सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७७
साध्यत्वाभिमतव्यापकत्वे सति साधनत्वाभिमताव्यापकमुपा-
धिरित्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् साध्यत्वेनाभिमत वस्तुका व्यापक होकर जो हेतुत्वेनाभिमत
वस्तुका अव्यापक होय उसका नाम ' उपाधि' है.
ननु स श्यामो मित्रातनयत्वादित्यत्र शाकपाकजत्वं नोपाधिः
स्यात् तस्य साध्यव्यापकत्वाभावात्, श्यामत्वस्य कोकिलादा-
वपि सत्त्वात् ।
शंका-आपने 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वम्' ऐसा उपाधिका स्वरूप
कहाहै, परन्तु यह लक्षण हरएक उपाधिमें घट नहीं सकता. जैसे “ काकः श्यामः
मित्रातनयत्वात् " इस अनुमानमें ' शाकपाकजत्व ' रूप उपाधि तो है, क्योंकि
मित्रातनयत्वरूप हेतु काकरूप पक्षमें न रहनेसे स्वरूपासिद्ध है, एवं श्यामत्वधर्म-
रूप साध्यके अभाववाले अर्थात् मित्रास्त्रीके अष्टम गौर पुत्रमें रहनेसे यह हेतु
व्यभिचारीभी है. एवं ऐसे दोषपूरित हेतुमें उपाधिका चिन्तन करनेसे यही हेतु व्या-
प्यत्वासिद्धभी होसकताहै परन्तु एतत्स्थलीय उपाधिमें आपका कहा लक्षण सम्यक्
नहीं होता.क्योंकि-साध्यव्यापकत्वका अर्थ यह है कि-जहां जहां साध्य रहे वहां वहां
नियमसे उपाधि रहे;परन्तु यह बात शाकपाकजत्वरूप उपाधिमें नहींहै. देखिये-
श्यामत्वधर्म कोकिलाघटपटादि अनेकस्थलोंमें रहताहै परन्तु वहां शाकपाकजत्व
अर्थात् शाकपाकसे उत्पन्न होना कहींभी नहीं है; इसलिये आपके लक्षणानुसार यह
शाकपाकजत्वरूप धर्म उपाधि नहीं हुआ चाहिये. परन्तु विद्वान् लोगोंने इसको उपा-
धिरूपसे स्वीकार किया है यांते आपके लक्षणमें कुछ न्यूनता अवश्य है.
एवं 'वायुः प्रत्यक्षः प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वात्' इत्यत्रोद्भूतरूपवत्त्वं
नोपाधिः स्यात्, प्रत्यक्षत्वस्यात्मादिषु सत्त्वात्, तत्र च रूपा-
भावात् । एवं 'ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात्' इत्यत्र भावत्वं नो-
पाधिः स्याद्विनाशित्वस्य प्रागभावेपि सत्त्वात्, तत्र च भाव-
त्वाभावादिति चेत् । न ।
भाषा-एवं आपके लक्षणानुसार " वायुः प्रत्यक्षः प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वात् " इस
अनुमानमें 'उद्भूतरूपवत्त्व' धर्मभी उपाधि नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि यह धर्मभी
साध्यका व्यापक नहीं है. देखिये-प्रत्यक्षत्वरूप साध्य जीवात्मामेंभी रहताहै परन्तु
वहां 'उद्भूतरूपवत्त्व' धर्म नहीं रहता; इसलिये आपके उपाधिलक्षणका लक्ष्य यह