभिधेयत्वाद्विप-
क्षासत्त्वम् ।
भाषा-केवलान्वयि केवलव्यतिरेकि तथा अन्वयव्यतिरेकि भेदसे अनुमान तीन
प्रकारका है, उनमें जिसका विपक्षस्थल कहीं न मिले वह केवलान्वयि है; जैसे 'घटो
ऽभिधेयः प्रमेयत्वात्' इत्यादि स्थलमें ईश्वरइच्छाविषयका नाम 'अभिधेय' है और
ईश्वरप्रमाविषयका नाम 'प्रमेय' है. एवं अभिधेयभी पदार्थमात्र है और प्रमेयभी पदार्थ
मात्रहै. एवं प्रमेयत्वरूप हेतुका निश्चित साध्याभाववद् विपक्षस्थल कोई नहीं है, याते
यह केवलान्वयि है.
ननु सर्वेषां धर्माणां व्यावृत्तत्वात्केवलान्वय्यसिद्धिरिति चेत् ।
न । व्यावृत्तत्वस्य सर्वसाधारप्ये तस्यैव केवलान्वयित्वात् ।
किंचवृत्तिमदत्यन्ताभावाप्रतियोगित्वं केवलान्वयित्वम् । तच्च ग-
गनाभावादौ प्रसिद्धम् । १ ।
शंका-सम्पूर्णपदार्थोंके यावत् धर्म व्यावृत्त हैं अर्थात् जुदा जुदा हैं यावत् पदार्थोंमें
अनुगत एक धर्म कोई नहीं है इसलिये केवलान्वयि धर्मकी सिद्धि नहीं होसकती
समाधान-व्यावृत्त पदार्थोंके सिरपर रहनेवाला व्यावृत्तत्वधर्म सर्वसाधारण है,
इसलिये वह केवलान्वयि होसकताहै. ( किञ्च ) घटपटादि वृत्तिमत् पदार्थोंके
अत्यन्ताभावके अप्रतियोगीका नाम 'केवलान्वयि' है. ऐसे गगनाभावादि कईएक
पदार्थ हैं १ ।
असत्सपक्षः केवलव्यतिरेकी, यथा 'पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते गन्ध-
वत्त्वात्' इत्यादौ । तत्र हि जलादित्रयोदशभेदस्य पूर्वमनि-
श्चिततया निश्चितसाध्यवतः सपक्षस्याभाव इति । २ । सत्सपक्ष
विपक्षोऽन्वयव्यतिरेकी, यथा 'वह्निमान् धूमात्' इत्यादौ । तत्र
सपक्षस्य महानसादेर्विपक्षस्य जलह्रदादेश्च सत्त्वादिति ॥ ३ ॥
भाषा-जिसका निश्चित साध्यवाला सपक्ष स्थल न होय वह अनुमान 'केवल-
व्यतिरेकी' है. जैसे “पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्” इत्यादि स्थलमें
जलादि आठ तथा गुणादि पांच इन त्रयोदशका भेद पृथिवीमें इस अनुमानसे पहले

२८६ न्यायदिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण -
कहींभी निश्चित नहींहै, एवं निश्चित साध्यवाले सपक्ष स्थलके न होनेसे यह अनुमान
'केवलव्यतिरेकी' है २। जिसका सपक्ष विपक्षस्थल निश्चित होय वह अनुमान
'अन्वयव्यतिरेकी' है; जैसे ' वह्निमान् धूमात् ' इत्यादि स्थलमें सपक्ष महानसादि
तथा विपक्ष जलह्रदादि निश्चित हैं ॥ ३ ॥
तत्रहि व्यतिरेकिणि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानं कारणं तदर्थं व्यतिरेक-
व्याप्तिं निर्वक्ति, साध्याभावव्यापकत्वमिति-
भाषा-उनमें व्यतिरेकिअनुमानके प्रति व्यतिरेकव्याप्ति ज्ञानको कारणता है उसके
लिये 'साध्याभाव' इत्यादि मूलसे ग्रन्थकार व्यतिरेकव्याप्तिका निर्वचन करते हैं-
साध्याभावव्यापकत्वं हेत्वभावस्य यद्भवेत् ॥ १४३॥
भाषा-साध्याभावनिरूपित हेत्वाभावमें व्यापकताका नाम 'व्यतिरेक व्याप्ति' है.
साध्याभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वमित्यर्थः । अत्रेदं बोध्य-
म् । यत्सम्बन्धेन यदवच्छिन्नं प्रति येन सम्बन्धेन येन रूपेण व्या-
पकता गृह्यते तत्सम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकतद्धर्मावच्छिन्ना-
भाववत्ताज्ञानात् तत्सम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकतद्धर्माव-
च्छिन्नाभावस्य सिद्धिरिति ।
भाषा-अर्थात् वह्नयादिसाध्याभावका व्यापकीभूत जो धूमाभाव तादृशाभाव
प्रतियोगित्वरूपही धूमरूप हेतुके सिरपर व्यतिरेकव्याप्ति है. यहां इतना औरभी
जानना चाहिये कि-जिस सम्बन्धसे यद्धर्मावच्छिन्नके प्रति जिसकी जिस सम्बन्धसे
जिस रूपसे व्यापकताका ग्रहण होय उसका उसी सम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक
उसी धर्मावच्छिन्नाभाववत्ताके ज्ञानसे उसी सम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक उसी
धर्म्मावच्छिन्नके अभावकी सिद्धि होती है-इति ।
इत्थं च यत्र विशेषणतादिसम्बन्धेनेतरत्वव्यापकत्वं गन्धात्यन्ता-
भावे गृह्यते तत्र गन्धाभावाभावेनेतरत्वात्यन्ताभावः सिध्यति ।
यत्र तु तादात्म्यसम्बन्धेनेतरव्यापकता गन्धाभावस्य गृह्यते ।
तत्र तादात्म्यसम्बन्धेनेतरस्याभावः सिध्यति, स एवान्योन्या-
भावः ।
भाषा-( इत्थञ्च ) इस रीतिसे जहां गन्धके अत्यन्ताभावमें पृथिवी इतरवृत्ति
इतरत्वधर्मनिष्ठ व्याप्यतानिरूपित व्यापकता ' विशेषणता ' स्वरूपसम्बन्धसे

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता, २८७
ग्रहण हुआहै वहां गन्धके अभावके अभावसे अर्थात् गन्धसे इतरत्वधर्मके अत्यन्ता-
भावकी सिद्धि होतीहै अर्थात् जहां गन्ध है वहां इतर जलादिका भेद है तथा इतर
जलादिनिष्ठ इतरत्वधर्मका अत्यन्ताभावभी है, क्योंकि धर्मिभेद धर्मात्यन्ताभाव सह-
वृत्ति एकरूप होते हैं, परन्तु जहां तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्ना जो इतरनिष्ठव्याप्यता
तादृश व्याप्यतािनिरूपित व्यापकताका गन्धाभावमें ग्रहण होताहै वहां तादात्म्य-
सम्बन्धसेही इतरजलादिका अभाव सिद्ध होताहै, उसीका नाम 'अन्योन्याभाव' है.
