न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७५
भाषा-व्यभिचारका अग्रहण तथा सहचारका ग्रहण व्याप्तिग्रहणमें कारण है और
यदि किसी स्थलमें व्यभिचारकी मिथ्याशंका उत्पन्न होय तो वह तर्कसे निवृत्त हो
सकती है ॥ १३७ ॥
व्यभिचाराग्रहः सहचारग्रहश्च व्याप्तिग्रहे कारणमित्यर्थः । व्य-
भिचारग्रहस्य व्याप्तिग्रहप्रतिबन्धकत्वात् तदभावः कारणम् ।
एवमन्वयव्यतिरेकाभ्यां सहचारग्रहस्यापि हेतुता । भूयोदर्शनं तु
न कारणम्, व्यभिचारास्फूर्तौ सकृद्दर्शनेऽपि कचिद्व्याप्तिग्र-
हात् कचिद्व्यभिचारशङ्काविधूननद्वारा भूयोदर्शनमुपयुज्यते ।
भाषा-पदार्थोंके परस्पर व्यभिचारका अग्रहण तथा सहचारका ग्रहण व्याप्तिस्व-
रूपके ग्रहणमें कारणीभूत है. व्यभिचारज्ञान व्याप्तिज्ञानका प्रतिबन्धक है, इसलिये
उसका अभावभी कारण है. एवं “तत् वह्न्यादि सत्त्वे तत् धूमादिसत्त्वं; तत् वह्न्यादि
अभावे तत् धूमादि अभावः ” इत्याकारक अन्वयव्यतिरेकद्वारा सहचारज्ञानकोभी
व्याप्तिस्वरूप ग्राहकता है. व्यभिचारका स्फुरण न होय तो किसी एक स्थलमें एकबार
सहचार दर्शनसेभी व्याप्तिग्रहण होताहै; इसलिये पुनःपुनः सहचारदर्शनको कारणता
माननी उचित नहीं है परन्तु किसीएक स्थलमें व्यभिचारशंका विहननद्वारा भूयो
दर्शनकाभी व्याप्तिग्रहणमें उपयोग है.
यत्र तु भूयोदर्शनादपि शङ्का नापैति तत्र विपक्षबाधकतर्को
ऽपेक्षितः । तथाहि । वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यादिति यद्याशङ्का
भवति तदा सा वह्निधूमयोः कार्यकारणभावस्य प्रतिसन्धाना-
न्निवर्तते ।
भाषा-और जिस स्थलमें भूयोदर्शनसेभी व्यभिचारशंका निवृत्त नहीं होती,वहां
शंका अपनयनार्थ विपक्षबाधक तर्ककी अपेक्षाभी होती है ( तथाहि )“वन्हिविरहस्थ-
लमेंभी यदि धूम रहे तो हानि क्या है?” इत्याकारक यदि कोई आशंका करे तो
उसका वह्निधूमका परस्पर कार्यकारणभाव विचारणेसे परिहार होताहै.
यद्ययं वह्निमान्न स्यात्तदा धूमवान्न स्यात्, कारणं विना कार्या-
नुत्पत्तेः ।
भाषा-यदि यह धूमवान् पर्वत वह्निमान् न होय तो धूमवान्भी नहीं हुआ
चाहिये, क्योंकि वह्निधूमका परस्पर कार्यकारणभाव है; इसलिये वह्निरूप कारणसे