न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७३
हे चान्यथाख्यातिभयात्तन्मते दोषादेव रङ्गे रजतभेदाग्रहस्य
रजते रङ्गभेदाग्रहस्य च सत्त्वात् ।
भाषा-( अपिच )आपके अख्यातिवादमें औरभी किंचिद्विचारणीय है कि-जिस
स्थलमें रङ्ग रजत उभयमें "इमे रजतरङ्गे" इत्याकारक उभयत्र विपरीतज्ञान हुआहै वहां
उभयत्रही एककालावच्छेदेन पुरुषकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति हुई चाहिये, अर्थात्
रङ्गमेंभी एककालावच्छेदेन प्रवृत्तिनिवृत्ति दोनों हुई चाहिये तथा रजतमेंभी
उसी कालमें प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों हुईं चाहिये. क्योंकि अन्यथाख्यातिके
भयसे आपको रङ्गमें रङ्गप्रतियोगिक भेदज्ञानका तथा रजतमें रजतप्रतियोगिक
भेदज्ञानका तो स्वीकारही नहीं अर्थात् रङ्गमें रङ्गप्रतियोगिक भेदज्ञान मानने
से तथा रजतमें रजतप्रतियोगिक भेदज्ञान माननेसे अन्यथाख्याति अवश्य माननी
पड़ती है; इसलिये आपके सिद्धान्तसे रङ्गमें रङ्गभेदाग्रहका तथा रजतमें रजतभेदा-
ग्रहका सर्वथा सत्त्व प्रतीत होताहै और यही अनिष्टसाधनताज्ञानपूर्वक रङ्गमें निवृत्ति-
का कारण है तथा इष्टसाधनताज्ञानपूर्वक रजतमें प्रवृत्तिका कारण है. एवं अन्यथा
ख्यातीके भयसे आपके सिद्धान्तानुसार दोषवशसे रङ्गमें रजतभेदाग्रहका तथा
रजतमें रङ्गभेदाग्रहकाभी सत्त्व है. भाव यह कि-रङ्गमें रजतभेदाग्रह होनेसे रङ्गमें
इष्टभेदाग्रहरूपा प्रवृत्तिसामग्री विद्यमान है; एवं रजतमें रङ्गभेदाग्रह होनेसे रजतमें
अनिष्टभेदाग्रहरूपा अर्थात् “ इदं मदनिष्टसाधनं ” इत्याकारक ज्ञानरूपा निवृत्तिसा-
मग्रीभी विद्यमान है, इसलिये उभयत्र युगपत् प्रवृत्ति तथा निवृत्ति हुई चाहिये. तात्पर्य
यह कि-पुरोवर्त्ति एकदेशमें उपस्थित हुए रङ्गरजतमें विपरीतबुद्धया उभयत्र युगपत्
प्रवृत्ति तथा निवृत्ति दोनों हुईं चाहिये, परन्तु हो नहीं सकतीं क्योंकि इष्टसाधनता
ज्ञानपूर्वक विषयके अभिमुखगमनका नाम 'प्रवृत्ति' है तथा अनिष्टसाधनताज्ञानपूर्वक
विषयके विमुखगमनका नाम 'निवृत्ति' है. यह परस्पर विपरीतगति एक कालमें एक
पुरुषमें एक विषयके उद्देशसे असम्भव है.
किंचानुमितिं प्रति भेदाग्रहस्य हेतुत्वे जलह्रदे वह्निव्याप्यधूम-
वद्भेदाग्रहादनुमितिर्निर्बाधा, यदि च विशिष्टज्ञानं कारणं तदा-
ऽयोगोलके वह्निव्याप्यधूमज्ञानमनुमित्यनुरोधादापतितम्, से-
यमुभयतःपाशा रज्जुः ।
भाषा-( किञ्च ) आपके अख्यातिवादमें औरभी थोडा विचारणीय है कि आप
अनुमितिज्ञानके प्रति व्याप्यवद् भेदाग्रहको कारणता मानतेहैं या कि विशिष्टज्ञानको?
यदि व्याप्यवद्भेदाग्रहको कहो तो जलहदमें वह्निव्याप्यधूमवत्पर्वतके भेदाग्रहसे
“ हदो वह्निमान् ” इत्याकारिका अन्यथाख्यातिरूपा अनुमिति आपके सिद्धान्तसे