एवं यत्र संयोगसम्बन्धेन धूमं प्रति संयोगसम्बन्धेन वह्नेर्व्यापक-
ता गृह्यते तत्र संयोगसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकवह्न्यभावेन
जलह्रदे संयोगसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकधूमाभावः सिध्यति।
भाषा-एवं जहां संयोगसम्बन्धेन धूमके प्रति संयोगसम्बन्धेन वह्निनिष्ठ व्याप-
कताका ग्रहण हुआहै वहां संयोगसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक वह्निके अभावसे
जलह्रदमें संयोगसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक धूमाभावकी सिद्धि होती है.
अत्र च व्यतिरेकव्याप्तिग्रहे व्यतिरेकसहचारज्ञानं कारणम् । के-
चित्तु व्यतिरेकसहचारेणान्वयव्याप्तिरेव गृह्यते न तु व्यतिरेक-
व्याप्तिज्ञानमपि कारणम् । यत्र व्यतिरेकसहचाराद्व्याप्तिग्रह-
स्तत्र व्यतिरेकीत्युच्यते। साध्यप्रसिद्धिस्तु घटादावेव जाता,
पश्चात् पृथिवीत्वावच्छेदेन साध्यते इति वदन्ति ।
भाषा-यहां व्यतिरेकव्याप्तिके ग्रहणमें व्यतिरेकसहचारका ज्ञान अर्थात्
“यत्र यत्र साध्याभावस्तत्र तत्र हेत्वभावः” इत्याकारक अभावोंके सहचारका ज्ञान
कारणीभूत है, परन्तु ऐसे स्थलमें उदयनाचार्यानुयायी विद्वान्‌लोग तो
ऐसा मानतेहैं कि-केवलव्यतिरेकसहचारसेभी अन्वयव्याप्तिकाही ग्रहण होताहै किन्तु
व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान अनुमितिज्ञानके प्रति कारण नहींहै. जिस स्थलमें व्यतिरेकसह-
चारसे व्याप्तिग्रह होताहै वहां वह अनुमान ‘व्यतिरेकी’ कहा जाताहै. इतरभेदरूप
साध्यकी प्रसिद्धि प्रथमघटादिकोंमें होतीहै; पश्चात् पृथिवीत्वावच्छेदेन इतरभेदरूप
साध्यका अनुमान किया जाताहै. भाव यह कि-पक्षके एकअंशमें साध्यसिद्धि यावत्
अंशकसाध्यसाधिका अनुमितिके प्रति प्रतिबन्धक नहीं होसकती.
अर्थापत्तेस्तु नैवेह प्रमाणान्तरतेष्यते ॥
व्यतिरेकव्याप्तिबुद्ध्या चरितार्था हि सा यतः॥१४४॥

३८८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-( इह ) न्यायसिद्धान्तमें अर्थापत्ति पृथक् प्रमाण नहीं है, क्योंकि
व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानहीमें इसकी गतार्थता होसकतीहै ॥ १४४ ॥
अर्थापत्तेस्त्विति । अर्थापत्तिं प्रमाणान्तरं मन्यन्ते केचन ।
तथाहि यत्र देवदत्तस्य शतवर्षजीवित्वं ज्योतिःशास्त्रादवगतं
जीविनो गृहासत्त्वं च प्रत्यक्षादवगतं तत्र शतवर्षजीवित्वान्यथा-
नुपपत्त्या बहिः सत्त्वं कल्प्यते । तदनुमानेन गतार्थत्वान्नेष्यते ।
भाषा-कुमारलभट्ट तथा वेदान्तीलोग अर्थापत्तिको पृथक् प्रमाण मानतेहैं
( तथाहि ) जैसे जहां किसी देवदत्तादि पुरुषविशेषका शतवर्षतक जीना ज्योतिः
शास्त्रसे निश्चित किया अर्थात् उसकी जन्मपत्रिकाद्वारा जाना तो जीवतेहुए उसका
घरमें न होना प्रत्यक्षसे निश्चयहुआ तो ऐसे स्थलमें उसका शतवर्षतक जीवना
( अन्यथा ) प्रकारान्तरेण अनुपपन्न हुआ किसी बाह्यदेशमें उसके सत्त्वकी अर्थात्
होनेकी कल्पना करवाता है इस प्रकारकी अर्थापत्तकी प्रमाणान्तरताभी अनुमानहीमें
गतार्थ है इसलिये पृथक्प्रमाणता वांछित नहींहै.
