न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
निराबाध हुई चाहिये अर्थात् जबतक बाधज्ञान नहीं हुआ तबतक व्याप्यवद्भेदाग्रह-
रूप अनुमितिकारण सर्वदा विद्यमान् है, अनुमितिरूप कार्य्यभी अवश्य हुआ चाहिये
और यदि इस दोषके वारणार्थ विशिष्टज्ञानको अनुमितिकारणता कहो तो " अयोगो-
लकं वह्निमत् " इत्याकारक अनुमितिके अनुरोधसे अर्थात् इस अनुमितिकी कारण
सामग्रीकी आवश्यकतासे आपको " वह्निव्याप्यधूमवदयोगोलकम् " इत्याकारक
अन्यथाख्यातिरूप परामर्शात्मक विशिष्टज्ञान अयोगोलकमें मानना लगेगा. भाव यह
कि-अनुमितिज्ञानानुरोधसे अन्यथाख्याति आपके उभयथा गले पतित है अर्थात्
अनुमितिज्ञानके प्रति भेदाग्रहको कारणता कहो तो प्रथमरीतिसे आपको अनुमितिज्ञान
अन्यथाख्यातिरूप मानना पड़ेगा और यदि विशिष्टज्ञानको अनुमितिकारणता कहो
तो द्वितीयरीतिसे आपको अनुमितिकारणीभूतपरामर्शज्ञान अन्यथाख्यातिरूप मानना
पड़ेगा; यही आपके गलेमें उभयतः पाशा रज्जु है अर्थात् आपको दोनों तरहसे अन्य-
थाख्यातिसे इनकार करना कठिन है.
इत्थंचान्यथाख्यातौ प्रत्यक्षमेव प्रमाणं रङ्गं रजततयाऽवेदिषमि-
त्यनुभवादिति संक्षेपः ॥ १३६ ॥
भाषा-( इत्थञ्च ) इस पूर्वोक्तरीतिसे जब आपके सिद्धान्तसेभी अन्यथाख्याति
बलात् सिद्ध हुई तो हमारे सिद्धान्तमें तो " रङ्गं रजततयाऽवेदिषम्-अर्थात् मैंने
रङ्गहीको रजतरूपसे जानाथा" इत्याकारक प्रत्यक्षात्मक अनुभवही अन्यथाख्यातिमें
प्रमाणरूप है. भाव यह कि-भ्रमज्ञानबाधके पीछे पुरुषको 'रङ्गं रजततयाऽवेदिषम्'
इत्याकारक अनुव्यवसायात्मक अनुभव होवे है, उसीसे प्रथमज्ञानमें भ्रमरूपताका
साक्षात् निश्चय होवेहै. ( इति संक्षेपः ) यह संक्षेपसे प्रभाकरके अख्यातिवादका खण्डन
तथा अन्यथाख्यातिका मण्डन दिखलाया है ॥ १३६ ॥
पूर्वं व्याप्तिरुक्ता तद्ग्रहोपायस्तु न दर्शित इत्यतस्तं दर्शयति,
व्यभिचारस्येति-
शंका-अनुमान प्रमाण यदि होय तो उससे ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वधर्मका ग्रहण होसके,
परन्तु अनुमान प्रमाण तो कुछ वस्तु नहीं; क्योंकि-अनुमानका कारणभूत जो
व्याप्ति उसका स्वरूप तथा उसके स्वरूपका ग्राहक कोई नहीं है. समाधान--व्याप्तिका
स्वरूप तो हम पीछे अनुमानखण्डमें कहचुके परन्तु उसके ग्रहणका उपाय वहां नहीं
कहा इसलिये ' व्यभिचारस्य ' इत्यादिग्रन्थसे मूलकारस्वयं दिखलातेहैं-
व्यभिचारस्याग्रहोऽपि सहचारग्रहस्तथा ॥
हेतुर्व्याप्तिग्रहे, तर्कः क्वचिच्छङ्कानिवर्तकः ॥१३७॥