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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 350 में से

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पृष्ठ 305

यत्र तु किञ्चिद्धर्मावच्छिन्नसाध्यव्यापक उपाधिस्तत्र तद्धर्मवत्यु-
पाधिव्यभिचारेण साध्यव्यभिचारानुमानम् । यथा स श्यामो मि-
त्रातनयत्वादित्यत्र मित्रातनयत्वं श्यामत्वव्यभिचारि, मित्रातनये
शाकपाकजत्वव्यभिचारित्वादिति।बाधानुन्नीतपक्षेतरस्तु साध्य-
व्यापकताग्राहकप्रमाणाभावात् स्वव्याघातकत्वाच्च नोपाधिः ।
भाषा-एवं जिस स्थलमें किञ्चिद्धर्मावच्छिन्न साध्यका व्यापक उपाधिरूप धर्म है
वहां उसी धर्मवाले हेतुके साथ उपाधिव्यभिचारसे साध्यके व्यभिचारकाभी अनुमान
होताहै. जैसे “ स श्यामो मित्रातनयत्वात् ” इत्यादि स्थलमें यह अनुमान करस-
कतेहैं कि-मित्राके अष्टम गौर पुत्रमें शाकपाकजत्वका व्यभिचार होनेसे मित्रातनय-
त्वरूप हेतु श्यामत्वरूप साध्यका व्यभिचारी है. बाधदोषसहकृत पक्षेतरत्वरूप धर्म
किसी स्थलमेंभी उपाधिरूप नहीं होसकता; क्योंकि प्रथम तो उसकी प्रकृतसाध्यके
साथ व्यापकताका ग्राहक प्रबल प्रमाण कोई नहीं है. भला कथञ्चित् व्यापकताका
ग्रहण मानभी लिया जाय तो उसको स्वव्याघातकता है. भाव यह कि, प्रकृतहेतुके
व्यभिचारानुमापकत्वेन उपाधिको दूषकता है.
बाधोन्नीतस्तु पक्षेतर उपाधिर्भवत्येव यथा 'वह्निरनुष्णः कृतक-
त्वात्' इत्यादौ प्रत्यक्षेण वह्नेरुष्णत्वग्रहे वह्नीतरत्वमुपाधिः ।
यत्रतूपाधेः साध्यव्यापकत्वादिकं सन्दिह्यते स सन्दिग्धोपाधिः ।
पक्षेतरस्तु सन्दिग्धोपाधिरपि नोद्भावनीयः कथकसम्प्रदायानु-
रोधादिति ।
भाषा-एवं यदि पक्षेतरत्वरूप धर्मभी उपाधिरूपसे स्वीकृत होय तो सर्वत्र
अनुमानोंमें पक्षेतरत्वरूप उपाधिका सम्भव होनेसे अनुमानमात्रका उच्छेद हुआ तो
उपाधिको दूषकता कहां रही ? यही उसको स्वव्याघातकत्व है, परन्तु बाधसहकृत
पक्षेतरत्व धर्मभी उपाधिरूप होसकता है; जैसे “वह्निरनुष्णः कृतकत्वात् ” इत्यादि
स्थलमें पहले स्पार्शन प्रत्यक्षसे वह्निमें उष्णता ग्रहण करी अर्थात् पक्षे साध्याभावरूप
बाधका निश्चय किया तो पीछे वह्नीतरत्वरूप उपाधि कह सकते हैं. परन्तु जिस
स्थलमें उपाधिमें साध्यव्यापकताका सन्देह होताहै उस स्थलमें वह सन्दिग्ध उपाधि
कही जातीहै और पक्षेतरत्वरूप धर्म तो सन्दिग्ध उपाधिरूपसेभी वादी प्रतिवादीको
परस्पर उद्बोधन करना योग्य नहीं क्योंकि ऐसा करनाभी ( कथक ) विचारकुशलोंके
सम्प्रदायसे विरुद्ध है.
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