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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 350 में से

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पृष्ठ 307

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २८३
दण्डेन 'गामानय' इत्यादिलौकिकपदानि 'यजेत' इत्यादि वैदिकप-
दानि वा तात्पर्यविषयस्मारितपदार्थसंसर्गज्ञानपूर्वकाणि आकां-
क्षादिमत्पदकदम्बत्वात् 'घटमानय' इतिपदकदम्बवत् । यद्वैते
पदार्था मिथः संसर्गवन्तः, योग्यतादिमत्पदोपस्थापितत्वात्,
तादृशपदार्थवत् । दृष्टान्तेऽपि दृष्टान्तान्तरेण साध्यसिद्धिरिति ।
भाषा-वैशेषिकसिद्धान्तमें प्रत्यक्ष तथा अनुमान ये दोही प्रमाण स्वीकृत हैं
और शब्द तथा उपमानको अनुमानविधयाही प्रमाणता है अर्थात् जुदी प्रमाणता
नहींहै ( तथाहि ) ' दण्डेन गामानय ' इत्यादिलौकिक पद तथा ' यजेत ' इत्यादि
वैदिकपद वक्तृतात्पर्यके विषयभूत जो पदोंद्वारा उपस्थित हुए पदार्थोंका परस्पर संसर्ग,
उस संसर्गका जो ज्ञान तादृश ज्ञानपूर्वक हैं; क्योंकि यह सब आकांक्षा योग्यतादि-
वाला पदसमूह प्रतीत होताहै. जैसे ' घटमानय ' यह पदसमूह आकांक्षा योग्यता-
आदिवाला है इसीलिये वक्तृतात्पर्यके विषयभूत उक्त संसर्गके ज्ञानपूर्वकभीहै अथवा
ये घटपटादि यावत् पदार्थ वक्तृतात्पर्यके विषयभूत परस्पर संसर्गवाले हैं; क्योंकि
जहां तहां इनकी आकांक्षा योग्यतावाले पदोंसेही उपस्थिति होती है ( तादृश ) प्रसिद्ध
पदार्थकी तरह सर्वत्र अनुभव करना उचित है, इत्यादि अनुमानद्वारा प्रयोज्यवृद्धको
अनुभव हो सकताहै और यदि किसीको दृष्टान्तस्थलमेंभी सम्यक् साध्यसिद्धि न
होय तो उसी पदार्थको पक्षस्थापन करके वहां प्रसिद्ध दृष्टान्तान्तरसे साध्यसिद्धि
होसकतीहै.
एवं गवयव्यक्तिप्रत्यक्षानन्तरं गवयपदं गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तक-
मसति वृत्त्यन्तरे वृद्धैस्तत्र प्रयुज्यमानत्वात्, असति च वृत्त्य-
न्तरे वृद्धैर्यत्र यत्प्रयुज्यते तत्तत्प्रवृत्तिनिमित्तकम् । यथा
गोपदं गोत्वप्रवृत्तिनिमित्तकम् ।
भाषा-ऐसेही गवयादिव्यक्ति साक्षात्कारके पश्चात् ' गवय ' पद गवयत्वप्रवृत्ति
निमित्तक है अर्थात् 'गवय' पदका प्रवृत्तिनिमित्तधर्म 'गवयत्व' है; क्योंकि वृद्धलोग
' गवय ' पदका और कहीं प्रयोग न करके केवल गवयव्यक्तिमेंही प्रयोग करतेहैं
अर्थान्तरमें वृत्त्यभाववाले पदका वृद्धलोग जहां जिसका प्रयोग करतेहैं वहां वह पद
उसी धर्मके प्रवृत्तिनिमित्तवाला होताहै जैसे ' गो ' पद गोत्वधर्मके प्रवृत्तिनिमित्त
वाला है अर्थात् ' गो ' पदका प्रवृत्तिनिमित्तधर्म गोत्व है.