न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
अथ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली
भाषाटीकासमेता ।
अथ प्रत्यक्षपरिच्छेदः १.
प्रज्वालितो ज्ञानतमोऽपनोदी येन प्रदीपो मधुरैर्वचोभिः ॥
सन्मानसे मानसराजहंसं वन्दे गुरुं नानकनामकं तम् ॥ १ ॥
मूढस्तु मूढ एवास्ति तत्त्वज्ञस्त्वस्ति तत्त्ववित् ॥
तस्मादूर्द्ध्वप्रबुद्धा ये ते सन्त्यत्राधिकारिणः ॥ २ ॥
चूडामणीकृतविधुर्वलयाकृतवासुकिः ।
भवो भवतु भव्याय लीलाताण्डवपण्डितः ॥ १ ॥
भाषा-चूडामणिरूप कियाहै चन्द्र जिनने, तथा कंकणरूप किया है वासुकि सर्प
जिनने ऐसे जो स्वाभाविक नृत्यमें निपुण महादेव हैं वे हम सबके कल्याणके लिये
होवें ॥ १ ॥
निजनिर्मितकारिकावलीमतिसंक्षिप्तचिरंतनोक्तिभिः ॥
विशदीकरवाणि कौतुकात्ननु राजीवदयावशंवदः ॥ २ ॥
भाषा-मैं अपने राजीव नामक शिष्य पर कृपा करता हुआ, प्राचीन आचार्योंके
अतिसंक्षिप्त सिद्धान्तानुकूल, अपनी बनाई कारिकावलीको अनायासही स्फुट
करता हूं ॥ २ ॥
सद्द्रव्यागुणगुम्फितासुकृतिनां सत्कर्मणां ज्ञापिका-
सत्तासामान्यविशेषनित्यमिलिताऽभावप्रकर्षोज्ज्वला ॥
विष्णोर्वक्षसि विश्वनाथकृतिना सिद्धान्तमुक्तावली
विन्यस्ता मनसो मुदं वितनुतां सद्युक्तिरेषा चिरम् ॥ ३ ॥
भाषा-पृथिवी जलादि नव द्रव्योंके सहित रूपरसादि चौवीस गुणोंसे
गुंथित, उत्क्षेपणादि पंचविध कर्मकी बोधक, जातिरूप सामान्य तथा विशेष और
२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
समवायसे मिश्रित, प्राग्भावादि अनेकविध अभावोंकी प्रकाशक ऐसे यह बुद्धिमें
विराजमान शुभयुक्तियुक्त न्यायसिद्धान्तरूप मोतियोंकी माला विश्वनाथ
पण्डितने विष्णु परमात्मा के वक्षःस्थलमें अर्पण करी हुई, पण्डित लोगोंके चित्तों
को बहुत काल पर्यन्त आनन्द विस्तीर्ण करे ॥ ३ ॥ इस पूर्व कथनसे
द्रव्यादि पदार्थवत्त्वेन रूपेण मुक्तावलीनिरूपित सादृश्य ग्रन्थमें कहा अर्थात् जैसे
मोतियोंकी माला द्रव्यसाध्या है तथा गुणसे (सूत्र) से गुन्थिा है एवं पुण्यवान् पुरुषोंके
पूर्वकृत सत्कर्मोंकी बोधिका है, और मोतियोंकी प्राचीन जातियोंसे तथा उनमें
होनेवाले महत्त्व निर्मलत्व आदि धर्मोंसे निरंतर सम्बन्धवाली है तथा तेजो-
अभावमें अर्थात् अन्धकारमें प्रकर्षरूपसे उजाला करती है ॥ वैसेही यह मेरा
मुक्तावलीरूप ग्रन्थभी मोतियोंकी मालाकी तरह पूर्ण गुण रखता है ॥ ३ ॥
विघ्नविघाताय कृतं मंगलं शिष्यशिक्षायै निबध्नाति । नूतनेति ।
भाषा-ग्रन्थ लिखनेमें जो विघ्न, उनके विनाशके लिये किये मङ्गलको शिष्य
लोगोंकी शिक्षाके अर्थ (अर्थात् मेरी तरह मेरी शिष्यपरंपराभी कार्यमात्रके
आद्यमें कृष्णपरमात्माका स्मरण करे) ग्रन्थकार, ग्रन्थके आदिमें लिखता है
नूतनेति ।
नूतनजलधररुचये गोपवधूटीदुकूलचौराय ।
तस्मै कृष्णाय नमः संसारमहीरुहस्य बीजाय ॥१॥
भाषा-नवीन मेघके सदृश कान्तिवाले, तथा गोपोंकी नव युवतियोंके वस्त्र
चुरानेवाले, संसाररूप वृक्षके कारणभूत जगत् प्रसिद्ध श्रीकृष्ण देवको
नमस्कार है ॥ १ ॥
१ विघाताय । यहां वि+घात = दोपद हैं. प्रथमका नाम उपसर्ग है और
द्वितीयका नाम प्रातिपदिक है, उनमें द्वितीयपदको तो स्वार्थवाचकत्व सर्वतंत्रसिद्धान्त
सिद्ध है परन्तु उपसर्गपदको कई आचार्य्य वाचकत्व मानते हैं, और कई पदान्तरयोगसे
द्योतकत्व मानते हैं. प्रकृतमें द्योतकत्व वादीके मतमें तो यद्यपि दोष नहीं, परन्तु वाच-
कत्व वादीके मतमें ( उत्पत्तिवाली वस्तुका अभाव ) ‘घात’ पदहीका अर्थ होनेसे ‘ वि ’
पद अनर्थक प्रतीत होता है; तथापि आचार्योंका यह संकेत है कि-जहां विशिष्ट
वाचक पदके समीप विशेषणवाचक पदान्तर होय वहां विशिष्ट वाचक पदको विशेष्य मात्र
वाचकत्व होता है. इससे प्रकृतमें यह सिद्ध हुआ कि-केवल ‘ घात ’ पदका अर्थ शुद्ध
अभाव मात्र है, और ‘ वि ’ विशेषणके मिलानेमें “ उत्पत्तिवालेका अभाव ” यह अर्थ
हुआ. एवं दोनों मतमें कुछ दोष नहीं.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३
ननु मङ्गलं न विघ्नध्वंसं प्रति नवा समाप्तिं प्रति कारणं, विनापि
मङ्गलं नास्तिकादीनां ग्रन्थे निर्विघ्न परिसमाप्ति दर्शनादिति चेत् न ।
भाषा-( शंका ) विघ्नध्वंसके प्रति वा समाप्तिके प्रति मङ्गलको कारणता नहीं
है, क्योंकि मङ्गलसे विनाभी नास्तिकादिकोंके ग्रन्थोंकी निर्विघ्न समाप्ति
देखी जाती है.
