न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-जिन उपाधिरूप धर्मोंका प्रकृतसाध्यके सहित हेतुके किसीएक अधिक-
रणमें व्यभिचार है, अर्थात् उपाधिसाध्य दोनोंही हेतुके किसी एक अधिकरणमें नहीं
रहते वे सभी उपाधिरूप धर्म साध्यसमानाधिकरणही कहेजातेहैं ॥ १३९ ॥
स्वसाध्येति । स्वमुपाधिः स्वं च साध्यं च स्वसाध्ये तयोर्व्यभि-
चारितेत्यर्थः ॥ १३९ ॥
भाषा-यहां 'स्व' पदसे उपाधिका ग्रहण है और इस 'स्व' पदका 'साध्य'
पदके साथ इतरेतरयोगद्वन्द्व है एवं उपाधिसाध्य दोनोंकी व्यभिचारिता हेतुके किसी
एक अधिकरणमें होनीही उपाधिकी साध्यव्यापकता समझनी चाहिये. यह अर्थ सिद्ध
हुआ ॥ १३९ ॥
उपाधेर्दूषकताबीजमाह, व्यभिचारस्येति-
भाषा--एवं 'व्यभिचारस्य' इत्यादि ग्रन्थसे उपाधिमें दूषकता बीज अर्थात्
उपाधि जैसे परकीय अनुमानको दूषित करतीहै उसका मूल कहतेहैं-
व्यभिचारस्यानुमानमुपाधेस्तु प्रयोजनम् ॥
भाषा-व्यभिचारका अनुमान करवाना अर्थात् हेतुको व्यभिचारी सिद्ध करदेना
उपाधिका मुख्य प्रयोजन है.
उपाधिव्यभिचारेण हेतौ साध्यव्यभिचारानुमानमुपाधेः प्रयोजन-
मित्यर्थः । तथाहि । यत्र शुद्धसाध्यव्यापक उपाधिस्तत्र शुद्धेनै-
वोपाधिव्यभिचारेण साध्यव्यभिचारानुमानम् । यथा धूमवान्
वह्नेरित्यादौ वह्निर्धूमव्यभिचारीतद्व्यापकार्द्रेन्धनसंयोगव्यभि-
चारित्वादिति । व्यापकव्यभिचारिणो व्याप्यव्यभिचारावश्य-
कत्वात् ॥ १ ॥
भाषा-हेतुका यदि किसी एकस्थलमें उपाधिके साथ व्यभिचार होय तो उसीसे
साध्यके साथ हेतुके व्यभिचारकाभी अनुमान होताहै (तथाहि) जिस स्थलमें
उपाधि केवल शुद्धसाध्यकी व्यापक है वहां केवल शुद्ध उपाधि व्यभिचारसेही हेतुमें
साध्यव्यभिचारका अनुमान होताहै. जैसे “ धूमवान् वन्हेः ” इत्यादि स्थलमें यह
अनुमान करसकते हैं कि धूमके व्यापकीभूत आर्द्रन्धनसंयोगका व्यभिचारी होनेसे
वह्निरूप हेतु स्वसाध्यधूमकाभी अवश्य व्यभिचारी है क्योंकि जो व्यापकका
व्यभिचारी होता है वह व्याप्यका व्यभिचारीभी अवश्य होताहै.