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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 350 में से

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पृष्ठ 296

सम्भव नहीं होसकता, वह दोषभी नहीं है; क्योंकि रांगेमें रजतत्वविशिष्ट रजतबुद्धिके
अनुरोधसे रजतके साथ ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिरूप सन्निकर्षकी कल्पना करनेमेंभी
विरोध नहीं है. यहां यह भाव है कि-'ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्ति' पूर्वोक्त रीतिसे अलौकिक
सम्बन्धविशेषका नाम है. जहां इन्द्रिययोग्य पदार्थके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध होय
और उसी कालमें उस इन्द्रियके अयोग्यपदार्थका स्मरण होय तो वहां इन्द्रियसम्बन्ध
पदार्थका तथा स्मृतिगोचर पदार्थका एक ज्ञान होताहै. एवं स्मरणांशमें वह ज्ञान
अलौकिक है और इन्द्रियसम्बन्धजन्य अंशमें लौकिक है. इस रीतिसे प्रकृतमें पूर्वानु-
भवजन्य रजतके संस्कारका "इदं रजतं" इत्याकारक प्रत्यक्षके साथ अन्वयव्यति-
रेक है. इसलिये राँगेआदिमें 'इदं रजतं' इस चाक्षुषज्ञानका रजतानुभवजन्य
संस्कारजन्य रजतस्मृति कारण है. एवं ऐसे स्थलमें 'नेत्रसंयुक्तमनःसंयुक्तात्मसमवेत
स्मृतिज्ञानविषयत्व' रूप परंपरा सन्निकर्षात्मक ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिके सम्भव होनेसे
अन्यथाख्यातिभी बन सकती है अर्थात् जैसे 'सुरभि चन्दनं,' इत्यादि स्थलमें सौर-
भांशमें ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्तिरूप अलौकिक सन्निकर्ष स्वीकृत है, वैसेही 'इदं रजतं'
इत्यादि स्थलमें रजतांशमेंभी ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिकी कल्पना करली जाय तो (क्षति)
हानि नहीं है. (शंका) आपको सम्बन्धविशेषकी अधिक कल्पना करनेमें गौरव होगा?
समाधान-फलमुखगौरव दोषकर नहीं होता अर्थात् जिस गौरवसे इष्टार्थकी सिद्धि
होय उस गौरवको विद्वान्‌लोग दोषकर नहीं मानते.
किंच रङ्गरजतयोः 'इमे रजते रङ्गे वा' इति ज्ञानं यत्र जातं तत्र
न कारणबाधोऽपि ।
भाषा-किञ्च जिस स्थलमें रङ्ग तथा रजत इन दोनोंमें "इमे रजते" अथवा
"इमे रङ्गे" इत्याकारक ज्ञान हुआ है वहां रजतादिसाक्षात्कारके कारणीभूत रजता-
दिके सन्निकर्षका बाधभी नहीं है. भाव यह कि-ऐसे स्थलमें रङ्गरजत उभयके साथ
युगपत् इन्द्रियसन्निकर्ष हुए पश्चात् रङ्गरजतमें "इमे रजते" या "इमे रङ्गे" इत्या-
कारक ज्ञानमें कोई बाधक नहीं है क्योंकि रजतत्व या रङ्गत्व इन दोनोंमें किसीएक
धर्मके साथ इन्द्रियसंयुक्त समवायरूप सम्बन्ध विद्यमान है, परन्तु एतादृश ज्ञान
उभयअंशमें प्रमारूप कदापि नहीं होसकता, क्योंकि विशेषणवद्विशेष्य सन्निकर्षरूप
प्रमासामग्रीका उभयअंशमें अभाव है, किन्तु उभयस्थलीय ज्ञानमें आंशिकप्रमात्वही
रहेगा इसलिये ऐसे स्थलमें अन्यथाख्याति अवश्य माननी पड़ती है.
अपि च यत्र रङ्गरजतयोः 'इमे रजतरङ्गे' इति ज्ञानं तत्रोभयत्रयु-
गपत्प्रवृत्तिनिवृत्ती स्याताम्। रङ्गे रङ्गभेदग्रहे रजते रजतभेदग्र-