न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
यद्वा गवयपदं सप्रवृत्तिनिमित्तकं साधुपदत्वादित्यनुमानेन पक्ष-
धर्मताबलाद्गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तकत्वं सिद्ध्यति ।
भाषा-अथवा 'गवय' पद (साधु) शुद्धपद होनेसे अवश्य किसी एक प्रवृत्तिनि-
मित्त धर्मवाला है अर्थात् शुद्ध पद है इसलिये कोईएक इसका प्रवृत्तिनिमित्तधर्म
अवश्य होना चाहिये, इस अनुमानद्वारा पक्षधर्मताके बलसे 'गवय' पदका प्रवृत्ति
निमित्त धर्म गवयत्व सिद्ध होसकता है,
तन्मतं दूषयति, तन्न सम्यगिति-
भाषा-यह पूर्वोक्त वैशेषिकका सिद्धान्त 'तन्न सम्यक्' इत्यादि ग्रन्थसे मूल-
कार दूषित करतेहैं-
तन्न सम्यग्विना व्याप्तिबोधं शब्दादिबोधतः : १४१ ।।
भाषा-यह पूर्वोक्त सिद्धान्त यथार्थ नहीं है, क्योंकि व्याप्तिज्ञानसे विनाभी
शब्दादिसे शाब्दबोध होना अनुभव सिद्ध है ॥ १४१ ॥
व्याप्तिज्ञानं विनापि शब्दादितो शाब्दबोधस्यानुभवसिद्धत्वा-
त् । न हि सर्वत्र शब्दश्रवणानन्तरं व्याप्तिज्ञाने प्रमाणमस्तीति ।
किंच सर्वत्र शाब्दस्थले यदि व्याप्तिज्ञानं कल्प्यते तदा सर्वत्रा-
नुमितिस्थले पदज्ञानं कल्पयित्वा शाब्दबोध एव किं न स्वी-
क्रियत इति ॥ १४१ ॥
भाषा-सर्वस्थलोंमें शब्दश्रवणसे पश्चात् अवश्य व्याप्तिज्ञानके होनेमें कोई प्रबल
युक्ति या प्रमाण नहीं है; क्योंकि व्याप्तिज्ञानके विनाभी शब्दादिजन्य शाब्दबोध अनु-
भवसिद्ध हैं. (किञ्च) सर्वत्र शाब्दबोधस्थलमें यदि आप अनुमितिज्ञानकी अन्यथानुप-
पत्तिसे व्याप्तिज्ञानकी कल्पना करतेहैं तो हम कहतेहैं कि, सर्वत्र अनुमितिस्थलमें पद-
स्मरणकी कल्पनासे शाब्दबोधहीको आप स्वीकार क्यों नहीं करलेते ? भाव यह कि
कल्पना उभयत्र तुल्यही है, विनिगमनाविरहसे आप विपरीतही क्यों नहीं मानलेते ?
त्रैविध्यमनुमानस्य केवलान्वयिभेदतः ॥
द्वैविध्यं तु भवेद्व्याप्तेरन्वयव्यतिरेकतः ॥ १४२ ॥
अन्वयव्याप्तिरुक्तैव व्यतिरेकादथोच्यते ॥
भाषा-केवलान्वयि भेदसे अनुमान तीन प्रकारका है और अन्वयव्यतिरेकभेदसे
व्याप्ति दो प्रकारकी है. उसमें अन्वयव्याप्तिका स्वरूप तो पूर्व कहचुकेहैं; शेष व्यति-
रेकव्याप्तिका स्वरूप यहां कहते हैं-