तथाहि । यत्र जीवित्वस्य बहिःसत्त्वगृहसत्त्वान्यतरव्याप्यत्वं
गृहीतं तत्रान्यतरसिद्धौ जायमानायां गृहसत्त्वबाधाद्वहिःसत्त्वम-
नुमितौ भासते ।
भाषा-(तथाहि ) बहिर्देशमें होना या घरमें होना इन दोनोंमें किसी एकनिष्ठ
व्यापकतानिरूपित व्याप्यताका ग्रहण जहां देवदत्तके जीवनमें हुआहै अर्थात् जहां
“जीविनो जीवित्वं बहिःसत्त्वगृहसत्त्वान्यतरव्याप्यं” इत्याकारक ज्ञान हुआहै वहां
दोनोंमें एककोटिके साक्षात्कार हुए पश्चात् गृहसत्त्वका बाध होनेसे जीवी देवदत्तका
बाह्य सत्त्व “ देवदत्तो बहिःसत्त्ववान् जीवित्वे सति गृहाभावदर्शनात् ” इत्याकारक
अनुमितिमें प्रतीत होताहै.
एवं ‘पीनो देवदत्तो दिवा न भुंक्ते’ इत्यादौ पीनत्वस्य भोजन-
व्याप्यत्वावगमाद्भोजनसिद्धौ दिवाभोजनबाधे च रात्रिभोजनं
सिध्यति । अभावप्रत्यक्षस्यानुभविकत्वादनुपलम्भोऽपि न
प्रमाणन्तरम् ।
भाषा-एवं ( पीन ) 'स्थूल देवदत्त दिनमें भोजन नहीं करता' इत्यादि स्थलमें
पीनत्वधर्मकी भोजनके साथ “ यत्र यत्र पीनत्वं तत्र तत्र भोजनम् ” इत्याकारक
व्याप्ति अनेकवार गृहीत है इससे भोजनकी सिद्धि हुई तो दिनमें भोजन प्रत्यक्षसे

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकामेता. २८९
बाधित है, इसलिये “देवदत्तो रात्रिभोजी दिवाभुञ्जानत्वे सति पीनत्वात्”इत्याकारक
प्रयोगसे रात्रिभोजनकी सिद्धि होती है. विशेषणतादिसम्बन्धसे अभावका साक्षात्कार
होना अनुभवसिद्ध है इसलिये उसका ग्राहक अनुपलब्धिभी पृथक् प्रमाण नहींहै.
किंचानुपलम्भस्याज्ञातस्य हेतुत्वे ज्ञानाकरणकत्वात् प्रत्य-
क्षत्वं, ज्ञातस्य हेतुत्वे तु तत्राप्यनुपलम्भान्तरापेक्षेत्यनवस्था ।
भाषा-( किञ्च ) अनुपलब्धिको पृथक् प्रमाण माननेवालेसे यह पूँछना चाहिये
कि-जिसको आपने स्वतंत्रप्रमाण माना है वह प्रतियोग्युपलम्भाभाव स्वयं अज्ञात
हुआ अभावका ग्राहक है,किंवा ज्ञात हुआ? यदि अज्ञात हुआ कहो तो ज्ञानाकरणक
ज्ञान होनेसे प्रत्यक्षहीके अन्तर्भूत हुआ और यदि ज्ञात हुआ कहो तो उसमें फिर
अनुपलम्भान्तरकी अपेक्षा होगी क्योंकि उस प्रथम अनुपलम्भके जाननेके लिये कोई
दूसरा अनुपलम्भ अवश्य चाहिये, एवं दूसरेके लिये तीसरा तीसरेके लिये चौथा,
ऐसेही पश्चाद्भाविनी कारणमुखी अनवस्था होगी.
एवं चेष्टापि न प्रमाणान्तरं तस्याः सङ्केतग्राहकशब्दस्मारक-
त्वेन लिप्यादिसमशीलत्वाच्छब्द एवान्तर्भावात् । यत्र तु व्या-
प्यादिग्रहस्तत्रानुमितिरेवेति ॥ १४४ ॥
भाषा-एवं तांत्रिकलोग चेष्टाको पृथक् प्रमाण मानतेहैं सोभी ठीक नहीं; क्योंकि
जैसे ( लिपि ) लिखेहुए अक्षरोंसे वक्तृतात्पर्यके ग्राहक शब्दोंका स्मरण होकर
शाब्दबोध होताहै वैसेही चेष्टाद्वाराभी चेष्टाकारकपुरुषकृतसंकेतग्राहक शब्दोंका स्मरण
होकर शाब्दबोधही होताहै इसलिये चेष्टाकाभी शब्दहीमें अन्तर्भाव है, परन्तु जहां
मूकबधिरादिकोंकी विलक्षण चेष्टाकी क्षुधादिके साथ व्याप्ति गृहीत है वहां “अयं
मूकबधिरो भोजनाभिलाषी मुखप्रसारणादिविलक्षणचेष्टावत्त्वात् ” इत्यादि प्रयोगद्वारा
अनुमितिज्ञानही होता है. यहां यह भाव है कि-कृतसंकेता तथा अकृतसंकेता भेदसे
चेष्टा दोप्रकारकी है; उसमें प्रथमा तो संकेतग्राहक शब्दस्मारका है इसलिये लिपिआ-
दिकी तरह शब्दप्रमाणके अन्तर्भूत है और दूसरी व्याप्तिग्रहणद्वारा अनुमानके
अन्तर्भूत है ॥ १४४ ॥
सुखं निरूपयति, सुखं तु जगतामेवेति-
भाषा-अब ' सुखन्तु ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार सुखका निरूपण करतेहैं-
सुखं तु जगतामेव काम्यं धर्मेण जन्यते ॥
भाषा-संसारमात्रकी कामनाके विषयका नाम 'सुख' है. धर्मसे वह उत्पन्न होताहै.
