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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६७
त्वप्रकारकज्ञानत्वात् । एवमिदं जलत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा स्नेह-
वति जलत्वप्रकारकज्ञानत्वात् ।
भाषा-( तथाहि ) वह अनुमान इस रीतिसे करना चाहिये कि-यह ज्ञान
( संवादि ) सफलप्रवृत्तिका जनक होनेसे प्रमारूप है. ( यन्नैवं ( जो सफल )
प्रवृत्तिका जनक नहीं होता ( तन्नैवं ) वह प्रमारूपभी नहीं होता; ( यथा ) जैसे
अप्रमाज्ञान सफलप्रवृत्तिजनकभी नहीं है इसलिये प्रमाभी नहीं है. ऐसेही प्रवृत्तिके
अजनक ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वके ग्राहक अनुमानभी है; जैसे यह पृथिवीत्व प्रकारकज्ञान
गन्धवालेमें पृथिवीत्व प्रकारकज्ञान होनेसे प्रमारूप है.भाव यह कि-गन्ध केवल पृथि-
वीहीका व्याप्यधर्म ह एवं यदि उस गन्धवालेमें “ इयं पृथिवी ” इत्याकारक
पृथिवीत्वप्रकारक ज्ञान होगा तो वह अवश्य प्रमारूपही होगा. ऐसेही यह “ इदं
जलं ” इत्याकारक जलत्वप्रकारक जलविशेष्यक ज्ञानभी स्नेहवालेमें जलत्वप्रकारक
ज्ञान होनेसे प्रमारूप है.
न च हेतुज्ञानं कथं जातमिति वाच्यम्। पृथिवीत्वप्रकारकत्वस्य
स्वतो ग्राह्यत्वात्, तत्र गन्धग्रहेण गन्धवद्विशेष्यकत्वस्यापि
सुग्रहत्वात् । तत्प्रकारकत्वावच्छिन्नतद्विशेष्यकत्वं परं न गृह्यते
संशयानुरोधात् ।
शंका-इन स्थलोंमें पहले हेतुका ज्ञान कैसे होताहै? समा०-यहां पृथिवीत्वप्रकार-
कत्वका अर्थात् पृथिवीत्वप्रकारावगाही ज्ञाननिष्ठ धर्मका स्वतो ग्रहण होताहै; एवं
पृथिवीमें गन्धके ग्रहणसे गन्धवद्विशेष्यकत्वका अर्थात् गन्धवद्विशेष्यावगाहि ज्ञाननिष्ठ
धर्म्मकाभी स्वतोही ग्रहण होताहै किन्तु केवल संशयानुपपत्तिके अनुरोधसे पृथिवी-
त्वप्रकारकत्वावच्छिन्न पृथिवीत्त्ववद्विशेष्यकत्व धर्ममात्रका ग्रहण नहीं होता.
न च प्रमात्वस्य साध्यस्य प्रसिद्धिः कथमिति वाच्यम् । इदं
ज्ञानप्रमात्वस्य स्वतो ग्राह्यत्वात् ।
शंका-प्रमात्वात्मक साध्यकी प्रसिद्धि प्रथम कौन स्थलमें है और कैसे
होती है? समाधान-( इदन्ता ) ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वधर्मका स्वतो ग्रहण होताहै. भाव
यह कि-इदन्ताज्ञानमें “इदमनिदं न वा” इत्याकारक सन्देह कभी किसीको नहीं होता
इसलिये यह स्वतो ग्राह्य है.
न च प्रकारभेदेन प्रामाण्यभेदाद्धटत्वप्रकारकत्वादेः कथं प्रसिद्धि-
रिति वाच्यम् । घटत्वप्रकारकत्वस्य स्वविशेष्यकत्वस्य च स्व-

तो ग्राह्यत्वात् । घटस्य च पूर्वमुपस्थितत्वात् । घटविशेष्यकं
घटत्वप्रकारकमिति ज्ञाने प्रामाण्यस्य बाधकाभावः । व्यवसा-
यपरं तु प्रामाण्यं न गृह्यते तत्र संशयसामग्रीसत्त्वे संशयस्यैवो-
पपत्तेः ।
शंका-इदन्ताज्ञाननिष्ठ प्रमात्वधर्म स्वतो ग्राह्य रहो परन्तु प्रकारभेदसे प्रमात्व-
काभी तो भेद है. एवं घटत्वप्रकारकत्वकी अर्थात् घटत्वप्रकारावगाही ज्ञाननिष्ठधर्मकी
प्रसिद्धि कैसे होसकतीहै? समा०-घटत्वप्रकारकत्वका अर्थात् घटत्वप्रकारावगाहि
ज्ञाननिष्ठ धर्मका तथा स्वविशेष्यकत्वका अर्थात् घटत्ववद्विशेष्यावगाहि ज्ञाननिष्ठ
धर्मकाभी स्वतो ग्रहण होताहै. घटको प्रथम उपस्थित होनेसे घटनिष्ठ विशेष्यताव-
गाहि ज्ञाननिष्ठप्रमात्वग्रहण करनेमें तथा घटत्वनिष्ठप्रकारतावगाहि ज्ञाननिष्ठप्रमा-
त्वके ग्रहण करनेमें कोई बाधक नहीं है. भाव यह कि-विशकलित विशेष्यविशेष-
णावगाहि ज्ञानगत प्रमात्वधर्मका स्वतोही ग्रहण हो सकताहै; किन्तु केवल विशेषण,
विशेष्य उभयविशिष्टावगाहि ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वका स्वतो ग्रहण नहीं होता क्योंकि वहां
संशयसामग्रीके होत संते संशयही उत्पन्न होताहै.
किंचाभ्यास‌दशायां तृतीयानुव्यवसायादिना प्रामाण्यस्य स्वत
एव ग्रहसम्भवात् प्रथमानुव्यवसायपरं न तद्ग्राहकमिति
कल्प्यते संशयानुरोधात् ।
भाषा-(किञ्च ) अभ्यासदशामें अर्थात् जहां ज्ञानके सजातीय ज्ञानमें प्रमा-
त्वग्रहण होचुका है वहां तीसरे ( अनुव्यवसाय) ज्ञानविषयक ज्ञानद्वारा प्रमात्वधर्मका
स्वतोही ग्रहण होसकता है. एवं ऐसे स्थलमेंभी संशयानुरोधसे केवल यही कल्पना
करसकतेहैं कि-प्रथम अनुव्यवसायात्मक ज्ञान प्रमात्वधर्मका ग्राहक नहीं होसकता
अन्यथा संशय नहीं हुआ चाहिये.
अथ प्रामाण्यानुमितौ प्रामाण्याग्रहेण तस्या विषयनिश्चय-
रूपत्वार्थं तत्र प्रामाण्यग्रहो वाच्यः, सोऽप्यनुमित्यन्तरेणेति
फलमुखी कारणमुखी वाऽनवस्थेति चेत् । न ।
शंका-प्रमात्वधर्मग्राहक पूर्वोक्त अनुमितिज्ञानमेंभी तो प्रमात्वग्रहण नहीं हुआहै
( तस्याः ) उस अनुमितिके विषयकी निश्चयरूपताके लिये ( तत्र ) उस अनुमि-
तिज्ञानमेंभी प्रमात्वग्रह अवश्य हुआ चाहिये. एवं उस अनुमितिज्ञानमेंभी प्रमात्वका
ग्रहण दूसरी अनुमितिहीसे होगा. एवं दूसरीमें प्रमात्वग्रहार्थ तीसरीकी अपेक्षा होगी.

'परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६९
ऐसेही आगे आगे फलमुखी अर्थात् प्रमात्वग्रहरूप फलप्रधाना या कारणमुखी
अर्थात् अनुमितिज्ञानात्मक कारण प्रधानाऽनवस्थाभी हो सकती है अर्थात् एकप्र-
मात्वकी सिद्धयर्थ दूसरे ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वकी अपेक्षा, एवं द्वितीयप्रमात्वकी सिद्धयर्थ
तृतीयज्ञाननिष्ठ प्रमात्वकी अपेक्षा, एवं आगे आगे इस रीतिसे फलमुखी अनवस्था
होसकतीहै. एवं प्रथम अनुमितिज्ञानरूप कारणकी पुष्टिके लिये द्वितीय अनुमिति-
ज्ञानकी अपेक्षा, द्वितीयके लिये तृतीयकी अपेक्षा, एवं आगे २ इस रीतिसे कारण-
मुखी अनवस्था होसकतीहै ।
अगृहीताऽप्रामाण्यग्राहकस्यैव निश्चयरूपत्वात् । यत्र च प्रामा-
ण्यसंशयस्तत्रैव परं प्रामाण्यानुमितेरपेक्षा, यावदाशङ्कं प्रामा-
ण्यानुमितिरिष्यत एव ।
समा०-अनवस्था नहीं होसकती क्योंकि जिस ज्ञानमें अप्रमात्वग्रह नहीं गृहीत
हुआ है अर्थात् “ इदं ज्ञानमप्रमा ” इत्याकारक व्यवहार जिस ज्ञानमें नहीं हुआ
है; हम लोग उस ज्ञानको निश्चयरूपही मानते हैं किन्तु जिस स्थलमें ज्ञाननिष्ठप्रमा-
त्वका संशय होता है वहांही केवल प्रामाण्यग्राहक अनुमितिज्ञानकी अपेक्षा होती है
स्थलान्तरमें नहीं होती जहां पर्यन्त आशंका होय वहां पर्यन्त प्रामाण्यग्राहक अनु-
मितिकोभी हम स्वीकार करतेहैं. भाव यह कि-यदि प्रमात्वग्राहक उत्तरउत्तर सभी
ज्ञानोंमें “ इदं ज्ञानं प्रमा न वा ” इत्याकारक आशंका उत्पन्न होती जाय तो अन-
वस्था होसकती है; परन्तु ऐसा तो कदापि सम्भव नहीं इसलिये अनवस्था नहीं
होसकती.
सर्वत्र तु न संशयः क्वचित्कोट्यनुपस्थितेः, क्वचिद्विशेषदर्शना-
दितः, क्वचिद्विषयान्तरसञ्चारादिति संक्षेपः । ]
भाषा-और युक्तिसेभी हरएक स्थलमें संशयका होना दुर्घट है; वह यह है कि-
संशयज्ञान स्वभावसे परस्पर विरुद्ध नानाधर्मावगाहि होता है. एवं जहां कोट्यनुपस्थित
है अर्थात् जहां विरोधि धर्मकी उपस्थिति नहीं हुई है वहां संशय नहीं होसकता
एवं जहां विषयका विशेषरूपसे दर्शन होचुकाहै वहांभी संशय नहीं होसकता; अथवा
जहां एकविषयविषयक ज्ञानानन्तर शीघ्रही ज्ञान प्रवाहका विषयान्तरमें संचार हुआ
है वहांभी संशय नहीं होसकता; इत्यादि अनेकस्थलोंमें संशयके असम्भवसे पूर्वोक्त
फलमुखी या कारणमुखी अनवस्थाकी शंकाभी निरर्थक है. (इति संक्षेपः) यह संक्षेपसे
ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वका परतो ग्रहण दिखलाया है. यहां प्रमाके लक्षणमें ( गुरु ) प्रभाकर
शंका करतेहैं. ]

२७० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-

ननु सर्वेषां ज्ञानानां यथार्थत्वात् प्रमालक्षणे तद्वद्विशेष्यकत्वं
विशेषणं व्यर्थम् ।
शंका-सभी ज्ञान यथार्थही होतेहैं इसलिये प्रमाज्ञानके लक्षणमें 'तद्वद्विशेष्यकत्व'
यह विशेषण देना व्यर्थ है किन्तु ( तत्मकारक ज्ञानं प्रभा ) इतना मात्र कहना-
उचित है. भाव यह कि-अन्यथाख्यातिके वारणार्थ आपने प्रमालक्षणमें 'तद्वद्विशेष्यकत्व'
यह विशेषण दिया है सो वह अन्यथाख्याति कुछ वस्तु नहीं क्योंकि "ख्यानं ख्यातिः
अन्यथा प्रकारान्तरेण ख्यातिः अन्यथाख्यातिः " इस व्युत्पत्तिसे प्रकारान्तरसे वस्तु
प्रतीतिका नाम 'अन्यथाख्याति' है और किसी वस्तुकीभी कहीं प्रकारान्तरसे प्रतीति
होतीही नहीं किन्तु जो वस्तु जैसी होतीहै उसकी वैसीही प्रतीतिभी होती है.
न च रङ्गे रजतार्थिनः प्रवृत्तिर्भमजन्या न स्यात्, तव मते भ्रम-
स्याभावादिति वाच्यम् । तत्र हि दोषाधीनस्य पुरोवर्तिनि स्व-
तन्त्रोपस्थितरजतभेदाग्रहस्य हेतुत्वात् ।
नैयायिक-रजतार्थि पुरुषकी जो राँगेमें भ्रमजन्या प्रवृत्ति वह आपके मतसे
नहीं हुई चाहिये क्योंकि आपके सिद्धान्तमें ( भ्रम ) अन्यथाख्याति कुछ वस्तु नहीं
है. प्रभाकर-अग्रभागवर्ति राँगेआदि पदार्थोंमें रजतार्थिपुरुषकी निष्फल प्रवृत्तिमें
केवल दोषवशसे स्वतंत्र उपस्थित रजतादि पदार्थके भेदाग्रहकी हेतुता है. भाव यह कि-
आपने प्रमाताके लोभभयादि दोषसे और प्रमाणके पित्तादि दोषसे तथा प्रमेयके
सादृश्यादि दोषसे राँगे आदिकोंमें रजतादि पदार्थोंकी अन्यथाख्याति मानी है परन्तु
यह मन्तव्य ठीक नहीं है, क्योंकि ज्ञान ज्ञेयवस्तुके अनुसारही होता है; जहां ज्ञेय
वस्तु राँगा या रज्जुआदि है वहां रजत तथा सर्पादिका ज्ञान मानना अत्यन्त असंगत
है; इसलिये ऐसे स्थलोंमें पूर्वोक्त दोषोंको केवल भेदाग्रहमात्रमें कारणता माननीही
उचित है उसका प्रकार यह है कि-जहां राँगे आदिमें रजतादिकी प्रतीति हुई है,
वहां नेत्रका अपनी वृत्तिद्वारा राँगे आदिके साथ सम्बन्ध हुए राँगे आदिका इदंरूपसे
सामान्यज्ञान होता है और रजतका स्मरण होता है एवं भ्रमस्थलमें " इदं रजतम् "
ये दो ज्ञान हैं. उसमें 'इदम' अंश तो राँगेका है इसलिये सामान्यरूपसे प्रत्यक्षात्मक
है और रजतअंशमें स्मरणात्मक ज्ञान है परन्तु पूर्वोक्त दोषबलसे पुरुषको यह प्रतीत
नहीं होता कि मेरेको दो ज्ञान हुए हैं यद्यपि यह दोनों ज्ञानयथार्थहि हैं तथापि ये
मेरेको दो ज्ञान हुए हैं उनमें राँगेका सामान्य प्रत्यक्षात्मक है और रजतका
स्मरणात्मक है, इत्याकारक पुरुषको भेदाग्रह होवे है अर्थात् विवेक नहीं होवे है
यह ज्ञान द्वयका अविवेकही हमारे मतमें भ्रम है इसीको अग्रदेशावच्छेदेन उपस्थित
शुक्तिरजतादि पदार्थोंकी निष्फल प्रवृत्तिमें हेतुता है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७१
सत्यरजतस्थले तु विशिष्टज्ञानस्य सत्त्वात्तदेव कारणम्, अस्तु
वा तत्रापि भेदाग्रह एव कारणमिति ।
भाषा-और सत्यरजतस्थलीय प्रवृत्तिमें तो रजतत्वप्रकारक रजतविशेष्यक
‘ इदं रजतम् ’ इस एकही विशिष्टज्ञानका सद्भाव होनेसे उसीको कारणता है अथवा
सत्यरजतगोचर प्रवृत्तिमेंभी रजतभेदाग्रहकोही कारणता माननी उचित है.“ स्वस्मिन्
स्वस्य भेदाभावादेव रजते रजतभेदाग्रहः”उसीको सत्यस्थलीय रजतप्रवृत्तिमें हेतुताहै.
नवाऽन्यथाख्यातिः सम्भवति रजतप्रत्यक्षकारणस्य रजतसन्नि-
कर्षस्याभावाद्रङ्गे रजतबुद्धेरनुपपत्तेरिति चेत् । न । सत्यरजत-
स्थले प्रवृत्तिं प्रति विशिष्टज्ञानस्य हेतुतायाः क्लृप्तत्वादन्यत्रापि
तत्कल्पनात् ।
भाषा-परन्तु अन्यथाख्यातिका तो सम्भवही नहीं होसकता क्योंकि रजत
प्रत्यक्षके कारणीभूत रजतसन्निकर्षके न होनेसे रङ्गमें रजतबुद्धिकी उपस्थिति
होनीही दुर्घट है. ( इति चेन्न) नैयायिक-यह कथन आपका युक्त नहीं है क्योंकि
सत्यरजतस्थलीय प्रवृत्तिके प्रति पूर्वोक्त विशिष्टज्ञानको हेतुता क्लृप्तही है अर्थात् स्पष्ट
सिद्ध है उसीकी रङ्गगोचर रजतार्थिपुरुषकी प्रवृत्तिमेंभी कल्पना करनी उचित है
अर्थात् रङ्गगोचर रजतार्थिपुरुषकी प्रवृत्तिमेंभी विशिष्टज्ञानहीको हेतुता माननी
उचित है.
न च संवादिप्रवृत्तौ तत्कारणं विसंवादिप्रवृत्तौ तु भेदाग्रहः का-
रणमिति वाच्यम् । लाघवात्प्रवृत्तिमात्रे तस्य हेतुत्वकल्पनात् ।
शंका-यदि ( संवादि ) सफलप्रवृत्तिमें विशिष्टज्ञानकी कारणता तथा ( विसं-
वादि ) निष्फलप्रवृत्तिमें भेदाग्रहको कारणता मानली जाय तो हानि क्या है ?
अर्थात् प्रवृत्तिरूप कार्यकी विलक्षणतासे उसके कारणम विलक्षणता माननेमेंभी दोष
नहीं. समाधान-संवादिविसंवादिभेदेन कार्यकारणभावद्वयकल्पना करनेकी अपेक्षा
प्रवृत्तिमात्रके प्रति केवल विशिष्टज्ञानको हेतुता माननेमें लाघव है.
इत्थं च रंगे रजतत्वविशिष्टबुद्ध्यनुरोधेन ज्ञानलक्षणप्रत्यास-
त्तिकल्पनेऽपि न क्षतिः फलमुखगौरवस्यादोषत्वात् ।
भाषा-( इत्थञ्च ) इस रीतिसे प्रवृत्तिमात्रके प्रति विशिष्टबुद्धिको हेतुता सिद्ध
होनेसे पीछे जो आपने कहा कि-रजतांशमें सन्निकर्षके न होनेसे अन्यथाख्यातिका

