न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता, २८७
ग्रहण हुआहै वहां गन्धके अभावके अभावसे अर्थात् गन्धसे इतरत्वधर्मके अत्यन्ता-
भावकी सिद्धि होतीहै अर्थात् जहां गन्ध है वहां इतर जलादिका भेद है तथा इतर
जलादिनिष्ठ इतरत्वधर्मका अत्यन्ताभावभी है, क्योंकि धर्मिभेद धर्मात्यन्ताभाव सह-
वृत्ति एकरूप होते हैं, परन्तु जहां तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्ना जो इतरनिष्ठव्याप्यता
तादृश व्याप्यतािनिरूपित व्यापकताका गन्धाभावमें ग्रहण होताहै वहां तादात्म्य-
सम्बन्धसेही इतरजलादिका अभाव सिद्ध होताहै, उसीका नाम 'अन्योन्याभाव' है.
एवं यत्र संयोगसम्बन्धेन धूमं प्रति संयोगसम्बन्धेन वह्नेर्व्यापक-
ता गृह्यते तत्र संयोगसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकवह्न्यभावेन
जलह्रदे संयोगसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकधूमाभावः सिध्यति।
भाषा-एवं जहां संयोगसम्बन्धेन धूमके प्रति संयोगसम्बन्धेन वह्निनिष्ठ व्याप-
कताका ग्रहण हुआहै वहां संयोगसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक वह्निके अभावसे
जलह्रदमें संयोगसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक धूमाभावकी सिद्धि होती है.
अत्र च व्यतिरेकव्याप्तिग्रहे व्यतिरेकसहचारज्ञानं कारणम् । के-
चित्तु व्यतिरेकसहचारेणान्वयव्याप्तिरेव गृह्यते न तु व्यतिरेक-
व्याप्तिज्ञानमपि कारणम् । यत्र व्यतिरेकसहचाराद्व्याप्तिग्रह-
स्तत्र व्यतिरेकीत्युच्यते। साध्यप्रसिद्धिस्तु घटादावेव जाता,
पश्चात् पृथिवीत्वावच्छेदेन साध्यते इति वदन्ति ।
भाषा-यहां व्यतिरेकव्याप्तिके ग्रहणमें व्यतिरेकसहचारका ज्ञान अर्थात्
“यत्र यत्र साध्याभावस्तत्र तत्र हेत्वभावः” इत्याकारक अभावोंके सहचारका ज्ञान
कारणीभूत है, परन्तु ऐसे स्थलमें उदयनाचार्यानुयायी विद्वान्लोग तो
ऐसा मानतेहैं कि-केवलव्यतिरेकसहचारसेभी अन्वयव्याप्तिकाही ग्रहण होताहै किन्तु
व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान अनुमितिज्ञानके प्रति कारण नहींहै. जिस स्थलमें व्यतिरेकसह-
चारसे व्याप्तिग्रह होताहै वहां वह अनुमान ‘व्यतिरेकी’ कहा जाताहै. इतरभेदरूप
साध्यकी प्रसिद्धि प्रथमघटादिकोंमें होतीहै; पश्चात् पृथिवीत्वावच्छेदेन इतरभेदरूप
साध्यका अनुमान किया जाताहै. भाव यह कि-पक्षके एकअंशमें साध्यसिद्धि यावत्
अंशकसाध्यसाधिका अनुमितिके प्रति प्रतिबन्धक नहीं होसकती.
अर्थापत्तेस्तु नैवेह प्रमाणान्तरतेष्यते ॥
व्यतिरेकव्याप्तिबुद्ध्या चरितार्था हि सा यतः॥१४४॥