२३

२९० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
काम्यमभिलाषाविषयः । धर्मेनेति । धर्मत्वेन सुखत्वेन कार्यकार-
रणभाव इत्यर्थः ।
भाषा-सबकी अभिलाषाके विषय होना मूलगत ' काम्य ' शब्दका अर्थ है.
एवं धर्मत्वेन धर्मका तथा सुखत्वेन सुखका परस्पर कार्यकारण भाव है अर्थात् सर्वत्र
धर्मकारण है तो सुखरूप कार्य है, अन्यथा नहीं.
दुःखं निरूपयति, अधर्मेति-
भाषा-एवं ' अधर्म ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दुःखका निरूपण करते हैं-
अधर्मजन्यं दुःखं स्यात्प्रतिकूलं सचेतसाम्॥ १४५॥
भाषा-यावत् प्राणियोंको प्रतिकूल वेदनीय अर्थात् सबकी द्वेषके विषयका नाम
' दुःख ' है और अधर्मसे वह उत्पन्न होता है ॥ १४५ ॥
अधर्मत्वेन दुःखत्वेन कार्यकारणभाव इत्यर्थः । प्रतिकूलमिति ।
दुःखत्वज्ञानादेव सर्वेषां स्वाभाविकद्वेषविषय इत्यर्थः ॥१४५॥
भाषा-अधर्मत्वेन अधर्मका तथा दुःखत्वेन दुःखका परस्पर कार्यकारण भाव है
अर्थात् अधर्म कारण है तथा दुःखकार्य है. दुःखत्वेन रूपेण ज्ञात हुआही वह सम्पूर्ण
जीवोंके स्वाभाविक द्वेषका विषय होता है ॥ १४५ ॥
इच्छां निरूपयति, निर्दुःखत्व इति-
भाषा-एवं ' निर्दुःख' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार इच्छाका निरूपण करते हैं-
निर्दुःखत्वे सुखे चेच्छा तज्ज्ञानादेव जायते ।
इच्छा तु तदुपाये स्यादिष्टोपायत्वधीर्यदि ॥१४६॥
भाषा-दुःखाभावमें तथा सुखमें जीवकी इच्छा होती है, इन दोनोंके ज्ञानसे इच्छा-
की उत्पत्ति होती है; इन दोनोंके उपायमें यदि जीवको इष्टसाधनत्व प्रकारक ज्ञान
होय तो उपायविषयीणी इच्छाभी होती है ॥ १४६ ॥
इच्छा द्विविधा फलविषयीणी, उपायविषयीणी च । फलं तु सुखं
दुःखाभावश्च । तत्र फलेच्छां प्रति फलज्ञानं कारणम् । अत एव
स्वतः पुरुषार्थः सम्भवति, यज्ज्ञातं सत्स्ववृत्तितयेष्यते स पुरु-
षार्थ इति तल्लक्षणात् । इतरेच्छानधीनेच्छाविषयत्वं फलितो
ऽर्थः । उपायेच्छां प्रतीष्टसाधनताज्ञानं कारणम् ॥ १४६ ॥

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९१
भाषा-एक फलविषयीणी, दूसरी उपायविषयीणी, इस भेदसे इच्छा दोप्रकार-
की है. सुख तथा दुःखाभाव ये दोनों फल हैं. उन दोनों इच्छाओंमें फलइच्छाके
प्रति फलज्ञान कारण है; इसीलिये वह फल स्वतः पुरुषार्थरूप है; क्योंकि-जो ज्ञात
हुआ स्ववृत्तितया वांछित होय अर्थात् स्वविषयक ज्ञानजन्य इच्छाके विषय होय वह
पुरुषार्थ है, यही पुरुषार्थका लक्षण है. फलितार्थ यह कि--जो इतर इच्छाधीन इच्छाके
विषय नहीं है,वह स्वतः पुरुषार्थ है. एवं उपायमें पुरुषार्थता वारण हुई. यदि इष्टसा-
नताज्ञान होय तो जीवको फलसाधक उपायविषयीणी इच्छाभी होती है ॥ १४६ ॥
चिकीर्षा कृतिसाध्यत्वप्रकारेच्छा च या भवेत् ।
तद्धेतुः कृतिसाध्येष्टसाधनत्वमतिर्भवेत् ॥ १४७ ॥
भाषा-कृतिसाध्यत्वप्रकारका इच्छाका नाम चिकीर्षा है. कृतिसाध्यत्वप्रकारक
ज्ञान तथा इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान चिकीर्षाके कारण है ॥ १४७ ॥
चिकीर्षेति । कृतिसाध्यत्वप्रकारिका कृतिसाध्यविषयिणीच्छा
चिकीर्षा । पाकं कृत्या साधयामीति तदनुभवात् । चिकीर्षां
प्रति कृतिसाध्यताज्ञानमिष्टसाधनताज्ञानं च कारणम् । अत
एव वृष्ट्यां कृतिसाध्यताज्ञानाभावान्न चिकीर्षा ॥ १४७ ॥
भाषा-कृतिसाध्यत्वप्रकारिका कृतिसाध्य पदार्थविषयीणी इच्छाका नाम 'चिकीर्षा'
है 'पाकं कृत्या साधयामि' यह कृतिसाध्यविषयीणी इच्छाका परिचायक अनुभव
है. “ इदं मत्कृतिसाध्यम् ” इत्याकारक कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान तथा “ इदं
मदिष्टसाधनम् ” इत्याकारक इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान उक्तचिकीर्षाके निमित्तकारण
हैं. चिकीर्षामें कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानकोभी हेतुता है(अत एव) इसीलिये पुरुषकी
वृष्टिमें चिकीर्षा नहीं होती; क्योंकि वृष्टिमें पुरुषका कृतिसाध्यत्वप्रकारकज्ञान नहींहै.
