न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६९
ऐसेही आगे आगे फलमुखी अर्थात् प्रमात्वग्रहरूप फलप्रधाना या कारणमुखी
अर्थात् अनुमितिज्ञानात्मक कारण प्रधानाऽनवस्थाभी हो सकती है अर्थात् एकप्र-
मात्वकी सिद्धयर्थ दूसरे ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वकी अपेक्षा, एवं द्वितीयप्रमात्वकी सिद्धयर्थ
तृतीयज्ञाननिष्ठ प्रमात्वकी अपेक्षा, एवं आगे आगे इस रीतिसे फलमुखी अनवस्था
होसकतीहै. एवं प्रथम अनुमितिज्ञानरूप कारणकी पुष्टिके लिये द्वितीय अनुमिति-
ज्ञानकी अपेक्षा, द्वितीयके लिये तृतीयकी अपेक्षा, एवं आगे २ इस रीतिसे कारण-
मुखी अनवस्था होसकतीहै ।
अगृहीताऽप्रामाण्यग्राहकस्यैव निश्चयरूपत्वात् । यत्र च प्रामा-
ण्यसंशयस्तत्रैव परं प्रामाण्यानुमितेरपेक्षा, यावदाशङ्कं प्रामा-
ण्यानुमितिरिष्यत एव ।
समा०-अनवस्था नहीं होसकती क्योंकि जिस ज्ञानमें अप्रमात्वग्रह नहीं गृहीत
हुआ है अर्थात् “ इदं ज्ञानमप्रमा ” इत्याकारक व्यवहार जिस ज्ञानमें नहीं हुआ
है; हम लोग उस ज्ञानको निश्चयरूपही मानते हैं किन्तु जिस स्थलमें ज्ञाननिष्ठप्रमा-
त्वका संशय होता है वहांही केवल प्रामाण्यग्राहक अनुमितिज्ञानकी अपेक्षा होती है
स्थलान्तरमें नहीं होती जहां पर्यन्त आशंका होय वहां पर्यन्त प्रामाण्यग्राहक अनु-
मितिकोभी हम स्वीकार करतेहैं. भाव यह कि-यदि प्रमात्वग्राहक उत्तरउत्तर सभी
ज्ञानोंमें “ इदं ज्ञानं प्रमा न वा ” इत्याकारक आशंका उत्पन्न होती जाय तो अन-
वस्था होसकती है; परन्तु ऐसा तो कदापि सम्भव नहीं इसलिये अनवस्था नहीं
होसकती.
सर्वत्र तु न संशयः क्वचित्कोट्यनुपस्थितेः, क्वचिद्विशेषदर्शना-
दितः, क्वचिद्विषयान्तरसञ्चारादिति संक्षेपः । ]
भाषा-और युक्तिसेभी हरएक स्थलमें संशयका होना दुर्घट है; वह यह है कि-
संशयज्ञान स्वभावसे परस्पर विरुद्ध नानाधर्मावगाहि होता है. एवं जहां कोट्यनुपस्थित
है अर्थात् जहां विरोधि धर्मकी उपस्थिति नहीं हुई है वहां संशय नहीं होसकता
एवं जहां विषयका विशेषरूपसे दर्शन होचुकाहै वहांभी संशय नहीं होसकता; अथवा
जहां एकविषयविषयक ज्ञानानन्तर शीघ्रही ज्ञान प्रवाहका विषयान्तरमें संचार हुआ
है वहांभी संशय नहीं होसकता; इत्यादि अनेकस्थलोंमें संशयके असम्भवसे पूर्वोक्त
फलमुखी या कारणमुखी अनवस्थाकी शंकाभी निरर्थक है. (इति संक्षेपः) यह संक्षेपसे
ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वका परतो ग्रहण दिखलाया है. यहां प्रमाके लक्षणमें ( गुरु ) प्रभाकर
शंका करतेहैं. ]