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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 303

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७९
व्यापक तथा बहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्न प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वरूप हेतुका अव्यापक उद्भूतरूप-
वत्त्वरूप उपाधि है ३ ।
एवं 'ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात्' इत्यत्र जन्यत्वावच्छिन्नसाध्य-
व्यापकंभावत्वम् । ४ ।
भाषा—एवं “ ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात्" इस स्थलमें यद्धर्मपदेन जन्यत्वरूप
धर्मका ग्रहण करनेसे जन्यत्वावच्छिन्न विनाशित्वरूप साध्यका व्यापक तथा तादा-
त्म्येन जन्यत्वावच्छिन्न जो जन्यत्व उसका अव्यापक भावत्वरूप उपाधि है । ४ ।
सद्धेतोस्त्वेतादृशो धर्मो नास्ति यदवच्छिन्नस्य साध्यस्य व्याप-
कं तदवच्छिन्नस्य साधनस्याव्यापकं किंचित् स्यात् । व्यभि-
चारिणि त्वन्तत उपाध्यधिकरणं यत्साध्याधिकरणं यच्चोपाधि-
शून्यं साध्यव्यभिचारनिरूपकमधिकरणं तदन्यतरत्वावच्छिन्न-
स्य साध्यस्य व्यापकत्वं साधनस्य चाव्यापकत्वमुपाधेः
सम्भवतीति ॥१३८॥
भाषा—‘वन्हिमान् धूमात्' इत्यादि सद्धेतुस्थलोंमें तो ऐसा धर्म कोई नहीं
मिलसकता कि यादृशधर्मविशिष्ट साध्यके साथ किसी एक उपाधिरूप धर्मकी
व्यापकता तथा तादृश धर्मविशिष्ट हेतुके साथ उसी उपाधिरूप धर्मकी अव्यापकता
होय और “ धूमवान्वन्हेः” इत्यादि व्यभिचारि स्थलमें तो (अन्ततः) यदि
धर्मान्तर नभी स्फुरण होय तो उपाधिके अधिकरण जो साध्याधिकरण पर्वत महान-
सादि आर उपाधिसे शून्य तथा साध्यव्यभिचारनिरूपक हेतुके अधिकरण जो अयो-
गोलकादि एतद् अन्यतरत्वावच्छिन्न साध्यव्यापकता अर्थात् पर्वत अयोगोलकान्यतर-
त्वविशिष्ट धूमरूप साध्यका व्यापक तथा पर्वतअयोगोलकान्यतरत्वविशिष्ट वह्नयादि
हेतुका अव्यापक आर्द्रन्धनसंयोगादिरूप उपाधिधर्म होसकताहै ॥१३८॥
अत एव लक्ष्यमप्युपाधिस्वरूपमेतदनुसारेण दर्शयति, सर्वे इति-
भाषा-मूलकारके “ साध्यस्य व्यापको यस्तु ” इत्यादि ग्रन्थका ' यद्धर्मा-
वच्छिन्न ' इत्यादि लक्षणहीमें तात्पर्य है (अत एव ) इसीलिये इस लक्षणका लक्ष
उपाधिका स्वरूपभी इसी लक्षणके अनुसार 'सर्वे' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार
दिखलाते हैं-
सर्वे साध्यसमानाधिकरणाः स्युरुपाधयः ॥
हेतोरेकाश्रये येषां स्वसाध्यव्यभिचारिता ॥१३९॥