भाव यह कि- सर्वत्र उभयप्रकारक ज्ञानही चिकीर्षाका जनक है.अन्यतरके न होनेसे
चिकीर्षा नहीं होती ॥ १४७ ॥
बलवद्विष्टहेतुत्वमतिः स्यात्प्रतिबन्धिका ॥
भाषा-अत्यन्त (द्विष्ट) द्वेषका विषय जो दुःख उस दुःखके साधन सर्पादिका
ज्ञान उक्तचिकीर्षाका प्रतिबन्धक है.
बलवदिति। बलवद्विष्टसाधनताज्ञानं तत्र प्रतिबन्धकमतो मधुविष-
संपृक्तान्नभोजने न चिकीर्षा । बलवद्द्वेषः प्रतिबन्धक इत्यन्ये ।

२९२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-प्रबल द्वेषविषयक दुःखादिसाधनताक “इदं मद्दुःखसाधनम्” इत्याकारक
ज्ञान ( तत्र ) उक्त चिकीर्षामें प्रतिबन्धक है, इसलिये विषमिश्रित ( मधु ) शहदादि
अन्न भोजनमें पुरुषकी चिकीर्षा नहीं होती. यहां ( अन्ये ) और कई एक विद्वान्
लोग लाघवसे केवल प्रबल द्वेषहीको उक्तचिकीर्षाका प्रतिबन्धक मानते हैं.
तदहेतुत्वबुद्धेस्तु हेतुत्वं कस्य चिन्मते ॥ १४८ ॥
भाषा-किसी एक विद्वान्के सिद्धान्तमें ( तत् ) बलवदनिष्टके अजनक विषयक
ज्ञानको उक्त चिकीर्षाके प्रति कारणता है ॥ १४८ ॥
तदहेतुत्वेति । बलवदनिष्टाजनकत्वज्ञानं कारणमित्यर्थः। कृति-
साध्यताज्ञानादिमतो बलवदनिष्टसाधनताज्ञानशून्यस्य बलवद्-
निष्टाजनकत्वज्ञानं विनापि चिकीर्षायां विलम्बाभावात्कस्य-
चिन्मत इत्यस्वरसो दर्शितः ॥ १४८ ॥
भाषा-अर्थात् कोई एक विद्वान् ‘ इदं मद्बलवदनिष्टाजनकम् ” इत्याकारक
बलवदनिष्टाजनकत्वप्रकारक ज्ञानको उक्त चिकीर्षामें कारणता मानता है; सो
ठीक नहीं;क्योंकि पुरुषको जिस किसीएक पदार्थमें बलवदनिष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान
नहींहै और कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान है,उसको बलवदनिष्टाजनकत्वप्रकारक ज्ञानसे
विनाभी अर्थात् “ इदं मद्बलवदनिष्टाजनकम् ” इत्याकारक ज्ञान नाभी होय
तो चिकीर्षा होसकती है. यही ( कस्यचित् )किसी के मतमें कार्यकारणभावका व्य-
तिरेक व्यभिचाररूप अस्वरस है ॥ १४८ ॥
द्वेषं निरूपयति, द्विष्टसाधनतेति-
भाषा-एवं 'द्विष्टसाधनता' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार द्वेषका निरूपण करतेहैं-
द्विष्टसाधनताबुद्धिर्भवेद्द्वेषस्य कारणम् ।
भाषा-( द्विष्ट ) द्वेषके विषय दुःखादि साधनविषयक ज्ञान द्वेषका निमित्त
कारण है.
दुःखोपायविषयकं द्वेषं प्रति बलवद्विष्टसाधनताज्ञानं कारणमित्य-
र्थः । बलवदिष्टसाधनताज्ञानं च प्रतिबन्धकं तेन नान्तरीयकदुः-
खजनके पाकादौ न द्वेषः ।
अर्थात् दुःखके उपायविषयक द्वेषके प्रति ( द्विष्ट ) दुःखके उपायविषयक
ज्ञानको कारणता है. उसी पदार्थमें यदि प्रबल इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञानभी होय तो
वह उक्त द्वेषका प्रतिबन्धक होताहै. भाव यह कि-यद्यपि पाकनिर्माणकालमें पुरु

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९३
षको धूमादिजन्य दुःख नियमसे होता है, इसलिये पाकनिर्माणमें द्वेष हुआ चाहिये
तथापि ऐसे स्थलमें “ पाको मदिष्टसाधनम् ” इत्याकारक इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान
उक्त द्वेषका प्रतिबन्धक है; इसीलिये ( नान्तरीयक ) नियमपूर्वक दुःखके जनक
पाकादिकोंमें पुरुषका द्वेष नहीं होता है.
यत्नं निरूपयति, प्रवृत्तिश्चेति-
भाषा-एवं 'प्रवृत्तिश्च' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार प्रयत्नका निरूपण करते हैं-
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च तथा जीवनकारणम् ॥ १४९ ॥
एवं प्रयत्नत्रैविध्यं तान्त्रिकैः परिदर्शितम् ।
भाषा-प्रवृत्ति, निवृत्ति, तथा जीवनकारण ॥ १४९ ॥ भेदसे तीन प्रकारका
प्रयत्न शास्त्रकारोंने निरूपण किया है.
प्रवृत्तिनिवृत्तिजीवनयोनियत्नभेदात् प्रयत्नस्त्रिविध इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् एक प्रवृत्तिरूप प्रयत्न, दूसरा निवृत्तिरूप प्रयत्न, और तीसरा जी-
नकारणप्रयत्न, इस भेदसे प्रयत्न तीन प्रकारका है.
