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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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२७६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण -
विना धूमरूप कार्यका सम्भव होना दुर्घट है. एवं "धूमो यदि वह्निव्यभिचारी स्यात्
तदा वह्निजन्यो न स्यात् " यह परिनिष्ठित तर्कका आकार जानना उचित है.
यदि क्वचित्कारणं विनापि कार्यं भविष्यत्यहेतुक एव भविष्य-
तीति तत्राप्याशङ्का भवेत् तदा सा व्याघातादपसरणीया। यदि
कारणं विना कार्यं स्यात्तदा धूमार्थं वह्नेस्तृप्त्यर्थं भोजनस्य
वा नियमत उपादानं तवैव न स्यादिति । यत्र स्वत एव शङ्का
नावतरति तत्र न तर्कापेक्षापीति तदिदमुक्तम् । तर्कः क्व-
चिदिति ॥ १३७॥
भाषा-यदि किसी स्थलमें कारणसे बिनाभी कार्य उत्पन्न होगा तो वह कार्य
अहेतुकही होगा. इसलिये ( तत्र ) तादृश तर्क कारणीभूत कार्यकारणभावग्रहमेंभी
“ अहेतुकमेव कार्यं स्यात् ” इत्याकारक शंका प्रतिबन्धक होसकतीहै परन्तु ऐसी
शंकाका अपसरण ( दूरीकरण ) व्याघातदोषप्रदर्शनद्वारा होसकताहै; अर्थात् शंका-
कारक वादीके व्यवहारव्याघातप्रदर्शनसे उक्त शंकाकी निवृत्ति होसकतीहै. भाव यह
है; शंकाकारक वादीको यह कहसकतेहैं कि-यदि वह्नि आदि कारणसे बिनाभी धूमा-
दिकार्योंका सम्भव होय तो धूमके लिये वह्निका तथा तृप्तिके लिये भोजनका ग्रहण
आपको नियमसे नहीं करना चाहिये और जहां स्वभावसे शंका उत्पन्नही नहीं हुई
वहां तर्ककी अपेक्षाभी नहींहै इसीलिये मूलमें “ तर्कः क्वचिच्छङ्कानिवर्त्तकः ” यह
कहा है. अर्थात् किसीएक स्थलविशेषमें तर्क शंकाका निवर्त्तक होताहै सर्वत्र
नहीं ॥ १३७ ॥
इदानीं परकीयव्याप्तिग्रहप्रतिबन्धार्थमुपाधिं निरूपयति, साध्य-
स्येति-
भाषा-इदानीं प्रतिपक्षीके व्याप्तिग्रहके प्रतिबन्धनार्थ 'साध्यस्य' इत्यादि ग्रन्थसे
मूलकार उपाधिका निरूपण करतेहैं-
साध्यस्य व्यापको यस्तु हेतोरव्यापकस्तथा ॥
स उपाधिर्भवेत्तस्य निष्कर्षोऽयं प्रदर्श्यते ॥ १३८ ॥
भाषा-जो साध्यका व्यापक होय तथा हेतुका अव्यापक होय, उसका नाम
' उपाधि ' है. उस उपाधिका ' निष्कर्ष ' अर्थात् सारभूत स्वरूप यह आगे दिख-
लाते हैं ॥ १३८ ॥