न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
ननु सर्वेषां ज्ञानानां यथार्थत्वात् प्रमालक्षणे तद्वद्विशेष्यकत्वं
विशेषणं व्यर्थम् ।
शंका-सभी ज्ञान यथार्थही होतेहैं इसलिये प्रमाज्ञानके लक्षणमें 'तद्वद्विशेष्यकत्व'
यह विशेषण देना व्यर्थ है किन्तु ( तत्मकारक ज्ञानं प्रभा ) इतना मात्र कहना-
उचित है. भाव यह कि-अन्यथाख्यातिके वारणार्थ आपने प्रमालक्षणमें 'तद्वद्विशेष्यकत्व'
यह विशेषण दिया है सो वह अन्यथाख्याति कुछ वस्तु नहीं क्योंकि "ख्यानं ख्यातिः
अन्यथा प्रकारान्तरेण ख्यातिः अन्यथाख्यातिः " इस व्युत्पत्तिसे प्रकारान्तरसे वस्तु
प्रतीतिका नाम 'अन्यथाख्याति' है और किसी वस्तुकीभी कहीं प्रकारान्तरसे प्रतीति
होतीही नहीं किन्तु जो वस्तु जैसी होतीहै उसकी वैसीही प्रतीतिभी होती है.
न च रङ्गे रजतार्थिनः प्रवृत्तिर्भमजन्या न स्यात्, तव मते भ्रम-
स्याभावादिति वाच्यम् । तत्र हि दोषाधीनस्य पुरोवर्तिनि स्व-
तन्त्रोपस्थितरजतभेदाग्रहस्य हेतुत्वात् ।
नैयायिक-रजतार्थि पुरुषकी जो राँगेमें भ्रमजन्या प्रवृत्ति वह आपके मतसे
नहीं हुई चाहिये क्योंकि आपके सिद्धान्तमें ( भ्रम ) अन्यथाख्याति कुछ वस्तु नहीं
है. प्रभाकर-अग्रभागवर्ति राँगेआदि पदार्थोंमें रजतार्थिपुरुषकी निष्फल प्रवृत्तिमें
केवल दोषवशसे स्वतंत्र उपस्थित रजतादि पदार्थके भेदाग्रहकी हेतुता है. भाव यह कि-
आपने प्रमाताके लोभभयादि दोषसे और प्रमाणके पित्तादि दोषसे तथा प्रमेयके
सादृश्यादि दोषसे राँगे आदिकोंमें रजतादि पदार्थोंकी अन्यथाख्याति मानी है परन्तु
यह मन्तव्य ठीक नहीं है, क्योंकि ज्ञान ज्ञेयवस्तुके अनुसारही होता है; जहां ज्ञेय
वस्तु राँगा या रज्जुआदि है वहां रजत तथा सर्पादिका ज्ञान मानना अत्यन्त असंगत
है; इसलिये ऐसे स्थलोंमें पूर्वोक्त दोषोंको केवल भेदाग्रहमात्रमें कारणता माननीही
उचित है उसका प्रकार यह है कि-जहां राँगे आदिमें रजतादिकी प्रतीति हुई है,
वहां नेत्रका अपनी वृत्तिद्वारा राँगे आदिके साथ सम्बन्ध हुए राँगे आदिका इदंरूपसे
सामान्यज्ञान होता है और रजतका स्मरण होता है एवं भ्रमस्थलमें " इदं रजतम् "
ये दो ज्ञान हैं. उसमें 'इदम' अंश तो राँगेका है इसलिये सामान्यरूपसे प्रत्यक्षात्मक
है और रजतअंशमें स्मरणात्मक ज्ञान है परन्तु पूर्वोक्त दोषबलसे पुरुषको यह प्रतीत
नहीं होता कि मेरेको दो ज्ञान हुए हैं यद्यपि यह दोनों ज्ञानयथार्थहि हैं तथापि ये
मेरेको दो ज्ञान हुए हैं उनमें राँगेका सामान्य प्रत्यक्षात्मक है और रजतका
स्मरणात्मक है, इत्याकारक पुरुषको भेदाग्रह होवे है अर्थात् विवेक नहीं होवे है
यह ज्ञान द्वयका अविवेकही हमारे मतमें भ्रम है इसीको अग्रदेशावच्छेदेन उपस्थित
शुक्तिरजतादि पदार्थोंकी निष्फल प्रवृत्तिमें हेतुता है.