चिकीर्षा कृतिसाध्येष्टसाधनत्वमतिस्तथा ॥ १५०॥
उपादानस्य चाध्यक्षं प्रवृत्तौ जनकं भवेत् ॥
भाषा-उपादेयपदार्थमें कृतिसाध्यविषयिणी इच्छा तथा कृतिसाध्यत्वविशिष्ट
इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान ॥१५०॥ और उपादेयपदार्थके समवायिकारणका साक्षात्कार
ये सभी प्रवृत्तिरूप प्रयत्नके जनक हैं.
चिकीर्षेत्यादि । मधुविषसंपृक्तान्नभोजनादौ बलवदनिष्टानुबन्धि-
त्वेन चिकीर्षाभावान्न प्रवृत्तिरिति भावः । कृतिसाध्यताज्ञाना-
दिवद्वलवदनिष्टाननुबन्धित्वज्ञानमपि स्वतन्त्रान्वयव्यतिरेका-
त्प्रवृत्तौ कारणमित्यपि वदन्ति । कार्यताज्ञानं प्रवर्तकमिति गुरवः।
भाषा-विषमिश्रित मधुर अन्नभोजनमें मरणरूप प्रबल अनिष्टजनकता है इसलिये
वहां चिकीर्षाके न होनेसे प्रवृत्तिभी नहीं होती. यहां कई विद्वान् लोग ऐसेभी कहतेहैं
कि-जैसे कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान तथा इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान प्रवृत्तिमें स्वतंत्र
कारण है; वैसेही बलवदनिष्टाजनकत्वप्रकारक ज्ञानभी अन्वयव्यतिरेकद्वारा
प्रवृत्तिमें स्वतंत्रहीकारण है. यहां ( गुरु ) प्रभाकर कार्यताज्ञानको प्रवर्तक मानते हैं
अर्थात् प्रवृत्तिके प्रति केवल कृतिसाध्यताज्ञानको हेतुता कहते हैं.

२९४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
तथाहि । ज्ञानेन प्रवृत्तौ जननीयायां चिकीर्षातिरिक्तं नापेक्षित-
मस्ति, सा च कृतिसाध्यताज्ञानसाध्या, इच्छायाः स्वप्रकारप्रका-
रकधीसाध्यत्वनियमात् । चिकीर्षा हि कृतिसाध्यत्वप्रकारि-
केच्छा ।
भाषा-( तथाहि ) " इदं मत्कृतिसाध्यम् " इत्याकारक कृतिसाध्यत्वप्रकारक
ज्ञानको प्रवृत्तिजननमें चिकीर्षासे अतिरिक्त किञ्चिदपि अपेक्षित नहीं है, किन्तु
मध्यमें व्यापाररूपेण केवल चिकीर्षा अपेक्षित है, वह चिकीर्षा कृतिसाध्यत्वप्रकार-
कज्ञानजन्या है क्योंकि यह नियम है कि-यद्विशेष्यक यत्प्रकारक इच्छा होतीहै
वह अवश्य तद्विशेष्यकतत्प्रकारकज्ञानजन्या होतीहै और कृतिसाध्यत्वप्रकारक
इच्छाहीका नाम ' चिकीर्षा ' है.
तत्र कृतिसाध्यत्वं प्रकारस्तत्प्रकारकज्ञानं चिकीर्षायां तद्वारा
प्रवृत्तौ च हेतुः, न त्विष्टसाधनताज्ञानं तत्र हेतुः, कृत्यसाध्येऽपि
चन्द्रमण्डलानयनादौ प्रवृत्त्यापत्तेः ।
भाषा-( तत्र ) उस इच्छामें ' कृतिसाध्यत्व ' रूप धर्मका प्रकाररूपेण भान है.
( तत्प्रकारक ) तादृश कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान चिकीर्षामें तथा चिकीर्षाद्वारा
प्रवृत्तिमें कारण है. एवं इष्टसाधनताज्ञानको प्रवृत्तिमें जनकता नहीं है. यदि इष्टसा-
धनत्वप्रकारक ज्ञानकोभी प्रवृत्तिजनकता होय तो पुरुषप्रयत्नसे असाध्य चन्द्रमण्डलके
आनयनादिकोंमेंभी पुरुषकी प्रवृत्ति हुई चाहिये.
ननु कृत्यसाध्यताज्ञानं प्रतिबन्धकमिति चेत् । न । तदभावापेक्ष-
या कृतिसाध्यताज्ञानस्य लघुत्वात् ।
भाषा-ऐसे स्थलमें यदि " चन्द्रमण्डलानयनं मत्प्रयत्नासाध्यम् " इत्याकारक
ज्ञानको प्रवृत्तिके प्रति प्रतिबन्धकता कहो तो यहभी उचित नहीं, क्योंकि प्रतिबन्ध-
काभावमें कारणता माननेकी अपेक्षासे कृतिसाध्यत्वप्रकारकज्ञानमें कारणता माननेमें
लाघव है. भाव यह कि--कृत्यसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानको प्रतिबन्धक मानकर तादृश
प्रतिबन्धकाभावको अर्थात् कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानको आपने प्रवृत्तिके प्रति कारण
मानना होगा इससे केवल कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानमें कारणता माननेमें लाघव है.
न च द्वयोरपि हेतुत्वम् । गौरवात् ।
शंका-कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान तथा इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान ये दोनोंही यदि

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९५
प्रवृत्तिके प्रति कारण मानलिये जाँय तो हानि क्या है? समाधान-यदि एकहीसे
निर्वाह होसके तो दोनोंमें कारणता माननेमें व्यर्थ गौरव है.