अविगीतशिष्टाचारविषयत्वेन मङ्गलस्य सफलत्वे सिद्धे तत्र च
फलजिज्ञासायां सम्भवति दृष्टफलकत्वेऽदृष्टफलकल्पनाया
अन्याय्यत्वात् उपस्थितत्वाच्च समाप्तिरेव हि फलं कल्प्यते ।
इत्थं च यत्र मङ्गलं न दृश्यते तत्रापि जन्मान्तरीयं तत् कल्प्यते।
यत्र च सत्यपि मङ्गले समाप्तिर्न दृश्यते तत्र बलवत्तरो विघ्नो विघ्न
( १ ) यहां “मङ्गलाचरणमयुक्तं निष्फलत्वात्” इस अनुमानमें यदि कोई निष्फ-
लत्व रूप हेतुको स्वरूपासिद्ध कहे तो “मङ्गलं निष्फलं फलविशेषशून्यत्वात्” इस
प्रयोगसे उसका वारण करनेसे प्रकृत अर्थकी सिद्धि हो सकती है. इसी तात्पर्य्यसे
‘ननु’ इत्यादि ग्रन्थ कहनेवाले वादीकी शंकाभी है.
( २ ) “मङ्गलं विघ्नध्वंसं प्रति तथा समाप्तिं प्रति कारणत्वाभाववत् कार्य्याधिकरण
वृत्त्यत्यन्ताभावप्रतियोगित्वात् घटं प्रति वेमवत्” यह अनुमान व्यतिरेक व्यभिचारका
साधक है.
३ “एवं मङ्गलं सफलं अवगीतशिष्टाचारविषयत्वात्” यह अनुमान मङ्गलकी सफलताका
साधक है.
४ “मङ्गलं समाप्तिफलं समाप्त्यन्याफलत्वे सति सफलत्वात्” यह अनुमान पूर्वोक्त व्यतिरे-
कव्यभिचारकावारक है. “कारणसत्त्वे कार्य्यसत्त्वमन्वयसहचारः । कारणाभावे कार्य्या-
भावः व्यतिरेकसहचारः । एवं कारणसत्त्वे कार्य्याभावोऽन्वयव्यभिचारः । कारणाभावे कार्य्य-
सत्त्वं व्यतिरेकव्यभिचारः” ‘विनापि मङ्गलं’ इत्यादि ग्रन्थसे पूर्वपक्षीने मङ्गलसमाप्तिके
कार्यकारणभावका व्यतिरेकव्यभिचारही दिखलाया है; किन्तु अन्वयव्यभिचारका प्रद-
र्शन नहीं किया, परन्तु सिद्धान्तीने “यत्र च सत्यपि मङ्गले” इत्यादि ग्रन्थसे अन्वयव्यभि-
चारका वारण किया है. इसलिये पूर्वपक्षमें अन्वयव्यभिचारके स्थल ‘कादम्बरी’ आदि
आस्तिक ग्रंथ जानने चाहिये.
( ५ ) “नास्तिकग्रन्थः स्वाश्रयपुरुषप्रयत्नजन्यत्वसम्बन्धेन मङ्गलवान् । स्वप्रतियोगिचरम-
वर्णघटितत्वसम्बन्धेन समाप्तिमत्त्वात् भारतादिवत्” यहां प्रथम ‘स्व’ पदसे मङ्गलका
ग्रहण है और द्वितीयसे समाप्तिका ग्रहण है. इस अनुमानसे जन्मान्तरीय मङ्गलकी कल्पना
होसकती है.
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष- ]
प्राचुर्य्ये वा बोध्यम् । प्रचुरस्यैव चास्य बलवत्तरविघ्न निराक-
रणे कावणत्वम् । विघ्नध्वंसस्तु मङ्गलस्य द्वारमित्याहुः प्राञ्चः ॥
भाषा-( समाधान ) अनिन्दित जो शिष्ट पुरुषोंका प्रयत्न उस प्रयत्नका मङ्गलको
विषयीभूत होनेसे मङ्गलकी सफलताका अनुमान होता है. एवं ( तत्र ) मङ्गले
विशेषरूपसे फलकी जिज्ञासा हुई तो दृष्ट फलका सम्भव होय तो अदृष्टकी
कल्पना करनी अयोग्य है. प्रकृतमें “आरब्धं कर्म्ममे निर्विघ्नं परिसमाप्यताम्” इस
कामनासे प्रवृत्त पुरुषकी कामना विषयरूपसे उपस्थित होनेसे हम मङ्गलका
फल ग्रन्थकी समाप्तिरूपही कल्पना करते हैं. ( इत्थञ्च ) इसरीतिसे मङ्गलसमाप्ति
रूप फलवाला हुआ तो जिस नास्तिकादिके ग्रन्थके आद्यमें मङ्गल न देखनेमें आवे
वहांभी उस ग्रन्थकर्ताके पूर्व जन्म जन्मान्तरके किये मङ्गलकी कल्पना अर्थात्
अनुमान कर लेना होता है और जिस ( कादम्बरी ) ग्रन्थविशेषकी मङ्गल
होनेमेंभी समाप्ति नहीं हुई है वहां कोई बलिष्ठ विघ्न किंवा विघ्नोंका समुदाय
जानना चाहिये. बलिष्ठ विघ्नविशेष अथवा विघ्नोंके समुदायके विनाशार्थ, बलिष्ठ
मङ्गल समुदायहीकी कारणता है. और प्राचीन आचार्य लोग तो विघ्नध्वंसको
मङ्गलका व्यापार कहते हैं.