सम्भव नहीं होसकता, वह दोषभी नहीं है; क्योंकि रांगेमें रजतत्वविशिष्ट रजतबुद्धिके
अनुरोधसे रजतके साथ ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिरूप सन्निकर्षकी कल्पना करनेमेंभी
विरोध नहीं है. यहां यह भाव है कि-'ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्ति' पूर्वोक्त रीतिसे अलौकिक
सम्बन्धविशेषका नाम है. जहां इन्द्रिययोग्य पदार्थके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध होय
और उसी कालमें उस इन्द्रियके अयोग्यपदार्थका स्मरण होय तो वहां इन्द्रियसम्बन्ध
पदार्थका तथा स्मृतिगोचर पदार्थका एक ज्ञान होताहै. एवं स्मरणांशमें वह ज्ञान
अलौकिक है और इन्द्रियसम्बन्धजन्य अंशमें लौकिक है. इस रीतिसे प्रकृतमें पूर्वानु-
भवजन्य रजतके संस्कारका "इदं रजतं" इत्याकारक प्रत्यक्षके साथ अन्वयव्यति-
रेक है. इसलिये राँगेआदिमें 'इदं रजतं' इस चाक्षुषज्ञानका रजतानुभवजन्य
संस्कारजन्य रजतस्मृति कारण है. एवं ऐसे स्थलमें 'नेत्रसंयुक्तमनःसंयुक्तात्मसमवेत
स्मृतिज्ञानविषयत्व' रूप परंपरा सन्निकर्षात्मक ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिके सम्भव होनेसे
अन्यथाख्यातिभी बन सकती है अर्थात् जैसे 'सुरभि चन्दनं,' इत्यादि स्थलमें सौर-
भांशमें ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्तिरूप अलौकिक सन्निकर्ष स्वीकृत है, वैसेही 'इदं रजतं'
इत्यादि स्थलमें रजतांशमेंभी ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिकी कल्पना करली जाय तो (क्षति)
हानि नहीं है. (शंका) आपको सम्बन्धविशेषकी अधिक कल्पना करनेमें गौरव होगा?
समाधान-फलमुखगौरव दोषकर नहीं होता अर्थात् जिस गौरवसे इष्टार्थकी सिद्धि
होय उस गौरवको विद्वान्‌लोग दोषकर नहीं मानते.
किंच रङ्गरजतयोः 'इमे रजते रङ्गे वा' इति ज्ञानं यत्र जातं तत्र
न कारणबाधोऽपि ।
भाषा-किञ्च जिस स्थलमें रङ्ग तथा रजत इन दोनोंमें "इमे रजते" अथवा
"इमे रङ्गे" इत्याकारक ज्ञान हुआ है वहां रजतादिसाक्षात्कारके कारणीभूत रजता-
दिके सन्निकर्षका बाधभी नहीं है. भाव यह कि-ऐसे स्थलमें रङ्गरजत उभयके साथ
युगपत् इन्द्रियसन्निकर्ष हुए पश्चात् रङ्गरजतमें "इमे रजते" या "इमे रङ्गे" इत्या-
कारक ज्ञानमें कोई बाधक नहीं है क्योंकि रजतत्व या रङ्गत्व इन दोनोंमें किसीएक
धर्मके साथ इन्द्रियसंयुक्त समवायरूप सम्बन्ध विद्यमान है, परन्तु एतादृश ज्ञान
उभयअंशमें प्रमारूप कदापि नहीं होसकता, क्योंकि विशेषणवद्विशेष्य सन्निकर्षरूप
प्रमासामग्रीका उभयअंशमें अभाव है, किन्तु उभयस्थलीय ज्ञानमें आंशिकप्रमात्वही
रहेगा इसलिये ऐसे स्थलमें अन्यथाख्याति अवश्य माननी पड़ती है.
अपि च यत्र रङ्गरजतयोः 'इमे रजतरङ्गे' इति ज्ञानं तत्रोभयत्रयु-
गपत्प्रवृत्तिनिवृत्ती स्याताम्। रङ्गे रङ्गभेदग्रहे रजते रजतभेदग्र-

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७३
हे चान्यथाख्यातिभयात्तन्मते दोषादेव रङ्गे रजतभेदाग्रहस्य
रजते रङ्गभेदाग्रहस्य च सत्त्वात् ।
भाषा-( अपिच )आपके अख्यातिवादमें औरभी किंचिद्विचारणीय है कि-जिस
स्थलमें रङ्ग रजत उभयमें "इमे रजतरङ्गे" इत्याकारक उभयत्र विपरीतज्ञान हुआहै वहां
उभयत्रही एककालावच्छेदेन पुरुषकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति हुई चाहिये, अर्थात्
रङ्गमेंभी एककालावच्छेदेन प्रवृत्तिनिवृत्ति दोनों हुई चाहिये तथा रजतमेंभी
उसी कालमें प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों हुईं चाहिये. क्योंकि अन्यथाख्यातिके
भयसे आपको रङ्गमें रङ्गप्रतियोगिक भेदज्ञानका तथा रजतमें रजतप्रतियोगिक
भेदज्ञानका तो स्वीकारही नहीं अर्थात् रङ्गमें रङ्गप्रतियोगिक भेदज्ञान मानने
से तथा रजतमें रजतप्रतियोगिक भेदज्ञान माननेसे अन्यथाख्याति अवश्य माननी
पड़ती है; इसलिये आपके सिद्धान्तसे रङ्गमें रङ्गभेदाग्रहका तथा रजतमें रजतभेदा-
ग्रहका सर्वथा सत्त्व प्रतीत होताहै और यही अनिष्टसाधनताज्ञानपूर्वक रङ्गमें निवृत्ति-
का कारण है तथा इष्टसाधनताज्ञानपूर्वक रजतमें प्रवृत्तिका कारण है. एवं अन्यथा
ख्यातीके भयसे आपके सिद्धान्तानुसार दोषवशसे रङ्गमें रजतभेदाग्रहका तथा
रजतमें रङ्गभेदाग्रहकाभी सत्त्व है. भाव यह कि-रङ्गमें रजतभेदाग्रह होनेसे रङ्गमें
इष्टभेदाग्रहरूपा प्रवृत्तिसामग्री विद्यमान है; एवं रजतमें रङ्गभेदाग्रह होनेसे रजतमें
अनिष्टभेदाग्रहरूपा अर्थात् “ इदं मदनिष्टसाधनं ” इत्याकारक ज्ञानरूपा निवृत्तिसा-
मग्रीभी विद्यमान है, इसलिये उभयत्र युगपत् प्रवृत्ति तथा निवृत्ति हुई चाहिये. तात्पर्य
यह कि-पुरोवर्त्ति एकदेशमें उपस्थित हुए रङ्गरजतमें विपरीतबुद्धया उभयत्र युगपत्
प्रवृत्ति तथा निवृत्ति दोनों हुईं चाहिये, परन्तु हो नहीं सकतीं क्योंकि इष्टसाधनता
ज्ञानपूर्वक विषयके अभिमुखगमनका नाम 'प्रवृत्ति' है तथा अनिष्टसाधनताज्ञानपूर्वक
विषयके विमुखगमनका नाम 'निवृत्ति' है. यह परस्पर विपरीतगति एक कालमें एक
पुरुषमें एक विषयके उद्देशसे असम्भव है.
किंचानुमितिं प्रति भेदाग्रहस्य हेतुत्वे जलह्रदे वह्निव्याप्यधूम-
वद्भेदाग्रहादनुमितिर्निर्बाधा, यदि च विशिष्टज्ञानं कारणं तदा-
ऽयोगोलके वह्निव्याप्यधूमज्ञानमनुमित्यनुरोधादापतितम्, से-
यमुभयतःपाशा रज्जुः ।
भाषा-( किञ्च ) आपके अख्यातिवादमें औरभी थोडा विचारणीय है कि आप
अनुमितिज्ञानके प्रति व्याप्यवद् भेदाग्रहको कारणता मानतेहैं या कि विशिष्टज्ञानको?
यदि व्याप्यवद्भेदाग्रहको कहो तो जलहदमें वह्निव्याप्यधूमवत्पर्वतके भेदाग्रहसे
“ हदो वह्निमान् ” इत्याकारिका अन्यथाख्यातिरूपा अनुमिति आपके सिद्धान्तसे