ननु तन्मतेऽपि मधुविषसंपृक्तान्नभोजने चैत्यवन्दने च प्रवृत्त्या-
पत्तिः कार्यताज्ञानस्य सत्त्वादिति चेत् । न । स्वविशेषणवत्ताप्र-
तिसन्धानजन्यकार्यताज्ञानस्य प्रवर्तकत्वात् ।
शंका-(त्वत्) प्रभाकरके सिद्धान्तमेंभी विषमिश्रित मधुरान्नभोजनमें तथा (चैत्य)
बुद्धप्रतिमादिके वन्दनमें पुरुषकी प्रवृत्ति हुई चाहिये; क्योंकि-प्रवृत्तिका कारणीभूत
“ विषमिश्रितमधुरान्नभोजनं बुद्धप्रतिमावन्दनं वा मत्कृतिसाध्यम् ” इत्याकारक ज्ञान
विद्यमान है. समाधान-हमारे सिद्धान्तमें हरएक कार्यताज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता
नहीं है किन्तु स्वविशेषणवत्ता प्रतिसन्धानजन्य कार्यताज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता है.
यहां ‘ स्व ’ पदसे प्रर्वतमान पुरुषका ग्रहण है; उसका विशेषण काम्यकर्मस्थलमें
कामना है और नित्यकर्मस्थलमें तत्कालिक शौचादि है; एतादृश विशेषणवत्ताका
पुरुषको जब अपनेमें ( प्रतिसन्धान ) ज्ञान होगा उस विशेषणवत्ताज्ञानको लिङ्गवि-
धया कार्यताज्ञानमें हेतुता है. जैसे “ पाको मत्कृतिसाध्यः, मत्कृतिं विनाऽसत्त्वे सति
मदिष्टसाधनत्वात् ”इस अनुमानजन्य कार्यताज्ञान काम्यस्थलमें प्रवृत्तिका कारण है.
एवं “अहं इदानींतनकृतिसाध्यसन्ध्यावन्दनको ब्राह्मणत्वे सति विहितसन्ध्याकालि-
कशौचादिमत्त्वात् ” इस अनुमानजन्य कार्यताज्ञान नित्यस्थलमें प्रवृत्तिका कारणहै.
काम्ये हि यागपाकादौ कामनास्वविशेषणम् । ततश्च बलवदनि-
ष्टाननुबन्धिकाम्यसाधनताज्ञानेन कार्यताज्ञानम् । ततश्च प्रवृ-
त्तिः । तृप्तश्च भोजने न प्रवर्तते तदानीं कामनायाः पुरुषविशे-
षणत्वाभावात् । नित्ये च शौचादिकं पुरुषविशेषणं तेन शौचा-
दिज्ञानाधीनकृतिसाध्यताज्ञानात्तत्र प्रवृत्तिः ।
भाषा-यागपाकादि काम्य कर्म्मस्थलमें कामना ( स्व ) पुरुषका विशेषण है;
उससे प्रबल अनिष्टासम्बन्धि इष्टसाधनता ज्ञानद्वारा कार्यताका ज्ञान होताहै उस
ज्ञानसे प्रवृत्ति होतीहै. तृप्त हुए पुरुषकी भोजनमें प्रवृत्ति नहीं होती. क्योंकि उस
कालमें कामना पुरुषका विशेषणीभूत नहींहै एवं नित्यकर्मस्थलमें शौचादि पुरुषके
विशेषणरूप हैं इसलिये शौचादिज्ञानाधीन कृतिसाध्यत्वप्रकारकज्ञान होताहै. उससे
( तत्र ) नित्यकर्ममें प्रवृत्ति होतीहै.
ननु तदपेक्षया लाघवेन बलवदनिष्टाननुबन्धीष्टसाधनताविषयक-

कार्यताज्ञानमेव हेतुरस्तु,बलवदनिष्टाननुबन्धित्वं चेष्टोत्पत्तिना-
न्तरीयकदुःखाधिकदुःखजनकत्वम्, बलवद्वेषविषयदुःखजनक-
त्वं वेति चेत् । न । इष्टसाधनत्वकृतिसाध्यत्वयोर्युगपज्ज्ञातुमश-
क्यत्वात् । साध्यत्वसाधनत्वयोर्विरोधात् । असिद्धस्य हि साध्य-
त्वं सिद्धस्य च साधनत्वम् । न चैकमेकेनैकदा सिद्धमसिद्धं चे-
ति ज्ञायते, तस्मात्कालभेदादुभयं ज्ञायत इति !
नैयायिक शंका-इसकी अपेक्षासे अर्थात् बलवदनिष्टासम्बन्धित्वविशिष्ट इष्ट-
साधनताज्ञानजन्य कृतिसाध्यताज्ञानकी अपेक्षासे लाघवसे यदि बलवदनिष्टासम्बन्धि
इष्टसाधनताविषयक कार्यताज्ञानको प्रवृत्तिके प्रतिकारण मानलिया जाय तो हानि
क्याहै? यहां इष्टसाधनतामें बलवदनिष्टाननुबन्धित्व यहहै कि-पाकादिष्ट उत्पादनमें
नियमसे होनेवाले धूमादिजन्य दुःखसे अधिक दुःखके जनक न होना अथवा प्रबल द्वेषके
विषय मरणादिजन्य दुःखके जनक न होना एवं कृतिसाध्यताज्ञानमें इष्टसाधनताज्ञान-
जन्यत्व धर्म माननेकी अपेक्षा इष्टसाधनताविषयकत्व धर्म माननेमें लाघव है. क्योंकि
जन्यजनकभाव सर्वत्र अन्यवहित पूर्वोत्तरादिनियमघटित होताहै. इसलिये इसमें उप-
स्थितिकृत गौरव है. प्रभाकर-( इतिचेन्न ) यह कथन आपका योग्य नहीं;क्योंकि-
इष्टसाधनत्वका तथा कृतिसाध्यत्वका पुरुषको एक कालावच्छेदेन ज्ञान होना
असम्भव है. कारण यह कि-साध्यत्व, साधनत्व, ये दोनों धर्म परस्पर विरोधी हैं,
इसलिये एककालमें इन दोनोंका होनाही असम्भव है. क्योंकि, जो अभी सिद्ध न हुआ
होय, उसका नाम ‘ साध्य ’ है. ऐसे प्रथमलक्षणवृत्तिपाकादि हैं और जो किसी एक-
रूपसे सिद्ध होचुका होय, उसका नाम ‘ साधन ’ है. ऐसे अपाकावस्थापन्नपरिष्कृत
तण्डुलादि हैं. एवं एकपुरुष एकवस्तुको एककालावच्छेदेन सिद्धासिद्ध उभयरूपसे
नहीं जानसकता. भाव यह कि-यदि एक वस्तु सिद्धासिद्ध उभयभेदसे ज्ञात होगी तो
उसका “ असिद्धः पाकः कृतिसाध्यः सिद्धश्चेष्टसाधनं ” इत्याकारक समूहालम्बना-
त्मक ज्ञानही कहना होगा. सो बन नहीं सकता; क्योंकि सिद्धत्व असिद्धत्व ज्ञानोंका
परस्पर विरोध है, इसलिये सिद्ध साधन उभयका कालभेदसे ज्ञान माननाही उचितहै.