नव्यास्तु मङ्गलस्य विघ्नध्वंस एव फलम्। समाप्तिस्तु बुद्धिप्रति-
भादिकारणकलापात् । नचैवं स्वतःसिद्धविघ्नविरहवता कृतस्य
मङ्गलस्य निष्फलत्वापत्तिरिति वाच्यम्, इष्टापत्तेः। विघ्नशङ्कया
तदाचरणात् तथैव शिष्टाचारात् । नच तस्य निष्फलत्वे तद्बो-
धकशिष्टाचारानुमित²वेदप्रामाण्यापत्तिरितिवाच्यम्, सति³ विघ्ने
तन्नाशस्यैव वेदबोधितत्वात् । अत एव पापभ्रमेण कृतस्य प्राय-
( १ ) " बुद्धिस्तात्कालिकी ज्ञेया मतिरागामिगोचरा ॥ प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभां
विदुः ॥ इस वचनसे विलक्षण बुद्धिका नाम प्रतिभा है.
( २ ) यहां फलसाधनांशमें भ्रांतिरहित का नाम शिष्ट है; उन शिष्टोंके आचारसे
अर्थात् प्रयत्नसे अनुमित “ समाप्तिकामो मङ्गलमाचरेत् ” इत्यादि वेदवचन उसको अप्रमा-
ण्यापत्ति होगी इस वचनके अनुमापक अनुमानका आकार “ मङ्गलं वेदबोधितकर्तव्यताकं
अलौकिकाविगीतशिष्टाचारविषयत्वात् दर्शादिवत् ” इत्यादि है.
( ३ ) एवं स्वतः सिद्ध विघ्नविरहवाले पुरुषमें विघ्नात्मक प्रतियोगिरूप कारणके न
होनेसे विघ्नध्वंसरूप कार्यके अनुदयकी उपपत्ति हुई तो मङ्गलमें कारणताभी अबाधित
रही और कारणताबोधक वेदकोभी अप्रमाणता न हुई.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५
श्चित्तस्य निष्फलत्वेऽपि न तद्बोधकवेदाप्रामाण्यम् । मङ्गलं च
विघ्नध्वंसविशेषे कारणम् । विघ्नध्वंसविशेषे च विनायकस्तवपा-
ठादिः, क्वचिच्च विघ्नात्यन्ताभाव एव समाप्तिसाधनं, प्रतिबन्धक-
संसर्गाभावस्यैव कार्यजनकत्वात् । इत्थं च नास्तिकादिकृतग्र-
न्थेषु जन्मान्तरीयमङ्गलजन्यदुरितध्वंसः स्वतः सिद्धविघ्नात्य-
न्ताभावो वाऽस्तीति न व्यभिचार इत्याहुः ॥
भाषा-और चिन्तामणिकार गंगेशोपाध्यायादि नवीन आचार्योंका यह मत
है कि-मङ्गलका विघ्नध्वंसही फल है. ग्रन्थसमाप्ति तो बुद्धिमतिभादि ( स्फु-
र्त्यख्यसंस्कार ) कारणसमुदायसे होती है. शंका- जो पुरुष अपने कार्य्य करने
में स्वतःसिद्ध विघ्नोंके विरहवाला है उसके किये मङ्गलको निष्फलता होगी? समा०-
यह वार्ता हमको इष्ट है; क्योंकि विघ्नोंकी शंकासे उस धार्मिक पुरुषने मंगल किया
है और शिष्ट पुरुषोंका आचरणभी ऐसेही है. शंका- यदि मङ्गल निष्फल होगा
तो उसके बोधक शिष्टाचारातुमित वेदको अप्रमाणता होगी? समा०- विघ्नोंकी
विद्यमानावस्थामें विघ्नोंके नाशका बोधक वेद है अन्यथा नहीं इसीसे पाप भ्रम
से किया हुआ प्रायश्चित्त निष्फलभी है परन्तु उसके बोधक वेदको अप्रमाणता नहीं है
जैसे-विघ्नध्वंस विशेषमें मङ्गल कारण है, वैसेही विघ्नध्वंस विशेषमें (विनायक) ग-
णेशस्तुतिपाठादिभी कारण हैं और किसी स्थलमें विघ्नोंका अत्यन्ताभावही
समाप्तिका साधन है. तात्पर्य्य यह, कि सर्वत्र प्रतिबन्धक संसर्गाभावहीको कार्य
जनकता है. इस रीतिसे नास्तिकादिकृत ग्रन्थोंमें पूर्वजन्मकृत मङ्गलजन्य
पापनाश, अथवा स्वतःसिद्धविघ्नोंका अत्यन्ताभाव समझना चाहिये. एवं व्यतिरेक
व्यभिचार नहीं है। 'आहुः' यह क्रियापद 'नव्याः' इस कर्तृ पदसे अन्वित है.
संसारमहीरुहस्य बीजाय इति । संसार एव महीरुहो वृक्षस्तस्य
बीजाय निमित्तकारणायेत्यर्थः। एतेन ईश्वरे प्रमाणं दर्शितंभवति।
तथाहि।यथा घटादिकार्य्यं कर्तृजन्यं तथा क्षित्यङ्कुरादिकमपि।
नच तत्कर्तृत्वमस्मदादीनां सम्भवति । इत्यतस्तत्कर्तृत्वेनेश्वर-
१ क्षित्यंकुरादिकं “कर्तृजन्यं कार्य्यत्वात्” घटादिवत् यह ईश्वर साधक सिद्धान्तिका
प्रयोग है।
२ भूमण्डलकी रचना तथा अंकुरादिकी उत्पत्ति, जीवप्रयत्नसाध्य कदापि नहीं है.
६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
सिद्धिः। न च शरीराजन्यत्वेन कर्तृजन्यत्वसाधकेन सत्प्रतिपक्ष इति
वाच्यम्, अप्रयोजकत्वात्। मम३ तु कर्तृत्वेन कार्यत्वेन कार्यकारण-
भाव एवानुकूलस्तर्कः। “द्यावाभूमी जनयन् देव एक आस्ते
विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता” इत्यादय आगमा अप्यनुसन्धेयाः १
संसाररूप जो महीरुह ( वृक्ष ) उसका बीज अर्थात् निमित्त कारणभूत । इस
पूर्व कथनसे ईश्वरमें प्रणाम भी प्रदर्शन किया है । तथाहि । जैसे घटादि
कार्य कुलालादिकर्तासे जन्य हैं, वैसेही पृथिवीअंकुरादि कार्यभी कर्ताही से
जन्य हैं. पृथिवीअंकुरादिका कर्ता कोई अस्मदादि जीव तो बन ही नहीं सकता,
इसलिये तत्कर्त्तृत्वेन ईश्वरकी सिद्धि होसकती है. शंका-कर्तासे अजन्यत्व-
का साधक जो शरीराजन्यत्वरूप हेतु, उससे ‘ क्षित्यंकुरादि ’ अनुमान सत्प्रति-
पक्ष होगा. समाधान-यह कथन सम्यक् नहीं क्योंकि शरीराजन्यत्व रूप हेतुमें
अनुकूलतर्कका अभाव है और सिद्धान्तानुमानमें तो कर्तृत्वेन कार्यत्वेन रूपेण
जो परस्पर कार्यकारणभाव, वही अनुकूल तर्क है. एवं अनुमानसे ईश्वर
सिद्ध हुआ तो “आकाश तथा पृथवीका प्रादुर्भावकारक एक देव परमात्मा सदा
विराजमान है. वह विश्वका कर्ता है तथा संसारका पालक है ” इत्यादि-
अर्थबोधक वेदवाक्यभी ईश्वरसद्भावमें प्रमाण होसकते हैं ॥ १ ॥
१ “क्षित्यंकुरादिकं कर्तृजन्यं शरीराजन्यत्वात् । ध्वंसविशेषवत्” यह ईश्वर निराकारक
वादीका प्रयोग है; इससे सिद्धान्तीका प्रयोग सत्प्रतिपक्ष है.
२ “अप्रयोजकत्वात् । व्यभिचारशंकोत्थानेऽनुकूलतर्काभावादित्यर्थः ” भाव यह है
कि—वादीके प्रयोगमें यदि “शरीराजन्यत्वमस्तु कर्तृजन्यत्वं मास्तु ” इत्याकारक व्यभिचार
शंकाका उत्थान होय तो उसका वारक अनुकूल तर्क नहीं मिलता, क्योंकि तर्कका स्वरूप
प्रायः कार्यकारणभावभंगप्रसंगरूप होता है; सो प्रकृतमें वादीने “ यदि कर्तृजन्यत्वं
न स्यात् तर्हि शरीराजन्यत्वमपि न स्यात् ” यही कहना होगा; परन्तु इससेभी वादीके
प्रयोगमें व्यभिचारशंका निवृत्त नहीं होती क्योंकि कर्तृजन्यत्वका तथा शरीराजन्यत्वका
परस्पर कार्यकारणभाव यदि प्रथम कहीं प्रसिद्ध होय तो उसका “न स्यात् न स्यात् ”
कहके भंगप्रसंग दिया जाय. सो तो कहीं प्रसिद्ध है ही नहीं इसलिये वादीका प्रयोग अप्रयो-
जक है.
३ और मुझ सिद्धान्तीके प्रयोगमें तो व्यभिचार शंकाका निवर्तक “यदि कर्तृजन्यत्व
न स्यात् तर्हि कार्य्यत्वमेव न स्यात्” इत्याकारका कार्यकारणभाव भंगप्रसंगरूप अनुकू
तर्क मिल सकता है क्योंकि कर्तृजन्यत्वका तथा कार्य्यत्वका परस्पर कार्यकारणभा
प्रसिद्ध है. एवं ईश्वरसाधक अनुमान सत्प्रतिपक्ष नहीं है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ७
पदार्थान् विभजते,द्रव्यं गुण इत्यादि-
भाषा-'द्रव्यं गुणः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार पदार्थोंका विभाग दिखला-
ता है-
द्रव्यं गुणस्तथा कर्म सामान्यं सविशेषकम् ॥
समवायस्तथाऽभावःपदार्थाः सप्त कीर्तिताः॥२॥
भाषा-द्रव्य¹ गुण² तैसे कर्म³ सामान्य⁴ विशेष⁵ समवाय⁶ तैसे अभाव⁷, ये सात
पदार्थ न्यायवैशेषिक सिद्धान्तमें कथन किये हैं ॥ २ ॥
सप्तमस्याभावत्वकथनादेव षण्णां भावत्वं प्राप्तम्।तेन भावत्वेन
पृथगुपन्यासो न कृतः । एते च पदार्था वैशेषिकप्रसिद्धाः नैया-
यिकानामप्यविरुद्धाः प्रतिपादितं चैवमेव भाष्ये । अत एवोप-
मानचिन्तामणौ सप्तपदार्थभिन्नतया शक्तिसादृश्यादीनामति-
रिक्तपदार्थत्वमाशंकितम् । ननु कथमेत एव पदार्थाः शक्ति-
सादृश्यादीनामप्यतिरिक्तपदार्थत्वात् । तथाहि । मण्यादिसमव-
हितेन वह्निना दाहो न जन्यते । तच्छून्येन तु जन्यते । तत्र
मण्यादिना वह्नौ दाहानुकूला शक्तिर्नाश्यते । उत्तेजकेन मण्या-
पसारणेन च जन्यते इति कल्प्यते । एवं सादृश्यमप्यतिरिक्तः
पदार्थः।तद्धि न षट्सु पदार्थेष्वन्तर्भवति,सामान्येऽपि सत्वात् ।
यथा गोत्वं नित्यं तथाऽश्वत्वमपीति सादृश्यप्रतीतेः । नाप्यभावे
सत्त्वेन प्रतीयमानत्वादितिचेत् । न ।
भाषा-सातवां पदार्थ 'अभाव' कहनेहीसे पूर्वले षट्पदार्थोंको भावरूपता अर्थसे
सिद्ध हुई, इसलिये पूर्वले षट् पदार्थोंका भावरूपसे पृथक् स्थापन नहीं किया. येही
सात पदार्थ वैशेषिकशास्त्रमें प्रसिद्धहैं. तथा न्यायसिद्धान्तसेभी विरुद्ध नहीं हैं. इसी
वार्त्ताको कणाद मुनिकृत सूत्रभाष्यमेंभी लिखा है इसी लिये चिन्तामणिके उपमान
खण्डमें, शक्ति सादृश्य आदि पदार्थोंको उक्त सात पदार्थोंसे भिन्न होनेकी प्रभाकरके
मतसे शंका करी है । जैसे शंका-शक्तिसादृश्यादि अतिरिक्त पदार्थोंके होतेभी आप
सातही पदार्थ कैसे कहते हैं ? तथाहि, मणि मंत्र या औषधीके समीप होनेसे अग्निसे
दाह नहीं होता और मण्यादिके समीप न होनेसे अग्निसे दाह होता है.
८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
ऐसे स्थलमें मणिमंत्रादिसे अग्निकी दाहानुकूल शक्तिका विनाश होता है.
और उत्तेजक सूर्य्यकान्तमणिके समीप होनेसे किंवा चन्द्रकान्त मणिके दूर कर देनेसे
अग्निमें दाहानुकूल शक्तिकी उत्पत्ति होती है, ऐसी कल्पना होसकती है. ऐसेही
सादृश्यभी एक पृथक् पदार्थ है. वह सादृश्य, द्रव्यादि षट् भावपदार्थोंके अंतर्भूत
नहीं है, क्योंकि जैसे गोत्वजाति नित्य है वैसेही अश्वत्वजातिभी नित्य है. इसप्रती-
तिसे सादृश्यपदार्थ सामान्यमेंभी प्रतीत होता है. भाव यह है कि, द्रव्यादि षट्
भावपदार्थोंमेंसे किसीका कदापि केनचिद्रूपेण सामान्यमें भान नहीं होता और
सादृश्यका होता है. इस लिये पृथक् पदार्थ मानना चाहिये. ऐसेही सद्रूपसे अर्थात्
भावरूपसे प्रतीत होनेसे सादृश्यको अभावके अन्तर्भूत भी नहीं कह सकते एवं
शक्ति तथा सादृश्य उक्त द्रव्यादि सप्त पदार्थोंसे अतिरिक्त पदार्थ हैं.
मण्याद्यभावविशिष्टवन्ह्यादेर्दाहादिकं प्रति स्वातन्त्र्येण मण्य-
भावादेरेव वा हेतुत्वकल्पनेनैव सामञ्जस्येऽनन्तशक्तितत्प्राग-
भावध्वंसकल्पनानौचित्यात् । नचोत्तेजके सति प्रतिबन्धक-
सद्भावेऽपि कथं दाह इति वाच्यम्, उत्तेजकाभावविशिष्टमण्य-
भावस्य हेतुत्वात् । सादृश्यमपि न पदार्थान्तरम्, किन्तु तद्भि-
न्नत्वे सति तद्गतभूयोधर्मवत्त्वम् । यथा चन्द्रभिन्नत्वे सति चन्द्र-
गताह्लादकत्वादिमत्त्वं मुखे चन्द्रसादृश्यमिति ।
भाषा-चन्द्रकान्तमणि आदिके अभावविशिष्ट अग्निको, अथवा, स्वतंत्ररूपसे
मणिआदि के अभाव को दाहादि के प्रति कारण कल्पनेसे सम्यक् निर्वाह होय तो
मणिआदिके समवधानासमवधानसे अनेक वार शक्तिकी उत्पत्ति तथा उसके प्रागभाव
ध्वंसकी कल्पना करनी अनुचित है. शंका-उत्तेजक सूर्य्यकान्त मणिके सत्त्व
कालमें प्रतिबन्धक चन्द्रकान्तमणिके समीप होनेसेभी अग्निसे दाह कैसे होता है ?
समा०-केवल चन्द्रकान्तमणिही प्रतिबन्धक नहीं, किन्तु उत्तेजक सूर्य्यकान्तमणिके
अभावविशिष्ट चन्द्रकान्तमणि दाहके प्रति प्रतिबन्धक है और उत्तेजकाभाव
विशिष्टचन्द्रकान्तमणिके अभावको दाहके प्रति कारणता है. ऐसेही सादृश्य
भी उक्त पदार्थोंसे कोई पृथक् पदार्थ नहीं है; किन्तु "तद्भिन्नत्वे सति तद्गतभूयो
धर्मवत्त्व" ही सादृश्य है अर्थात् 'तत्' किसीएक वस्तुसे भिन्न पदार्थमें जो उस
वस्तुकी अनेक धर्मवन्ता, वही उस पदार्थमें सादृश्य है. जैसे चन्द्रसे भिन्न सुन्दर
मुखमें, चन्द्रगत (आह्लादकत्व) सुख विशेष जनकत्वादि धर्मंही चन्द्रनिरूपित
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९
सादृश्य है; वह सादृश्य घटक धर्म कहीं जातिरूप है जैसे–घट 'सदृशःपटः' और
कहीं उपाधिरूप है. जैसे–"यथा गोत्वं नित्यं तथाऽश्वत्वमपि" इत्यादि.
द्रव्याणि विभजेत, क्षित्यबिति–
भाषा–' क्षित्यप् ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकारद्रव्योंका विभाग लिखताहै–
क्षित्यप्तेजोमरुद्व्योमकालदिग्देहिनो मनः॥
द्रव्याणि–
एतानि नव द्रव्याणीत्यर्थः ।
भाषा–पृथिवी जल अग्नि वायु आकाश काल दिशा आत्मा और मन ये नव द्रव्य हैं.
ननु द्रव्यत्वजातौ किं मानम्, नहि तत्र प्रत्यक्षं प्रमाणं घृतज-
तुप्रभृतिषु द्रव्यत्वाग्रहादिति चेत् न ।
शंका–द्रव्यत्वजातिमें क्या प्रमाण है ? यदि “ द्रव्यं द्रव्यं ” इस
अनुगत प्रतीतिसे प्रत्यक्ष प्रमाणही कहो तो सम्यक् नहीं, क्योंकि अशास्त्री
लोग घृत लाक्षादि पदार्थोंमें द्रव्य व्यवहार नहीं करते; इस लिये प्रत्यक्ष
प्रमाणसे सकल द्रव्य साधारण द्रव्यत्व जातिकी सिद्धि नहीं होती.
कार्यसमवायिकारणतावच्छेदकतया संयोगस्य विभागस्य वा
समवायिकारणतावच्छेदकतया द्रव्यत्वजातिसिद्धेरिति । ननु
( .१ ) समवायेन कार्य्यत्वावच्छिन्नके प्रति तादात्म्येन द्रव्यको कारणता है. कारणता
अवश्य किञ्चिद्धर्म्मावच्छिन्ना होती है । वह धर्मलाघवसे जातिरूप है। अनुमानप्रमाण
उसका साधक है । तथाहि । समवायसम्बन्धावच्छिन्न कार्य्यत्वावच्छिन्न कार्य्यनिष्ठ कार्य्यता
निरूपिततादात्म्य सम्बन्धावच्छिन्ना द्रव्यनिष्ठा या समवायिकारणता, सा किञ्चिद्धर्म्मावच्छिन्ना
कारणतात्वात्, घटगतकार्य्यतानिरूपितदण्डगतकारणतावत् १। यद्वा समवाय सम्बन्धावच्छिन्न
संयोगत्वावच्छिन्नसंयोगनिष्ठ कार्य्यता निरूपिता तादात्म्य सम्बन्धावच्छिन्नाद्रव्यनिष्ठा या
समवायिकारणता २ । अथवा समवायसम्बन्धावच्छिन्नविभागत्वावच्छिन्नविभागनिष्ठकार्य्यता
निरूपिता तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्ना द्रव्यनिष्ठा या समवायिकारणता ३ । इत्यादि
इन पिछले द्वय अनुमानमें साध्य हेतु तथा उदाहरणका निवेश प्रथम अनुमानवत्
करलेना. प्रथम अनुमानोंमें कार्य्यत्वधर्मको कार्य्यतावच्छेदक माननेमें उपस्थितिकृत गौरव है.
इसलिये द्वितीय कहा. द्वितीयमेंभी नित्यसंयोगवादीके मतसे संयोगत्वावच्छिन्ना कार्य्यता
अप्रसिद्ध है, इसलिये तृतीय कहा. नित्यविभागका आश्रय कोई द्रव्य नहीं है, इसलिये
विभागत्वावच्छिन्ना कार्य्यता अप्रसिद्ध नहीं है.
१० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
दशमं द्रव्यं तमः कुतो नोक्तम् । तद्धि प्रत्यक्षेण गृह्यते, तस्य च
रूपवत्वात्कर्मवत्त्वाच्च द्रव्यत्वम्। तच्चगन्धशून्यत्वात् न पृथिवी,
नीलरूपवत्त्वाच्च न जलादिकम्। तत्प्रत्यक्षे चालोकनिरपेक्षं चक्षुः
कारणमिति चेत्,न, आवश्यकतेजोऽभावेनोपपत्तौ द्रव्यान्तरक-
ल्पनाया अन्याय्यत्वात् । रूपवत्ताप्रतीतिस्तु भ्रमरूपा, कर्म-
वत्त्वप्रतीतिरप्यालोकापसारणोपाधिकीभ्रांतिरेव । तमसोऽतिरिक्त
द्रव्यत्वेऽनन्तावयवादिकल्पना गौरवं च स्यात्। सुवर्णस्य यथा तेज
स्यान्तर्भावस्तथाऽग्रे वक्ष्यते ॥
भाषा-कार्यकी समवायि कारणताकी अवच्छेदक होनेसे संयोगकी
अथवा विभागकी समवायि कारणताकी अवच्छेदक होनेसे द्रव्यत्व
जातिकी सिद्धि होती है. मीमांसक शंका-दशम द्रव्य अन्धकार क्यों नहीं
कहा ? उसका नेत्रोंसे ग्रहणभी होसकता है. और नील रूपवाला होनेसे, तथा
गमनादि क्रियावाला होनेसे उसमें द्रव्यरूपता सिद्ध है. गन्धशून्य होनेसे वह
पृथिवीरूप नहीं है नीलरूपवाला होनेसे जलादि स्वरूपभी नहीं है. और उसके
प्रत्यक्षमें प्रकाशकी सहायतासे विनाही नेत्र इंद्रियको कारणता है ॥ एवं दशम द्रव्य
अन्धकारभी माननीय है. समाधान-उष्ण स्पर्श तथा भास्वर रूपवाला होनेसे अव-
श्य माननीय जो तेजःपदार्थ, उसके अभावमेंही यदि अन्धकार व्यव-
हार होसके तो और अधिक पृथक्द्रव्यकी कल्पना करनी अनुचित है और उसमें
रूपवत्ता प्रतीति तो भ्रमरूपहै. एवं कर्मवत्त्व प्रतीतिभी प्रकाशापसरण
रूप उपाधिबलसे भ्रमरूपा है. अन्धकारको पृथक् द्रव्य माननेसे, उसके अनेक
अवयव, तथा तिनके उत्पत्ति विनाश कल्पना करनेमें गौरवभी होता है. इसलिये
अन्धकार पृथक् द्रव्य नहीं है और सुवर्ण जैसे तेजः पदार्थ के अन्तर्भूत है,
वैसे तेजो निरूपण अवसरमें कहेंगे ॥ ३ ॥
गुणान् विभजते, अथ गुणा इति-
' अथगुण ' इत्यादि ग्रंथसे मूलकार गुणोंका विभाग दिखलाता हैं-
-अथ गुणा रूपं रसो गन्धस्ततः परम् ॥ ३ ॥
स्पर्शः संख्या परिमितिः पृथक्त्वं च ततः परम् ॥
संयोगश्च विभागश्च परत्वं चापरत्वकम् ॥ ४ ॥
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११
बुद्धिः सुखं दुःखमिच्छा द्वेषो यत्नो गुरुत्वकम् ॥
द्रवत्वं स्नेहसंस्कारावदृष्टं शब्द एव च ॥ ५ ॥
भाषा-रूपं. रसं गन्धं स्पर्शं संख्यां परिमाणं पृथक्त्व संयोगं विभागं परत्वं अपरत्वं
बुद्धि सुखं दुःखं इच्छा द्वेषं प्रयत्न गुरुत्वं द्रव्वत्वं स्नेहं संस्कार ( अदृष्ट ) धर्म्म
अधर्म्म और शब्दं ये चतुर्विंशति गुण हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥
एतेगुणा श्रतुर्विंशतिसंख्याकाः कणादेन कण्ठतश्च शब्देन च
दर्शिताः तत्र गुणत्वादिकजातिसिद्धिरेग्रे वक्ष्यते ॥ ४ ॥ ५ ॥
भाषा-शेषपद कारिकामें केवल पादपूर्तिके लिये हैं.ये चौबीस गुण कणाद मुनिने
अपने सूत्रोंमें कंठसे पढ़े तथा 'च' शब्दसे दिखलाये हैं, अर्थात् "प्रयत्नाश्च
गुणाः" ऐसे सूत्रके अन्तमें लिखा है.इससे यह सिद्ध हुआ कि १७ गुण कंठसे पढ़े हैं
और ७ 'च' शब्दसे दिखलाए हैं. उन गुणोंमें गुणत्वादि जातिकी सिद्धि
गुणनिरूपणावसरमें दिखलाई जायगी ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥
कर्माणि विभजते, उत्क्षेपणमिति-
भाषा-' उत्क्षेपणं ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कर्म्मोंका विभाग दिखलाताहै-
उत्क्षेपणं ततोऽपक्षेपणमाकुञ्चनं तथा ॥
प्रसारणंच गमनं कर्म्माण्येतानि पञ्च च ॥ ६ ॥
भाषा-वस्तुका ऊपरको क्षेपण करना तैसे नीचेको क्षेपण करना.पटादि विस्तृत
पदार्थोंको संकोचना, तैसे संकुचित पदार्थोंको विस्तृत करना एवं परिच्छिन्न पदार्थकी
गमन क्रियाको मिलाकर यह पांचप्रकारका कर्म है ॥ ६ ॥
कर्म्मत्वजातिस्तु प्रत्यक्षसिद्धा । एवमुत्क्षेपणत्वादिकमपि ॥६॥
भाषा-चलनाकार अनुगत प्रत्यय ज्ञान होनेसे कर्म्मत्व जाति प्रत्यक्ष सिद्ध है.
ऐसे कर्म्मत्वजातिकी व्याप्य उत्क्षेपणत्व आदि जातियांभी प्रत्यक्ष सिद्ध हैं ॥ ६ ॥
नन्वत्र भ्रमणादिकमपि पञ्चकर्म्माधिकतया कुतो नोक्त-
मत आह । भ्रमणमित्यादि ।
शंका-यहां भ्रमणादि पांचकर्म्म औरभी क्यों नहीं कथन किये ? समाधान-
इसी शंकाके उत्तरमें 'भ्रमणं' इत्यादि ग्रन्थको मूलकार स्वयं लिखताहै-
१२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भ्रमणं रेचनं स्पंदनोर्ध्वज्वलनमेव च ।
तिर्यग्गमनमप्यत्र गमनादेव लभ्यते ॥ ७ ॥
भाषा-गोलाकार चलना, तिड़कना, थोड़ा२चलना, दीपशिखादिका ऊपरको ज्वलना,
सर्पादिका टेढ़ा चलना ये सब गमनके अंतर्भूत होनेसे प्रकृतमें गमन कथन मात्रहीसे
लाभ होसकते हैं ॥ ७ ॥
सामान्यं निरूपयति सामान्यमिति ॥
भाषा-‘सामान्यं’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार सामान्यका निरूपण करताहै-
सामान्यं द्विविधं प्रोक्तं परं चापरमेव च ॥
द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु सत्तापरतयोच्यते ॥ ८ ॥
भाषा-पर और अपर भेदसे सामान्य दो प्रकारका है । द्रव्यादि तीन में
रहनेवाली सत्ताका नाम पर सामान्य है ॥ ८ ॥
तल्लक्षणं तु नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वम्, अनेकसमवेतत्वं
संयोगादीनामप्यस्त्यत उक्तं नित्यत्वे सतीति । नित्यत्वे सति
समवेतत्वं गगनपरिमाणादीनामप्यस्त्यत उक्तमनेकेति ।
नित्यत्वे सत्यनेकवृत्तित्वमत्यन्ताभावेऽप्यस्त्यतो वृत्तित्वसा-
मान्यं विहाय समवेतत्वमित्युक्तम् । एक व्यक्तिवृत्तिस्तु न
जातिः । तथाचोक्तम् । व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं संकरोऽथानव-
स्थितिः । रूपहानिरसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥ १॥ इति ॥
तत्रैकव्यक्तिकत्वादाकाशत्वं न जातिः । तुल्यव्यक्तिकत्वाद्घ
टत्वं कलशत्वं न जातिद्वयम् । सङ्कीर्णत्वाद्भूतत्वं मूर्तत्वं च न
जातिः अनवस्थाभयात् सामान्यत्वं न जातिः ॥
१ परस्परात्यन्ताभावके समानाधिकरणमें रहनेवाले धर्मद्वयका एकत्र समावेश
संकर है, जैसे भूतत्वाभाववाले मनमें मूर्तत्व है और मूर्तत्वाभाववाले आकाशमें भूतत्व है
इन दोनोंका एकत्र समावेश पृथ्वी आदि चतुष्टयमें है, अर्थात् पृथ्वीआदि चतुष्टयमें भूतत्व
मूर्तत्व दोनों धर्म रहते हैं । इसलिये ये दोनों जातिरूप नहीं हैं.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १३
भाषा-नित्य और अनेक व्यक्तियोंमें समवायसम्बन्धसे रहनेवाला यह उस
सामान्यका लक्षण है. अनेक व्यक्तियोंमें समवाय सम्बन्धसे रहनेवाले
संयोगादि गुणभी हैं. सामान्यके लक्षणकी उनमें अतिव्याप्ति होगी, उसके
वारणार्थ लक्षणमें “नित्यत्वे सति” यह विशेषण कहा. संयोगादि गुण अनेक व्यक्ति-
योंमें समवायसम्बन्धसे रहते तो हैं परन्तु नित्य नहीं हैं, याते दोष नहीं. नित्य
तथा समवायसम्बन्धसे रहनेवाले आकाशके परिमाणादिभी हैं उनसे लक्षणकी
अतिव्याप्ति वारणार्थ ‘अनेक’ पद कहा. आकाशके परिमाणादि गुण नित्य
होकर समवायसम्बन्धसे रहते तो हैं, परन्तु अनेक व्यक्तियोंमें नहीं रहते किन्तु
केवल एक आकाशमात्रमें रहते हैं, याते दोष नहीं. नित्य होकर अनेक व्यक्तियोंमें
वर्तनेवाला अत्यन्ताभावभी है उससे लक्षणकी अतिव्याप्ति वारणार्थ साधारणरूपसे
वर्तनेको न कहकर समवायसम्बन्धसे वर्तना कहा. अत्यन्ताभाव अपने
अधिकरणोंमें स्वरूपसम्बन्धसे रहता है, समवाय से नहीं रहता; याते दोष नहीं
एकव्यक्तिमें वर्तनेवाला धर्म जातिरूप नहीं कहा जाता; इसी वार्ताको प्राचीनाचार्यों-
नेभी कहाहै ॥ व्यक्तिका अभेद तुल्यत्व, संकर, अनवस्था रूपहानि और
असम्बन्ध ये जातिके बाधकोंका संग्रह है ॥ १ ॥ उनमें आकाशादि एक व्यक्ति
में रहनेवाला होनेसे आकाशत्वादि धर्म जातिरूप नहीं है ॥ १ ॥ दोनोंका
सदृश स्वरूप होनेसे घटत्व और कलशत्व दोनों धर्म जातिरूप नहीं हैं, किन्तु शरीर
कृत लाघवसे घटत्वधर्मही जातिरूप है ॥ २ ॥ दोनोंका संकीर्ण होनेसे
भूतत्व और मूर्तत्व ये दोनों धर्म जातिरूप नहीं हैं ॥ ३ ॥ अनवस्थाके भयसे
सामान्यमें सामान्यत्व धर्म जातिरूप नहीं है ॥ ४ ