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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 350 में से

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पृष्ठ 291

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६७
त्वप्रकारकज्ञानत्वात् । एवमिदं जलत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा स्नेह-
वति जलत्वप्रकारकज्ञानत्वात् ।
भाषा-( तथाहि ) वह अनुमान इस रीतिसे करना चाहिये कि-यह ज्ञान
( संवादि ) सफलप्रवृत्तिका जनक होनेसे प्रमारूप है. ( यन्नैवं ( जो सफल )
प्रवृत्तिका जनक नहीं होता ( तन्नैवं ) वह प्रमारूपभी नहीं होता; ( यथा ) जैसे
अप्रमाज्ञान सफलप्रवृत्तिजनकभी नहीं है इसलिये प्रमाभी नहीं है. ऐसेही प्रवृत्तिके
अजनक ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वके ग्राहक अनुमानभी है; जैसे यह पृथिवीत्व प्रकारकज्ञान
गन्धवालेमें पृथिवीत्व प्रकारकज्ञान होनेसे प्रमारूप है.भाव यह कि-गन्ध केवल पृथि-
वीहीका व्याप्यधर्म ह एवं यदि उस गन्धवालेमें “ इयं पृथिवी ” इत्याकारक
पृथिवीत्वप्रकारक ज्ञान होगा तो वह अवश्य प्रमारूपही होगा. ऐसेही यह “ इदं
जलं ” इत्याकारक जलत्वप्रकारक जलविशेष्यक ज्ञानभी स्नेहवालेमें जलत्वप्रकारक
ज्ञान होनेसे प्रमारूप है.
न च हेतुज्ञानं कथं जातमिति वाच्यम्। पृथिवीत्वप्रकारकत्वस्य
स्वतो ग्राह्यत्वात्, तत्र गन्धग्रहेण गन्धवद्विशेष्यकत्वस्यापि
सुग्रहत्वात् । तत्प्रकारकत्वावच्छिन्नतद्विशेष्यकत्वं परं न गृह्यते
संशयानुरोधात् ।
शंका-इन स्थलोंमें पहले हेतुका ज्ञान कैसे होताहै? समा०-यहां पृथिवीत्वप्रकार-
कत्वका अर्थात् पृथिवीत्वप्रकारावगाही ज्ञाननिष्ठ धर्मका स्वतो ग्रहण होताहै; एवं
पृथिवीमें गन्धके ग्रहणसे गन्धवद्विशेष्यकत्वका अर्थात् गन्धवद्विशेष्यावगाहि ज्ञाननिष्ठ
धर्म्मकाभी स्वतोही ग्रहण होताहै किन्तु केवल संशयानुपपत्तिके अनुरोधसे पृथिवी-
त्वप्रकारकत्वावच्छिन्न पृथिवीत्त्ववद्विशेष्यकत्व धर्ममात्रका ग्रहण नहीं होता.
न च प्रमात्वस्य साध्यस्य प्रसिद्धिः कथमिति वाच्यम् । इदं
ज्ञानप्रमात्वस्य स्वतो ग्राह्यत्वात् ।
शंका-प्रमात्वात्मक साध्यकी प्रसिद्धि प्रथम कौन स्थलमें है और कैसे
होती है? समाधान-( इदन्ता ) ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वधर्मका स्वतो ग्रहण होताहै. भाव
यह कि-इदन्ताज्ञानमें “इदमनिदं न वा” इत्याकारक सन्देह कभी किसीको नहीं होता
इसलिये यह स्वतो ग्राह्य है.
न च प्रकारभेदेन प्रामाण्यभेदाद्धटत्वप्रकारकत्वादेः कथं प्रसिद्धि-
रिति वाच्यम् । घटत्वप्रकारकत्वस्य स्वविशेष्यकत्वस्य च स्व-