मैवम् । लाघवेन बलवदनिष्टाननुबन्धीष्टसाधनत्वे सति कृतिसा-
ध्यताज्ञानस्य तत्र हेतुत्वात् । न च साध्यत्वसाधनत्वयोर्विरोधः ।
यदा कदाचित् साध्यत्वसाधनत्वयोरविरोधादेकदासाध्यत्वसाध-
नत्वयोश्च ज्ञानात् ।

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९७
नैयायिक-(मैवम्) यह कथन आपका युक्त नहीं है; क्योंकि लाघवसे बलवद्
अनिष्टासबन्धि इष्टसाधनत्वविशिष्ट कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानकोही ( तत्र ) प्रवृत्तिमें
कारणता माननी उचित है. एवं साध्यत्व साधनत्व धर्मकाभी परस्पर विरोध नहीं है,
क्योंकि किसीएक कालमें होनेवाले साध्यत्वधर्मका किसी एककालमें होनेवाले साध-
नत्वधर्मके साथ विरोधका होना असम्भव है. भाव यह कि-यद्यपि एककालावच्छेदेन
एक धर्मीमें कृतिसाध्यत्व तथा इष्टसाधनत्वरूप धर्मद्वय विरोधीहैं, तथापि हमको एकका-
लीन कृतिसाध्यत्व इष्टसाधनत्वरूप धर्मके ज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता अपेक्षित नहीं है
किन्तु केवल कृतिसाध्यत्व इष्टसाधनत्वरूप धर्मके ज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता अपेक्षित
है वह धर्मद्वय किंचित् कालभेदसे एकधर्मीमें रहसकते हैं. एवं उनहीको विषय
करनेवाला इष्टसाधनत्वविशिष्ट कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानभी होसकता है और
वही प्रवृत्तिमें कारण है.
नवीनास्तु ममेदं कृतिसाध्यमिति ज्ञानं न प्रवर्तकमनागते तस्य
ज्ञातुमशक्यत्वात्। किंतु यादृशस्य पुंसः कृतिसाध्यं यद्दृष्टं ता-
दृशत्वं स्वस्य प्रतिसन्धाय तत्र प्रवर्तते, तेन 'ओदनकामस्य
तत्साधनताज्ञानवतस्तदुपकरणवतः पाकः कृतिसाध्यस्तादृश-
श्चाहम्' इति प्रतिसन्धाय पाके प्रवृत्तिरित्याहुः। तन्न। स्व-
कल्पितलिप्यादिप्रवृत्तौ यौवने कामोद्भेदादिना सम्भोगादौ च
तदभावात् ।
भाषा-और प्रभाकरके अनुयायी कईएक नवीनलोग तो यह कहतेहैं कि- "इदं
मत्कृतिसाध्यम्" इत्याकारक ज्ञान प्रवृत्तिमें कारणही नहीं है. क्योंकि ( अनागत )
भाविपदार्थमें ( तस्य ) कृतिसाध्यत्वरूप धर्मका ज्ञान होनाही असम्भव है किन्तु
जैसे पुरुषके प्रयत्नसे जिस पदार्थकी सिद्धि जिसने देखी, वह पुरुष अपनेको उस कृत
प्रयत्न पुरुष जैसा मानकर उसी पदार्थकी सिद्धिमें प्रवृत्त होताहै; जैसे पाकमें पुरुषकी
प्रवृत्ति ' ओदनकामस्य ओदनसाधनताज्ञानवतः ओदनोपकरणवतः पाकः कृति-
साध्यः तादृशश्चाहं-अर्थात् ओदनकी कामनावाले तण्डुलादिनिष्ठ ओदनसाधनताज्ञा-
नवाले तथा स्थालीकाष्ठादि ओदनउपकरण सामग्रीवाले पुरुषकी कृतिसे पाकसाध्य
है"और "तादृशश्चाहं-अर्थात् ओदनकामनावान् ओदन साधनताज्ञानवान् तथा ओद-
नोपकरणवान् मैंभी हूं"इत्याकारक ज्ञानद्वारा होती है! ( तन्न ) यह नवीनोंका कथन
सम्यक् नहीं है. क्योंकि अपने संकेतद्वारा कल्पना करी लिपि आदिकी प्रवृत्तिमें तथा
यौवनावस्थामें कामातुर हुए पुरुषकी भोगादि प्रवृत्तिमें उक्तज्ञान नहीं है; अर्थात् "स्व-
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