न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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कहींभी निश्चित नहींहै, एवं निश्चित साध्यवाले सपक्ष स्थलके न होनेसे यह अनुमान
'केवलव्यतिरेकी' है २। जिसका सपक्ष विपक्षस्थल निश्चित होय वह अनुमान
'अन्वयव्यतिरेकी' है; जैसे ' वह्निमान् धूमात् ' इत्यादि स्थलमें सपक्ष महानसादि
तथा विपक्ष जलह्रदादि निश्चित हैं ॥ ३ ॥
तत्रहि व्यतिरेकिणि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानं कारणं तदर्थं व्यतिरेक-
व्याप्तिं निर्वक्ति, साध्याभावव्यापकत्वमिति-
भाषा-उनमें व्यतिरेकिअनुमानके प्रति व्यतिरेकव्याप्ति ज्ञानको कारणता है उसके
लिये 'साध्याभाव' इत्यादि मूलसे ग्रन्थकार व्यतिरेकव्याप्तिका निर्वचन करते हैं-
साध्याभावव्यापकत्वं हेत्वभावस्य यद्भवेत् ॥ १४३॥
भाषा-साध्याभावनिरूपित हेत्वाभावमें व्यापकताका नाम 'व्यतिरेक व्याप्ति' है.
साध्याभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वमित्यर्थः । अत्रेदं बोध्य-
म् । यत्सम्बन्धेन यदवच्छिन्नं प्रति येन सम्बन्धेन येन रूपेण व्या-
पकता गृह्यते तत्सम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकतद्धर्मावच्छिन्ना-
भाववत्ताज्ञानात् तत्सम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकतद्धर्माव-
च्छिन्नाभावस्य सिद्धिरिति ।
भाषा-अर्थात् वह्नयादिसाध्याभावका व्यापकीभूत जो धूमाभाव तादृशाभाव
प्रतियोगित्वरूपही धूमरूप हेतुके सिरपर व्यतिरेकव्याप्ति है. यहां इतना औरभी
जानना चाहिये कि-जिस सम्बन्धसे यद्धर्मावच्छिन्नके प्रति जिसकी जिस सम्बन्धसे
जिस रूपसे व्यापकताका ग्रहण होय उसका उसी सम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक
उसी धर्मावच्छिन्नाभाववत्ताके ज्ञानसे उसी सम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक उसी
धर्म्मावच्छिन्नके अभावकी सिद्धि होती है-इति ।
इत्थं च यत्र विशेषणतादिसम्बन्धेनेतरत्वव्यापकत्वं गन्धात्यन्ता-
भावे गृह्यते तत्र गन्धाभावाभावेनेतरत्वात्यन्ताभावः सिध्यति ।
यत्र तु तादात्म्यसम्बन्धेनेतरव्यापकता गन्धाभावस्य गृह्यते ।
तत्र तादात्म्यसम्बन्धेनेतरस्याभावः सिध्यति, स एवान्योन्या-
भावः ।
भाषा-( इत्थञ्च ) इस रीतिसे जहां गन्धके अत्यन्ताभावमें पृथिवी इतरवृत्ति
इतरत्वधर्मनिष्ठ व्याप्यतानिरूपित व्यापकता ' विशेषणता ' स्वरूपसम्बन्धसे