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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 302

२७८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
धर्मभी नहीं बन सकता परन्तु विद्वान् लोगोंने इसकोभी उपाधिरूपसे स्वीकार किया
है यान्ते आपके लक्षणमेंही न्यूनता माननी उचित है; एवं आपके लक्षणानुसार
“ ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात् ” इस अनुमानमें ‘ भावत्व ’ धर्मभी उपाधि नहीं हुआ
चाहिये क्योंकि-यह धर्मभी साध्यका व्यापक नहींहै. देखिये-विनाशित्त्वरूप साध्य
तो प्रागभावमेंभी है परन्तु वहां 'भावत्व' रूप उपाधि नहींहै.एवं भावत्वधर्म साध्यका
व्यापक न होनेसे आपके उपाधिलक्षणका लक्ष्यभी नहीं हो सकता परन्तु विद्वान्
लोग इस धर्मकोभी प्रकृतमें उपाधिरूपसे स्वीकार करतेहैं; इसलिये आपके लक्षणमेंही
न्यूनता माननी उचित है.
यद्धर्मावच्छिन्नसाध्यव्यापकत्वं तद्धर्मावच्छिन्नसाधनाव्यापकत्व-
मित्यर्थे तात्पर्यात् । १ ।
समा०-हमारे मूलोक्त “ साध्यस्य व्यापको यस्तु ” इत्यादि ग्रन्थका यह
तात्पर्य्य है कि-उपाधिरूप धर्म यद्धर्मावच्छिन्नसाध्यका व्यापक होय तद्धर्माव-
च्छिन्न साधनका अव्यापक होना चाहिये अर्थात् यादृश धर्मविशिष्ट साध्यके साथ
उपाधिका सहचार होय तादृश धर्मविशिष्ट हेतुके साथ अवश्य व्यभिचार होना
चाहिये. एवं यह लक्षण यावद् उपाधिस्थलमें अनुगत है. प्रथम “ धूमवान् वह्नेः ”
इस स्थलमें 'आर्द्रेन्धनसंयोग' को देखिये.यहां यद्धर्मपदेन पर्वत अयोगोलकअन्यतरत्व
रूप धर्मका ग्रहण करनेसे तदवच्छिन्न आधारतानिरूपित आधेयतासम्बन्धसे पर्वता-
योगोलकअन्यतरत्वावच्छिन्न धूमरूप साध्यके साथ आर्द्रेन्धनसंयोगरूप उपाधिकी
व्यापकता है; तथा पर्वतायोगोलकान्यतरत्वावच्छिन्न वह्निरूप हेतुके साथ उक्त उपा-
धिकी अव्यापकता है । १ ।
मित्रातनयत्वावच्छिन्नश्यामत्वस्य व्यापकं शाकपाकजत्वम् ।
तदवच्छिन्नसाधनाव्यापकं च । २ ।
भाषा-एवं “ स श्यामः मित्रातनयत्वात् ” इस स्थलमें यद्धर्मपदेन 'मित्रात-
नयत्वरूप धर्मका ग्रहण करनेसे समानाधिकरणसम्बन्धेन मित्रातनयत्वावच्छिन्न
श्यामत्वरूप साध्यका व्यापक तथा तादात्म्येन मित्रातनयत्वावच्छिन्न जो मित्रातन-
यत्व उसका अव्यापक शाकपाकजत्वरूप उपाधि है । २ ।
एवं पक्षधर्मबहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्नप्रत्यक्षत्वस्य व्यापकमुद्भूतरूपव-
त्त्वं बहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्नसाधनस्याव्यापकं च । ३ ।
भाषा-‘एवं “ वायुः प्रत्यक्षः प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वात् ” इस स्थलमें यद्धर्मपदेन
‘ बहिर्द्रव्यत्व ’ रूप धर्मका ग्रहण करनेसे बहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्न प्रत्यक्षत्वरूप साध्यका