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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 350 में से

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पृष्ठ 292

तो ग्राह्यत्वात् । घटस्य च पूर्वमुपस्थितत्वात् । घटविशेष्यकं
घटत्वप्रकारकमिति ज्ञाने प्रामाण्यस्य बाधकाभावः । व्यवसा-
यपरं तु प्रामाण्यं न गृह्यते तत्र संशयसामग्रीसत्त्वे संशयस्यैवो-
पपत्तेः ।
शंका-इदन्ताज्ञाननिष्ठ प्रमात्वधर्म स्वतो ग्राह्य रहो परन्तु प्रकारभेदसे प्रमात्व-
काभी तो भेद है. एवं घटत्वप्रकारकत्वकी अर्थात् घटत्वप्रकारावगाही ज्ञाननिष्ठधर्मकी
प्रसिद्धि कैसे होसकतीहै? समा०-घटत्वप्रकारकत्वका अर्थात् घटत्वप्रकारावगाहि
ज्ञाननिष्ठ धर्मका तथा स्वविशेष्यकत्वका अर्थात् घटत्ववद्विशेष्यावगाहि ज्ञाननिष्ठ
धर्मकाभी स्वतो ग्रहण होताहै. घटको प्रथम उपस्थित होनेसे घटनिष्ठ विशेष्यताव-
गाहि ज्ञाननिष्ठप्रमात्वग्रहण करनेमें तथा घटत्वनिष्ठप्रकारतावगाहि ज्ञाननिष्ठप्रमा-
त्वके ग्रहण करनेमें कोई बाधक नहीं है. भाव यह कि-विशकलित विशेष्यविशेष-
णावगाहि ज्ञानगत प्रमात्वधर्मका स्वतोही ग्रहण हो सकताहै; किन्तु केवल विशेषण,
विशेष्य उभयविशिष्टावगाहि ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वका स्वतो ग्रहण नहीं होता क्योंकि वहां
संशयसामग्रीके होत संते संशयही उत्पन्न होताहै.
किंचाभ्यास‌दशायां तृतीयानुव्यवसायादिना प्रामाण्यस्य स्वत
एव ग्रहसम्भवात् प्रथमानुव्यवसायपरं न तद्ग्राहकमिति
कल्प्यते संशयानुरोधात् ।
भाषा-(किञ्च ) अभ्यासदशामें अर्थात् जहां ज्ञानके सजातीय ज्ञानमें प्रमा-
त्वग्रहण होचुका है वहां तीसरे ( अनुव्यवसाय) ज्ञानविषयक ज्ञानद्वारा प्रमात्वधर्मका
स्वतोही ग्रहण होसकता है. एवं ऐसे स्थलमेंभी संशयानुरोधसे केवल यही कल्पना
करसकतेहैं कि-प्रथम अनुव्यवसायात्मक ज्ञान प्रमात्वधर्मका ग्राहक नहीं होसकता
अन्यथा संशय नहीं हुआ चाहिये.
अथ प्रामाण्यानुमितौ प्रामाण्याग्रहेण तस्या विषयनिश्चय-
रूपत्वार्थं तत्र प्रामाण्यग्रहो वाच्यः, सोऽप्यनुमित्यन्तरेणेति
फलमुखी कारणमुखी वाऽनवस्थेति चेत् । न ।
शंका-प्रमात्वधर्मग्राहक पूर्वोक्त अनुमितिज्ञानमेंभी तो प्रमात्वग्रहण नहीं हुआहै
( तस्याः ) उस अनुमितिके विषयकी निश्चयरूपताके लिये ( तत्र ) उस अनुमि-
तिज्ञानमेंभी प्रमात्वग्रह अवश्य हुआ चाहिये. एवं उस अनुमितिज्ञानमेंभी प्रमात्वका
ग्रहण दूसरी अनुमितिहीसे होगा. एवं दूसरीमें प्रमात्वग्रहार्थ तीसरीकी अपेक्षा होगी.