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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 350 में से

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पृष्ठ 309

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २८५
त्रैविध्यमिति । अनुमानं हि त्रिविधं-केवलान्वयिकेवलव्यतिरे-
क्यन्वयव्यतिरेकिभेदात् । तत्रासद्विपक्षः केवलान्वयी यथा 'घटो
ऽभिधेयः प्रमेयत्वात्' इत्यादौ, तत्र हि सर्वस्यैवाभिधेयत्वाद्विप-
क्षासत्त्वम् ।
भाषा-केवलान्वयि केवलव्यतिरेकि तथा अन्वयव्यतिरेकि भेदसे अनुमान तीन
प्रकारका है, उनमें जिसका विपक्षस्थल कहीं न मिले वह केवलान्वयि है; जैसे 'घटो
ऽभिधेयः प्रमेयत्वात्' इत्यादि स्थलमें ईश्वरइच्छाविषयका नाम 'अभिधेय' है और
ईश्वरप्रमाविषयका नाम 'प्रमेय' है. एवं अभिधेयभी पदार्थमात्र है और प्रमेयभी पदार्थ
मात्रहै. एवं प्रमेयत्वरूप हेतुका निश्चित साध्याभाववद् विपक्षस्थल कोई नहीं है, याते
यह केवलान्वयि है.
ननु सर्वेषां धर्माणां व्यावृत्तत्वात्केवलान्वय्यसिद्धिरिति चेत् ।
न । व्यावृत्तत्वस्य सर्वसाधारप्ये तस्यैव केवलान्वयित्वात् ।
किंचवृत्तिमदत्यन्ताभावाप्रतियोगित्वं केवलान्वयित्वम् । तच्च ग-
गनाभावादौ प्रसिद्धम् । १ ।
शंका-सम्पूर्णपदार्थोंके यावत् धर्म व्यावृत्त हैं अर्थात् जुदा जुदा हैं यावत् पदार्थोंमें
अनुगत एक धर्म कोई नहीं है इसलिये केवलान्वयि धर्मकी सिद्धि नहीं होसकती
समाधान-व्यावृत्त पदार्थोंके सिरपर रहनेवाला व्यावृत्तत्वधर्म सर्वसाधारण है,
इसलिये वह केवलान्वयि होसकताहै. ( किञ्च ) घटपटादि वृत्तिमत् पदार्थोंके
अत्यन्ताभावके अप्रतियोगीका नाम 'केवलान्वयि' है. ऐसे गगनाभावादि कईएक
पदार्थ हैं १ ।
असत्सपक्षः केवलव्यतिरेकी, यथा 'पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते गन्ध-
वत्त्वात्' इत्यादौ । तत्र हि जलादित्रयोदशभेदस्य पूर्वमनि-
श्चिततया निश्चितसाध्यवतः सपक्षस्याभाव इति । २ । सत्सपक्ष
विपक्षोऽन्वयव्यतिरेकी, यथा 'वह्निमान् धूमात्' इत्यादौ । तत्र
सपक्षस्य महानसादेर्विपक्षस्य जलह्रदादेश्च सत्त्वादिति ॥ ३ ॥
भाषा-जिसका निश्चित साध्यवाला सपक्ष स्थल न होय वह अनुमान 'केवल-
व्यतिरेकी' है. जैसे “पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्” इत्यादि स्थलमें
जलादि आठ तथा गुणादि पांच इन त्रयोदशका भेद पृथिवीमें इस अनुमानसे पहले