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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 350 में से

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पृष्ठ 295

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७१
सत्यरजतस्थले तु विशिष्टज्ञानस्य सत्त्वात्तदेव कारणम्, अस्तु
वा तत्रापि भेदाग्रह एव कारणमिति ।
भाषा-और सत्यरजतस्थलीय प्रवृत्तिमें तो रजतत्वप्रकारक रजतविशेष्यक
‘ इदं रजतम् ’ इस एकही विशिष्टज्ञानका सद्भाव होनेसे उसीको कारणता है अथवा
सत्यरजतगोचर प्रवृत्तिमेंभी रजतभेदाग्रहकोही कारणता माननी उचित है.“ स्वस्मिन्
स्वस्य भेदाभावादेव रजते रजतभेदाग्रहः”उसीको सत्यस्थलीय रजतप्रवृत्तिमें हेतुताहै.
नवाऽन्यथाख्यातिः सम्भवति रजतप्रत्यक्षकारणस्य रजतसन्नि-
कर्षस्याभावाद्रङ्गे रजतबुद्धेरनुपपत्तेरिति चेत् । न । सत्यरजत-
स्थले प्रवृत्तिं प्रति विशिष्टज्ञानस्य हेतुतायाः क्लृप्तत्वादन्यत्रापि
तत्कल्पनात् ।
भाषा-परन्तु अन्यथाख्यातिका तो सम्भवही नहीं होसकता क्योंकि रजत
प्रत्यक्षके कारणीभूत रजतसन्निकर्षके न होनेसे रङ्गमें रजतबुद्धिकी उपस्थिति
होनीही दुर्घट है. ( इति चेन्न) नैयायिक-यह कथन आपका युक्त नहीं है क्योंकि
सत्यरजतस्थलीय प्रवृत्तिके प्रति पूर्वोक्त विशिष्टज्ञानको हेतुता क्लृप्तही है अर्थात् स्पष्ट
सिद्ध है उसीकी रङ्गगोचर रजतार्थिपुरुषकी प्रवृत्तिमेंभी कल्पना करनी उचित है
अर्थात् रङ्गगोचर रजतार्थिपुरुषकी प्रवृत्तिमेंभी विशिष्टज्ञानहीको हेतुता माननी
उचित है.
न च संवादिप्रवृत्तौ तत्कारणं विसंवादिप्रवृत्तौ तु भेदाग्रहः का-
रणमिति वाच्यम् । लाघवात्प्रवृत्तिमात्रे तस्य हेतुत्वकल्पनात् ।
शंका-यदि ( संवादि ) सफलप्रवृत्तिमें विशिष्टज्ञानकी कारणता तथा ( विसं-
वादि ) निष्फलप्रवृत्तिमें भेदाग्रहको कारणता मानली जाय तो हानि क्या है ?
अर्थात् प्रवृत्तिरूप कार्यकी विलक्षणतासे उसके कारणम विलक्षणता माननेमेंभी दोष
नहीं. समाधान-संवादिविसंवादिभेदेन कार्यकारणभावद्वयकल्पना करनेकी अपेक्षा
प्रवृत्तिमात्रके प्रति केवल विशिष्टज्ञानको हेतुता माननेमें लाघव है.
इत्थं च रंगे रजतत्वविशिष्टबुद्ध्यनुरोधेन ज्ञानलक्षणप्रत्यास-
त्तिकल्पनेऽपि न क्षतिः फलमुखगौरवस्यादोषत्वात् ।
भाषा-( इत्थञ्च ) इस रीतिसे प्रवृत्तिमात्रके प्रति विशिष्टबुद्धिको हेतुता सिद्ध
होनेसे पीछे जो आपने कहा कि-रजतांशमें सन्निकर्षके न होनेसे अन्यथाख्यातिका