२७४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
निराबाध हुई चाहिये अर्थात् जबतक बाधज्ञान नहीं हुआ तबतक व्याप्यवद्भेदाग्रह-
रूप अनुमितिकारण सर्वदा विद्यमान् है, अनुमितिरूप कार्य्यभी अवश्य हुआ चाहिये
और यदि इस दोषके वारणार्थ विशिष्टज्ञानको अनुमितिकारणता कहो तो " अयोगो-
लकं वह्निमत् " इत्याकारक अनुमितिके अनुरोधसे अर्थात् इस अनुमितिकी कारण
सामग्रीकी आवश्यकतासे आपको " वह्निव्याप्यधूमवदयोगोलकम् " इत्याकारक
अन्यथाख्यातिरूप परामर्शात्मक विशिष्टज्ञान अयोगोलकमें मानना लगेगा. भाव यह
कि-अनुमितिज्ञानानुरोधसे अन्यथाख्याति आपके उभयथा गले पतित है अर्थात्
अनुमितिज्ञानके प्रति भेदाग्रहको कारणता कहो तो प्रथमरीतिसे आपको अनुमितिज्ञान
अन्यथाख्यातिरूप मानना पड़ेगा और यदि विशिष्टज्ञानको अनुमितिकारणता कहो
तो द्वितीयरीतिसे आपको अनुमितिकारणीभूतपरामर्शज्ञान अन्यथाख्यातिरूप मानना
पड़ेगा; यही आपके गलेमें उभयतः पाशा रज्जु है अर्थात् आपको दोनों तरहसे अन्य-
थाख्यातिसे इनकार करना कठिन है.
इत्थंचान्यथाख्यातौ प्रत्यक्षमेव प्रमाणं रङ्गं रजततयाऽवेदिषमि-
त्यनुभवादिति संक्षेपः ॥ १३६ ॥
भाषा-( इत्थञ्च ) इस पूर्वोक्तरीतिसे जब आपके सिद्धान्तसेभी अन्यथाख्याति
बलात् सिद्ध हुई तो हमारे सिद्धान्तमें तो " रङ्गं रजततयाऽवेदिषम्-अर्थात् मैंने
रङ्गहीको रजतरूपसे जानाथा" इत्याकारक प्रत्यक्षात्मक अनुभवही अन्यथाख्यातिमें
प्रमाणरूप है. भाव यह कि-भ्रमज्ञानबाधके पीछे पुरुषको 'रङ्गं रजततयाऽवेदिषम्'
इत्याकारक अनुव्यवसायात्मक अनुभव होवे है, उसीसे प्रथमज्ञानमें भ्रमरूपताका
साक्षात् निश्चय होवेहै. ( इति संक्षेपः ) यह संक्षेपसे प्रभाकरके अख्यातिवादका खण्डन
तथा अन्यथाख्यातिका मण्डन दिखलाया है ॥ १३६ ॥
पूर्वं व्याप्तिरुक्ता तद्ग्रहोपायस्तु न दर्शित इत्यतस्तं दर्शयति,
व्यभिचारस्येति-
शंका-अनुमान प्रमाण यदि होय तो उससे ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वधर्मका ग्रहण होसके,
परन्तु अनुमान प्रमाण तो कुछ वस्तु नहीं; क्योंकि-अनुमानका कारणभूत जो
व्याप्ति उसका स्वरूप तथा उसके स्वरूपका ग्राहक कोई नहीं है. समाधान--व्याप्तिका
स्वरूप तो हम पीछे अनुमानखण्डमें कहचुके परन्तु उसके ग्रहणका उपाय वहां नहीं
कहा इसलिये ' व्यभिचारस्य ' इत्यादिग्रन्थसे मूलकारस्वयं दिखलातेहैं-
व्यभिचारस्याग्रहोऽपि सहचारग्रहस्तथा ॥
हेतुर्व्याप्तिग्रहे, तर्कः क्वचिच्छङ्कानिवर्तकः ॥१३७॥

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७५
भाषा-व्यभिचारका अग्रहण तथा सहचारका ग्रहण व्याप्तिग्रहणमें कारण है और
यदि किसी स्थलमें व्यभिचारकी मिथ्याशंका उत्पन्न होय तो वह तर्कसे निवृत्त हो
सकती है ॥ १३७ ॥
व्यभिचाराग्रहः सहचारग्रहश्च व्याप्तिग्रहे कारणमित्यर्थः । व्य-
भिचारग्रहस्य व्याप्तिग्रहप्रतिबन्धकत्वात् तदभावः कारणम् ।
एवमन्वयव्यतिरेकाभ्यां सहचारग्रहस्यापि हेतुता । भूयोदर्शनं तु
न कारणम्, व्यभिचारास्फूर्तौ सकृद्दर्शनेऽपि कचिद्व्याप्तिग्र-
हात् कचिद्व्यभिचारशङ्काविधूननद्वारा भूयोदर्शनमुपयुज्यते ।
भाषा-पदार्थोंके परस्पर व्यभिचारका अग्रहण तथा सहचारका ग्रहण व्याप्तिस्व-
रूपके ग्रहणमें कारणीभूत है. व्यभिचारज्ञान व्याप्तिज्ञानका प्रतिबन्धक है, इसलिये
उसका अभावभी कारण है. एवं “तत् वह्न्यादि सत्त्वे तत् धूमादिसत्त्वं; तत् वह्न्यादि
अभावे तत् धूमादि अभावः ” इत्याकारक अन्वयव्यतिरेकद्वारा सहचारज्ञानकोभी
व्याप्तिस्वरूप ग्राहकता है. व्यभिचारका स्फुरण न होय तो किसी एक स्थलमें एकबार
सहचार दर्शनसेभी व्याप्तिग्रहण होताहै; इसलिये पुनःपुनः सहचारदर्शनको कारणता
माननी उचित नहीं है परन्तु किसीएक स्थलमें व्यभिचारशंका विहननद्वारा भूयो
दर्शनकाभी व्याप्तिग्रहणमें उपयोग है.
यत्र तु भूयोदर्शनादपि शङ्का नापैति तत्र विपक्षबाधकतर्को
ऽपेक्षितः । तथाहि । वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यादिति यद्याशङ्का
भवति तदा सा वह्निधूमयोः कार्यकारणभावस्य प्रतिसन्धाना-
न्निवर्तते ।
भाषा-और जिस स्थलमें भूयोदर्शनसेभी व्यभिचारशंका निवृत्त नहीं होती,वहां
शंका अपनयनार्थ विपक्षबाधक तर्ककी अपेक्षाभी होती है ( तथाहि )“वन्हिविरहस्थ-
लमेंभी यदि धूम रहे तो हानि क्या है?” इत्याकारक यदि कोई आशंका करे तो
उसका वह्निधूमका परस्पर कार्यकारणभाव विचारणेसे परिहार होताहै.
यद्ययं वह्निमान्न स्यात्तदा धूमवान्न स्यात्, कारणं विना कार्या-
नुत्पत्तेः ।
भाषा-यदि यह धूमवान् पर्वत वह्निमान् न होय तो धूमवान्भी नहीं हुआ
चाहिये, क्योंकि वह्निधूमका परस्पर कार्यकारणभाव है; इसलिये वह्निरूप कारणसे

२७६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण -
विना धूमरूप कार्यका सम्भव होना दुर्घट है. एवं "धूमो यदि वह्निव्यभिचारी स्यात्
तदा वह्निजन्यो न स्यात् " यह परिनिष्ठित तर्कका आकार जानना उचित है.
यदि क्वचित्कारणं विनापि कार्यं भविष्यत्यहेतुक एव भविष्य-
तीति तत्राप्याशङ्का भवेत् तदा सा व्याघातादपसरणीया। यदि
कारणं विना कार्यं स्यात्तदा धूमार्थं वह्नेस्तृप्त्यर्थं भोजनस्य
वा नियमत उपादानं तवैव न स्यादिति । यत्र स्वत एव शङ्का
नावतरति तत्र न तर्कापेक्षापीति तदिदमुक्तम् । तर्कः क्व-
चिदिति ॥ १३७॥
भाषा-यदि किसी स्थलमें कारणसे बिनाभी कार्य उत्पन्न होगा तो वह कार्य
अहेतुकही होगा. इसलिये ( तत्र ) तादृश तर्क कारणीभूत कार्यकारणभावग्रहमेंभी
“ अहेतुकमेव कार्यं स्यात् ” इत्याकारक शंका प्रतिबन्धक होसकतीहै परन्तु ऐसी
शंकाका अपसरण ( दूरीकरण ) व्याघातदोषप्रदर्शनद्वारा होसकताहै; अर्थात् शंका-
कारक वादीके व्यवहारव्याघातप्रदर्शनसे उक्त शंकाकी निवृत्ति होसकतीहै. भाव यह
है; शंकाकारक वादीको यह कहसकतेहैं कि-यदि वह्नि आदि कारणसे बिनाभी धूमा-
दिकार्योंका सम्भव होय तो धूमके लिये वह्निका तथा तृप्तिके लिये भोजनका ग्रहण
आपको नियमसे नहीं करना चाहिये और जहां स्वभावसे शंका उत्पन्नही नहीं हुई
वहां तर्ककी अपेक्षाभी नहींहै इसीलिये मूलमें “ तर्कः क्वचिच्छङ्कानिवर्त्तकः ” यह
कहा है. अर्थात् किसीएक स्थलविशेषमें तर्क शंकाका निवर्त्तक होताहै सर्वत्र
नहीं ॥ १३७ ॥
इदानीं परकीयव्याप्तिग्रहप्रतिबन्धार्थमुपाधिं निरूपयति, साध्य-
स्येति-
भाषा-इदानीं प्रतिपक्षीके व्याप्तिग्रहके प्रतिबन्धनार्थ 'साध्यस्य' इत्यादि ग्रन्थसे
मूलकार उपाधिका निरूपण करतेहैं-
साध्यस्य व्यापको यस्तु हेतोरव्यापकस्तथा ॥
स उपाधिर्भवेत्तस्य निष्कर्षोऽयं प्रदर्श्यते ॥ १३८ ॥
भाषा-जो साध्यका व्यापक होय तथा हेतुका अव्यापक होय, उसका नाम
' उपाधि ' है. उस उपाधिका ' निष्कर्ष ' अर्थात् सारभूत स्वरूप यह आगे दिख-
लाते हैं ॥ १३८ ॥

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७७
साध्यत्वाभिमतव्यापकत्वे सति साधनत्वाभिमताव्यापकमुपा-
धिरित्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् साध्यत्वेनाभिमत वस्तुका व्यापक होकर जो हेतुत्वेनाभिमत
वस्तुका अव्यापक होय उसका नाम ' उपाधि' है.
ननु स श्यामो मित्रातनयत्वादित्यत्र शाकपाकजत्वं नोपाधिः
स्यात् तस्य साध्यव्यापकत्वाभावात्, श्यामत्वस्य कोकिलादा-
वपि सत्त्वात् ।
शंका-आपने 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वम्' ऐसा उपाधिका स्वरूप
कहाहै, परन्तु यह लक्षण हरएक उपाधिमें घट नहीं सकता. जैसे “ काकः श्यामः
मित्रातनयत्वात् " इस अनुमानमें ' शाकपाकजत्व ' रूप उपाधि तो है, क्योंकि
मित्रातनयत्वरूप हेतु काकरूप पक्षमें न रहनेसे स्वरूपासिद्ध है, एवं श्यामत्वधर्म-
रूप साध्यके अभाववाले अर्थात् मित्रास्त्रीके अष्टम गौर पुत्रमें रहनेसे यह हेतु
व्यभिचारीभी है. एवं ऐसे दोषपूरित हेतुमें उपाधिका चिन्तन करनेसे यही हेतु व्या-
प्यत्वासिद्धभी होसकताहै परन्तु एतत्स्थलीय उपाधिमें आपका कहा लक्षण सम्यक्
नहीं होता.क्योंकि-साध्यव्यापकत्वका अर्थ यह है कि-जहां जहां साध्य रहे वहां वहां
नियमसे उपाधि रहे;परन्तु यह बात शाकपाकजत्वरूप उपाधिमें नहींहै. देखिये-
श्यामत्वधर्म कोकिलाघटपटादि अनेकस्थलोंमें रहताहै परन्तु वहां शाकपाकजत्व
अर्थात् शाकपाकसे उत्पन्न होना कहींभी नहीं है; इसलिये आपके लक्षणानुसार यह
शाकपाकजत्वरूप धर्म उपाधि नहीं हुआ चाहिये. परन्तु विद्वान् लोगोंने इसको उपा-
धिरूपसे स्वीकार किया है यांते आपके लक्षणमें कुछ न्यूनता अवश्य है.
एवं 'वायुः प्रत्यक्षः प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वात्' इत्यत्रोद्भूतरूपवत्त्वं
नोपाधिः स्यात्, प्रत्यक्षत्वस्यात्मादिषु सत्त्वात्, तत्र च रूपा-
भावात् । एवं 'ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात्' इत्यत्र भावत्वं नो-
पाधिः स्याद्विनाशित्वस्य प्रागभावेपि सत्त्वात्, तत्र च भाव-
त्वाभावादिति चेत् । न ।
भाषा-एवं आपके लक्षणानुसार " वायुः प्रत्यक्षः प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वात् " इस
अनुमानमें 'उद्भूतरूपवत्त्व' धर्मभी उपाधि नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि यह धर्मभी
साध्यका व्यापक नहीं है. देखिये-प्रत्यक्षत्वरूप साध्य जीवात्मामेंभी रहताहै परन्तु
वहां 'उद्भूतरूपवत्त्व' धर्म नहीं रहता; इसलिये आपके उपाधिलक्षणका लक्ष्य यह

२७८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
धर्मभी नहीं बन सकता परन्तु विद्वान् लोगोंने इसकोभी उपाधिरूपसे स्वीकार किया
है यान्ते आपके लक्षणमेंही न्यूनता माननी उचित है; एवं आपके लक्षणानुसार
“ ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात् ” इस अनुमानमें ‘ भावत्व ’ धर्मभी उपाधि नहीं हुआ
चाहिये क्योंकि-यह धर्मभी साध्यका व्यापक नहींहै. देखिये-विनाशित्त्वरूप साध्य
तो प्रागभावमेंभी है परन्तु वहां 'भावत्व' रूप उपाधि नहींहै.एवं भावत्वधर्म साध्यका
व्यापक न होनेसे आपके उपाधिलक्षणका लक्ष्यभी नहीं हो सकता परन्तु विद्वान्
लोग इस धर्मकोभी प्रकृतमें उपाधिरूपसे स्वीकार करतेहैं; इसलिये आपके लक्षणमेंही
न्यूनता माननी उचित है.
यद्धर्मावच्छिन्नसाध्यव्यापकत्वं तद्धर्मावच्छिन्नसाधनाव्यापकत्व-
मित्यर्थे तात्पर्यात् । १ ।
समा०-हमारे मूलोक्त “ साध्यस्य व्यापको यस्तु ” इत्यादि ग्रन्थका यह
तात्पर्य्य है कि-उपाधिरूप धर्म यद्धर्मावच्छिन्नसाध्यका व्यापक होय तद्धर्माव-
च्छिन्न साधनका अव्यापक होना चाहिये अर्थात् यादृश धर्मविशिष्ट साध्यके साथ
उपाधिका सहचार होय तादृश धर्मविशिष्ट हेतुके साथ अवश्य व्यभिचार होना
चाहिये. एवं यह लक्षण यावद् उपाधिस्थलमें अनुगत है. प्रथम “ धूमवान् वह्नेः ”
इस स्थलमें 'आर्द्रेन्धनसंयोग' को देखिये.यहां यद्धर्मपदेन पर्वत अयोगोलकअन्यतरत्व
रूप धर्मका ग्रहण करनेसे तदवच्छिन्न आधारतानिरूपित आधेयतासम्बन्धसे पर्वता-
योगोलकअन्यतरत्वावच्छिन्न धूमरूप साध्यके साथ आर्द्रेन्धनसंयोगरूप उपाधिकी
व्यापकता है; तथा पर्वतायोगोलकान्यतरत्वावच्छिन्न वह्निरूप हेतुके साथ उक्त उपा-
धिकी अव्यापकता है । १ ।
मित्रातनयत्वावच्छिन्नश्यामत्वस्य व्यापकं शाकपाकजत्वम् ।
तदवच्छिन्नसाधनाव्यापकं च । २ ।
भाषा-एवं “ स श्यामः मित्रातनयत्वात् ” इस स्थलमें यद्धर्मपदेन 'मित्रात-
नयत्वरूप धर्मका ग्रहण करनेसे समानाधिकरणसम्बन्धेन मित्रातनयत्वावच्छिन्न
श्यामत्वरूप साध्यका व्यापक तथा तादात्म्येन मित्रातनयत्वावच्छिन्न जो मित्रातन-
यत्व उसका अव्यापक शाकपाकजत्वरूप उपाधि है । २ ।
एवं पक्षधर्मबहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्नप्रत्यक्षत्वस्य व्यापकमुद्भूतरूपव-
त्त्वं बहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्नसाधनस्याव्यापकं च । ३ ।
भाषा-‘एवं “ वायुः प्रत्यक्षः प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वात् ” इस स्थलमें यद्धर्मपदेन
‘ बहिर्द्रव्यत्व ’ रूप धर्मका ग्रहण करनेसे बहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्न प्रत्यक्षत्वरूप साध्यका

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७९
व्यापक तथा बहिर्द्रव्यत्वावच्छिन्न प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वरूप हेतुका अव्यापक उद्भूतरूप-
वत्त्वरूप उपाधि है ३ ।
एवं 'ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात्' इत्यत्र जन्यत्वावच्छिन्नसाध्य-
व्यापकंभावत्वम् । ४ ।
भाषा—एवं “ ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात्" इस स्थलमें यद्धर्मपदेन जन्यत्वरूप
धर्मका ग्रहण करनेसे जन्यत्वावच्छिन्न विनाशित्वरूप साध्यका व्यापक तथा तादा-
त्म्येन जन्यत्वावच्छिन्न जो जन्यत्व उसका अव्यापक भावत्वरूप उपाधि है । ४ ।
सद्धेतोस्त्वेतादृशो धर्मो नास्ति यदवच्छिन्नस्य साध्यस्य व्याप-
कं तदवच्छिन्नस्य साधनस्याव्यापकं किंचित् स्यात् । व्यभि-
चारिणि त्वन्तत उपाध्यधिकरणं यत्साध्याधिकरणं यच्चोपाधि-
शून्यं साध्यव्यभिचारनिरूपकमधिकरणं तदन्यतरत्वावच्छिन्न-
स्य साध्यस्य व्यापकत्वं साधनस्य चाव्यापकत्वमुपाधेः
सम्भवतीति ॥१३८॥
भाषा—‘वन्हिमान् धूमात्' इत्यादि सद्धेतुस्थलोंमें तो ऐसा धर्म कोई नहीं
मिलसकता कि यादृशधर्मविशिष्ट साध्यके साथ किसी एक उपाधिरूप धर्मकी
व्यापकता तथा तादृश धर्मविशिष्ट हेतुके साथ उसी उपाधिरूप धर्मकी अव्यापकता
होय और “ धूमवान्वन्हेः” इत्यादि व्यभिचारि स्थलमें तो (अन्ततः) यदि
धर्मान्तर नभी स्फुरण होय तो उपाधिके अधिकरण जो साध्याधिकरण पर्वत महान-
सादि आर उपाधिसे शून्य तथा साध्यव्यभिचारनिरूपक हेतुके अधिकरण जो अयो-
गोलकादि एतद् अन्यतरत्वावच्छिन्न साध्यव्यापकता अर्थात् पर्वत अयोगोलकान्यतर-
त्वविशिष्ट धूमरूप साध्यका व्यापक तथा पर्वतअयोगोलकान्यतरत्वविशिष्ट वह्नयादि
हेतुका अव्यापक आर्द्रन्धनसंयोगादिरूप उपाधिधर्म होसकताहै ॥१३८॥
अत एव लक्ष्यमप्युपाधिस्वरूपमेतदनुसारेण दर्शयति, सर्वे इति-
भाषा-मूलकारके “ साध्यस्य व्यापको यस्तु ” इत्यादि ग्रन्थका ' यद्धर्मा-
वच्छिन्न ' इत्यादि लक्षणहीमें तात्पर्य है (अत एव ) इसीलिये इस लक्षणका लक्ष
उपाधिका स्वरूपभी इसी लक्षणके अनुसार 'सर्वे' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार
दिखलाते हैं-
सर्वे साध्यसमानाधिकरणाः स्युरुपाधयः ॥
हेतोरेकाश्रये येषां स्वसाध्यव्यभिचारिता ॥१३९॥

२८० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-जिन उपाधिरूप धर्मोंका प्रकृतसाध्यके सहित हेतुके किसीएक अधिक-
रणमें व्यभिचार है, अर्थात् उपाधिसाध्य दोनोंही हेतुके किसी एक अधिकरणमें नहीं
रहते वे सभी उपाधिरूप धर्म साध्यसमानाधिकरणही कहेजातेहैं ॥ १३९ ॥
स्वसाध्येति । स्वमुपाधिः स्वं च साध्यं च स्वसाध्ये तयोर्व्यभि-
चारितेत्यर्थः ॥ १३९ ॥
भाषा-यहां 'स्व' पदसे उपाधिका ग्रहण है और इस 'स्व' पदका 'साध्य'
पदके साथ इतरेतरयोगद्वन्द्व है एवं उपाधिसाध्य दोनोंकी व्यभिचारिता हेतुके किसी
एक अधिकरणमें होनीही उपाधिकी साध्यव्यापकता समझनी चाहिये. यह अर्थ सिद्ध
हुआ ॥ १३९ ॥
उपाधेर्दूषकताबीजमाह, व्यभिचारस्येति-
भाषा--एवं 'व्यभिचारस्य' इत्यादि ग्रन्थसे उपाधिमें दूषकता बीज अर्थात्
उपाधि जैसे परकीय अनुमानको दूषित करतीहै उसका मूल कहतेहैं-
व्यभिचारस्यानुमानमुपाधेस्तु प्रयोजनम् ॥
भाषा-व्यभिचारका अनुमान करवाना अर्थात् हेतुको व्यभिचारी सिद्ध करदेना
उपाधिका मुख्य प्रयोजन है.
उपाधिव्यभिचारेण हेतौ साध्यव्यभिचारानुमानमुपाधेः प्रयोजन-
मित्यर्थः । तथाहि । यत्र शुद्धसाध्यव्यापक उपाधिस्तत्र शुद्धेनै-
वोपाधिव्यभिचारेण साध्यव्यभिचारानुमानम् । यथा धूमवान्
वह्नेरित्यादौ वह्निर्धूमव्यभिचारीतद्व्यापकार्द्रेन्धनसंयोगव्यभि-
चारित्वादिति । व्यापकव्यभिचारिणो व्याप्यव्यभिचारावश्य-
कत्वात् ॥ १ ॥
भाषा-हेतुका यदि किसी एकस्थलमें उपाधिके साथ व्यभिचार होय तो उसीसे
साध्यके साथ हेतुके व्यभिचारकाभी अनुमान होताहै (तथाहि) जिस स्थलमें
उपाधि केवल शुद्धसाध्यकी व्यापक है वहां केवल शुद्ध उपाधि व्यभिचारसेही हेतुमें
साध्यव्यभिचारका अनुमान होताहै. जैसे “ धूमवान् वन्हेः ” इत्यादि स्थलमें यह
अनुमान करसकते हैं कि धूमके व्यापकीभूत आर्द्रन्धनसंयोगका व्यभिचारी होनेसे
वह्निरूप हेतु स्वसाध्यधूमकाभी अवश्य व्यभिचारी है क्योंकि जो व्यापकका
व्यभिचारी होता है वह व्याप्यका व्यभिचारीभी अवश्य होताहै.

यत्र तु किञ्चिद्धर्मावच्छिन्नसाध्यव्यापक उपाधिस्तत्र तद्धर्मवत्यु-
पाधिव्यभिचारेण साध्यव्यभिचारानुमानम् । यथा स श्यामो मि-
त्रातनयत्वादित्यत्र मित्रातनयत्वं श्यामत्वव्यभिचारि, मित्रातनये
शाकपाकजत्वव्यभिचारित्वादिति।बाधानुन्नीतपक्षेतरस्तु साध्य-
व्यापकताग्राहकप्रमाणाभावात् स्वव्याघातकत्वाच्च नोपाधिः ।
भाषा-एवं जिस स्थलमें किञ्चिद्धर्मावच्छिन्न साध्यका व्यापक उपाधिरूप धर्म है
वहां उसी धर्मवाले हेतुके साथ उपाधिव्यभिचारसे साध्यके व्यभिचारकाभी अनुमान
होताहै. जैसे “ स श्यामो मित्रातनयत्वात् ” इत्यादि स्थलमें यह अनुमान करस-
कतेहैं कि-मित्राके अष्टम गौर पुत्रमें शाकपाकजत्वका व्यभिचार होनेसे मित्रातनय-
त्वरूप हेतु श्यामत्वरूप साध्यका व्यभिचारी है. बाधदोषसहकृत पक्षेतरत्वरूप धर्म
किसी स्थलमेंभी उपाधिरूप नहीं होसकता; क्योंकि प्रथम तो उसकी प्रकृतसाध्यके
साथ व्यापकताका ग्राहक प्रबल प्रमाण कोई नहीं है. भला कथञ्चित् व्यापकताका
ग्रहण मानभी लिया जाय तो उसको स्वव्याघातकता है. भाव यह कि, प्रकृतहेतुके
व्यभिचारानुमापकत्वेन उपाधिको दूषकता है.
बाधोन्नीतस्तु पक्षेतर उपाधिर्भवत्येव यथा 'वह्निरनुष्णः कृतक-
त्वात्' इत्यादौ प्रत्यक्षेण वह्नेरुष्णत्वग्रहे वह्नीतरत्वमुपाधिः ।
यत्रतूपाधेः साध्यव्यापकत्वादिकं सन्दिह्यते स सन्दिग्धोपाधिः ।
पक्षेतरस्तु सन्दिग्धोपाधिरपि नोद्भावनीयः कथकसम्प्रदायानु-
रोधादिति ।
भाषा-एवं यदि पक्षेतरत्वरूप धर्मभी उपाधिरूपसे स्वीकृत होय तो सर्वत्र
अनुमानोंमें पक्षेतरत्वरूप उपाधिका सम्भव होनेसे अनुमानमात्रका उच्छेद हुआ तो
उपाधिको दूषकता कहां रही ? यही उसको स्वव्याघातकत्व है, परन्तु बाधसहकृत
पक्षेतरत्व धर्मभी उपाधिरूप होसकता है; जैसे “वह्निरनुष्णः कृतकत्वात् ” इत्यादि
स्थलमें पहले स्पार्शन प्रत्यक्षसे वह्निमें उष्णता ग्रहण करी अर्थात् पक्षे साध्याभावरूप
बाधका निश्चय किया तो पीछे वह्नीतरत्वरूप उपाधि कह सकते हैं. परन्तु जिस
स्थलमें उपाधिमें साध्यव्यापकताका सन्देह होताहै उस स्थलमें वह सन्दिग्ध उपाधि
कही जातीहै और पक्षेतरत्वरूप धर्म तो सन्दिग्ध उपाधिरूपसेभी वादी प्रतिवादीको
परस्पर उद्बोधन करना योग्य नहीं क्योंकि ऐसा करनाभी ( कथक ) विचारकुशलोंके
सम्प्रदायसे विरुद्ध है.
३३

२८२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
केचित्तु सत्प्रतिपक्षोत्थापनमुपाधेः फलम् । तथाहि । 'अयोगोल-
कं धूमवद्वह्नेः' इत्यादावयोगोलकं धूमाभाववदार्द्रेन्धनाभावा-
दिति सत्प्रतिपक्षसम्भवात् । इत्थं च साधनव्यापकोपि क्वचिदु-
पाधिः यथा करका पृथिवी कठिनसंयोगवत्त्वात् इत्यादावनु-
ष्णाशीतस्पर्शवत्त्वम् ।
भाषा-कोईएक विद्वान् लोग विरोधिहेतुका उत्थापन करदेनाही उपाधिका
प्रयोजन मानतेहैं. ( तथाहि ) जैसे " अयोगोलकं धूमवत् वह्नेः " इत्यादि स्थलमें
"अयोगोलकं धूमाभाववत् धूमव्यापकार्द्रेन्धनसंयोगाभावात्" इत्याकारक विरोधिहे-
तुका सम्भव होसकताहै. ( इत्थञ्च ) एवं विरोधिहेतु उत्थापकत्वेन उपाधिको दूषकत्व
माननेसे किसीएक स्थलविशेषमें साधनका व्यापकभी उपाधिरूप धर्म होताहै जैसे
"वर्षोपलः पृथिवी कठिनसंयोगवत्त्वात् " इत्यादि स्थलमें 'अनुष्णाशीतस्पर्शवत्त्व'
उपाधि है, इस उपाधिसे प्रकृतहेतुमें व्यभिचारानुमान तो नहीं होसकता परन्तु "वर्षो-
पलः पृथिवीत्वाभाववान् कठिनसंयोगव्यापकीभूतानुष्णाशीतस्पर्शवत्त्वाभावात् " इत्या-
कारक सत्प्रतिपक्ष कहसकतेहैं.
न चात्र स्वरूपासिद्धिरेव दूषणमिति वाच्यम्। सर्वत्रोपाधेर्दूष-
णान्तरसाङ्कर्यादत्र च साध्यव्यापकःपक्षावृत्तिरुपाधिरितिवदन्ति ।
शंका-करका उसी कालमें पिघलके जलरूप होजाती है, इसलिये उसमें कठिन
संयोग वस्तुतः नहीं, एवं ऐसे स्थलमें पक्षेहेत्वाभावरूप स्वरूपासिद्धि दोषही कहना
उचित है. समाधान-उपाधिदोषका सर्वस्थलोंमें दोषान्तरोंके साथ सांकर्य रह-
ताहै अर्थात् ऐसा स्थल कोई एकभी दुर्लभ है कि जिसमें केवल उपाधिदोषही होय
तथा दोषान्तरोंका सम्भव न होसके ( अत्रच ) इस सत्प्रतिपक्ष उत्थापकत्वपक्षमें
विद्वान् लोग साध्यके व्यापक तथा पक्षमें न रहनेवाले धर्मको उपाधि कहते हैं.
शब्दोपमानयोर्नैव पृथक् प्रामाण्यमिष्यते ॥१४० ॥
अनुमानगतार्थत्वादिति वैशेषिकं मतम् ॥
भाषा-( वैशेषिक ) कणादमुनिके सिद्धान्तमें शब्द तथा उपमान स्वतन्त्र
प्रमाण नहीं है ॥ १४० ॥ किन्तु इन दोनोंकी अनुमानहीमें गतार्थता है.
शब्दोपमानयोरिति। वैशेषिकाणां मते प्रत्यक्षमनुमानं च प्रमा-
णम् । शब्दोपमानयोस्त्वनुमानविधयैव प्रामाण्यम् । तथाहि

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २८३
दण्डेन 'गामानय' इत्यादिलौकिकपदानि 'यजेत' इत्यादि वैदिकप-
दानि वा तात्पर्यविषयस्मारितपदार्थसंसर्गज्ञानपूर्वकाणि आकां-
क्षादिमत्पदकदम्बत्वात् 'घटमानय' इतिपदकदम्बवत् । यद्वैते
पदार्था मिथः संसर्गवन्तः, योग्यतादिमत्पदोपस्थापितत्वात्,
तादृशपदार्थवत् । दृष्टान्तेऽपि दृष्टान्तान्तरेण साध्यसिद्धिरिति ।
भाषा-वैशेषिकसिद्धान्तमें प्रत्यक्ष तथा अनुमान ये दोही प्रमाण स्वीकृत हैं
और शब्द तथा उपमानको अनुमानविधयाही प्रमाणता है अर्थात् जुदी प्रमाणता
नहींहै ( तथाहि ) ' दण्डेन गामानय ' इत्यादिलौकिक पद तथा ' यजेत ' इत्यादि
वैदिकपद वक्तृतात्पर्यके विषयभूत जो पदोंद्वारा उपस्थित हुए पदार्थोंका परस्पर संसर्ग,
उस संसर्गका जो ज्ञान तादृश ज्ञानपूर्वक हैं; क्योंकि यह सब आकांक्षा योग्यतादि-
वाला पदसमूह प्रतीत होताहै. जैसे ' घटमानय ' यह पदसमूह आकांक्षा योग्यता-
आदिवाला है इसीलिये वक्तृतात्पर्यके विषयभूत उक्त संसर्गके ज्ञानपूर्वकभीहै अथवा
ये घटपटादि यावत् पदार्थ वक्तृतात्पर्यके विषयभूत परस्पर संसर्गवाले हैं; क्योंकि
जहां तहां इनकी आकांक्षा योग्यतावाले पदोंसेही उपस्थिति होती है ( तादृश ) प्रसिद्ध
पदार्थकी तरह सर्वत्र अनुभव करना उचित है, इत्यादि अनुमानद्वारा प्रयोज्यवृद्धको
अनुभव हो सकताहै और यदि किसीको दृष्टान्तस्थलमेंभी सम्यक् साध्यसिद्धि न
होय तो उसी पदार्थको पक्षस्थापन करके वहां प्रसिद्ध दृष्टान्तान्तरसे साध्यसिद्धि
होसकतीहै.
एवं गवयव्यक्तिप्रत्यक्षानन्तरं गवयपदं गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तक-
मसति वृत्त्यन्तरे वृद्धैस्तत्र प्रयुज्यमानत्वात्, असति च वृत्त्य-
न्तरे वृद्धैर्यत्र यत्प्रयुज्यते तत्तत्प्रवृत्तिनिमित्तकम् । यथा
गोपदं गोत्वप्रवृत्तिनिमित्तकम् ।
भाषा-ऐसेही गवयादिव्यक्ति साक्षात्कारके पश्चात् ' गवय ' पद गवयत्वप्रवृत्ति
निमित्तक है अर्थात् 'गवय' पदका प्रवृत्तिनिमित्तधर्म 'गवयत्व' है; क्योंकि वृद्धलोग
' गवय ' पदका और कहीं प्रयोग न करके केवल गवयव्यक्तिमेंही प्रयोग करतेहैं
अर्थान्तरमें वृत्त्यभाववाले पदका वृद्धलोग जहां जिसका प्रयोग करतेहैं वहां वह पद
उसी धर्मके प्रवृत्तिनिमित्तवाला होताहै जैसे ' गो ' पद गोत्वधर्मके प्रवृत्तिनिमित्त
वाला है अर्थात् ' गो ' पदका प्रवृत्तिनिमित्तधर्म गोत्व है.

२८४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
यद्वा गवयपदं सप्रवृत्तिनिमित्तकं साधुपदत्वादित्यनुमानेन पक्ष-
धर्मताबलाद्गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तकत्वं सिद्ध्यति ।
भाषा-अथवा 'गवय' पद (साधु) शुद्धपद होनेसे अवश्य किसी एक प्रवृत्तिनि-
मित्त धर्मवाला है अर्थात् शुद्ध पद है इसलिये कोईएक इसका प्रवृत्तिनिमित्तधर्म
अवश्य होना चाहिये, इस अनुमानद्वारा पक्षधर्मताके बलसे 'गवय' पदका प्रवृत्ति
निमित्त धर्म गवयत्व सिद्ध होसकता है,
तन्मतं दूषयति, तन्न सम्यगिति-
भाषा-यह पूर्वोक्त वैशेषिकका सिद्धान्त 'तन्न सम्यक्' इत्यादि ग्रन्थसे मूल-
कार दूषित करतेहैं-
तन्न सम्यग्विना व्याप्तिबोधं शब्दादिबोधतः : १४१ ।।
भाषा-यह पूर्वोक्त सिद्धान्त यथार्थ नहीं है, क्योंकि व्याप्तिज्ञानसे विनाभी
शब्दादिसे शाब्दबोध होना अनुभव सिद्ध है ॥ १४१ ॥
व्याप्तिज्ञानं विनापि शब्दादितो शाब्दबोधस्यानुभवसिद्धत्वा-
त् । न हि सर्वत्र शब्दश्रवणानन्तरं व्याप्तिज्ञाने प्रमाणमस्तीति ।
किंच सर्वत्र शाब्दस्थले यदि व्याप्तिज्ञानं कल्प्यते तदा सर्वत्रा-
नुमितिस्थले पदज्ञानं कल्पयित्वा शाब्दबोध एव किं न स्वी-
क्रियत इति ॥ १४१ ॥
भाषा-सर्वस्थलोंमें शब्दश्रवणसे पश्चात् अवश्य व्याप्तिज्ञानके होनेमें कोई प्रबल
युक्ति या प्रमाण नहीं है; क्योंकि व्याप्तिज्ञानके विनाभी शब्दादिजन्य शाब्दबोध अनु-
भवसिद्ध हैं. (किञ्च) सर्वत्र शाब्दबोधस्थलमें यदि आप अनुमितिज्ञानकी अन्यथानुप-
पत्तिसे व्याप्तिज्ञानकी कल्पना करतेहैं तो हम कहतेहैं कि, सर्वत्र अनुमितिस्थलमें पद-
स्मरणकी कल्पनासे शाब्दबोधहीको आप स्वीकार क्यों नहीं करलेते ? भाव यह कि
कल्पना उभयत्र तुल्यही है, विनिगमनाविरहसे आप विपरीतही क्यों नहीं मानलेते ?
त्रैविध्यमनुमानस्य केवलान्वयिभेदतः ॥
द्वैविध्यं तु भवेद्व्याप्तेरन्वयव्यतिरेकतः ॥ १४२ ॥
अन्वयव्याप्तिरुक्तैव व्यतिरेकादथोच्यते ॥
भाषा-केवलान्वयि भेदसे अनुमान तीन प्रकारका है और अन्वयव्यतिरेकभेदसे
व्याप्ति दो प्रकारकी है. उसमें अन्वयव्याप्तिका स्वरूप तो पूर्व कहचुकेहैं; शेष व्यति-
रेकव्याप्तिका स्वरूप यहां कहते हैं-

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २८५
त्रैविध्यमिति । अनुमानं हि त्रिविधं-केवलान्वयिकेवलव्यतिरे-
क्यन्वयव्यतिरेकिभेदात् । तत्रासद्विपक्षः केवलान्वयी यथा 'घटो
ऽभिधेयः प्रमेयत्वात्' इत्यादौ, तत्र हि सर्वस्यैवाभिधेयत्वाद्विप-
क्षासत्त्वम् ।
भाषा-केवलान्वयि केवलव्यतिरेकि तथा अन्वयव्यतिरेकि भेदसे अनुमान तीन
प्रकारका है, उनमें जिसका विपक्षस्थल कहीं न मिले वह केवलान्वयि है; जैसे 'घटो
ऽभिधेयः प्रमेयत्वात्' इत्यादि स्थलमें ईश्वरइच्छाविषयका नाम 'अभिधेय' है और
ईश्वरप्रमाविषयका नाम 'प्रमेय' है. एवं अभिधेयभी पदार्थमात्र है और प्रमेयभी पदार्थ
मात्रहै. एवं प्रमेयत्वरूप हेतुका निश्चित साध्याभाववद् विपक्षस्थल कोई नहीं है, याते
यह केवलान्वयि है.
ननु सर्वेषां धर्माणां व्यावृत्तत्वात्केवलान्वय्यसिद्धिरिति चेत् ।
न । व्यावृत्तत्वस्य सर्वसाधारप्ये तस्यैव केवलान्वयित्वात् ।
किंचवृत्तिमदत्यन्ताभावाप्रतियोगित्वं केवलान्वयित्वम् । तच्च ग-
गनाभावादौ प्रसिद्धम् । १ ।
शंका-सम्पूर्णपदार्थोंके यावत् धर्म व्यावृत्त हैं अर्थात् जुदा जुदा हैं यावत् पदार्थोंमें
अनुगत एक धर्म कोई नहीं है इसलिये केवलान्वयि धर्मकी सिद्धि नहीं होसकती
समाधान-व्यावृत्त पदार्थोंके सिरपर रहनेवाला व्यावृत्तत्वधर्म सर्वसाधारण है,
इसलिये वह केवलान्वयि होसकताहै. ( किञ्च ) घटपटादि वृत्तिमत् पदार्थोंके
अत्यन्ताभावके अप्रतियोगीका नाम 'केवलान्वयि' है. ऐसे गगनाभावादि कईएक
पदार्थ हैं १ ।
असत्सपक्षः केवलव्यतिरेकी, यथा 'पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते गन्ध-
वत्त्वात्' इत्यादौ । तत्र हि जलादित्रयोदशभेदस्य पूर्वमनि-
श्चिततया निश्चितसाध्यवतः सपक्षस्याभाव इति । २ । सत्सपक्ष
विपक्षोऽन्वयव्यतिरेकी, यथा 'वह्निमान् धूमात्' इत्यादौ । तत्र
सपक्षस्य महानसादेर्विपक्षस्य जलह्रदादेश्च सत्त्वादिति ॥ ३ ॥
भाषा-जिसका निश्चित साध्यवाला सपक्ष स्थल न होय वह अनुमान 'केवल-
व्यतिरेकी' है. जैसे “पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्” इत्यादि स्थलमें
जलादि आठ तथा गुणादि पांच इन त्रयोदशका भेद पृथिवीमें इस अनुमानसे पहले

२८६ न्यायदिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण -
कहींभी निश्चित नहींहै, एवं निश्चित साध्यवाले सपक्ष स्थलके न होनेसे यह अनुमान
'केवलव्यतिरेकी' है २। जिसका सपक्ष विपक्षस्थल निश्चित होय वह अनुमान
'अन्वयव्यतिरेकी' है; जैसे ' वह्निमान् धूमात् ' इत्यादि स्थलमें सपक्ष महानसादि
तथा विपक्ष जलह्रदादि निश्चित हैं ॥ ३ ॥
तत्रहि व्यतिरेकिणि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानं कारणं तदर्थं व्यतिरेक-
व्याप्तिं निर्वक्ति, साध्याभावव्यापकत्वमिति-
भाषा-उनमें व्यतिरेकिअनुमानके प्रति व्यतिरेकव्याप्ति ज्ञानको कारणता है उसके
लिये 'साध्याभाव' इत्यादि मूलसे ग्रन्थकार व्यतिरेकव्याप्तिका निर्वचन करते हैं-
साध्याभावव्यापकत्वं हेत्वभावस्य यद्भवेत् ॥ १४३॥
भाषा-साध्याभावनिरूपित हेत्वाभावमें व्यापकताका नाम 'व्यतिरेक व्याप्ति' है.
साध्याभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वमित्यर्थः । अत्रेदं बोध्य-
म् । यत्सम्बन्धेन यदवच्छिन्नं प्रति येन सम्बन्धेन येन रूपेण व्या-
पकता गृह्यते तत्सम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकतद्धर्मावच्छिन्ना-
भाववत्ताज्ञानात् तत्सम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकतद्धर्माव-
च्छिन्नाभावस्य सिद्धिरिति ।
भाषा-अर्थात् वह्नयादिसाध्याभावका व्यापकीभूत जो धूमाभाव तादृशाभाव
प्रतियोगित्वरूपही धूमरूप हेतुके सिरपर व्यतिरेकव्याप्ति है. यहां इतना औरभी
जानना चाहिये कि-जिस सम्बन्धसे यद्धर्मावच्छिन्नके प्रति जिसकी जिस सम्बन्धसे
जिस रूपसे व्यापकताका ग्रहण होय उसका उसी सम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक
उसी धर्मावच्छिन्नाभाववत्ताके ज्ञानसे उसी सम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक उसी
धर्म्मावच्छिन्नके अभावकी सिद्धि होती है-इति ।
इत्थं च यत्र विशेषणतादिसम्बन्धेनेतरत्वव्यापकत्वं गन्धात्यन्ता-
भावे गृह्यते तत्र गन्धाभावाभावेनेतरत्वात्यन्ताभावः सिध्यति ।
यत्र तु तादात्म्यसम्बन्धेनेतरव्यापकता गन्धाभावस्य गृह्यते ।
तत्र तादात्म्यसम्बन्धेनेतरस्याभावः सिध्यति, स एवान्योन्या-
भावः ।
भाषा-( इत्थञ्च ) इस रीतिसे जहां गन्धके अत्यन्ताभावमें पृथिवी इतरवृत्ति
इतरत्वधर्मनिष्ठ व्याप्यतानिरूपित व्यापकता ' विशेषणता ' स्वरूपसम्बन्धसे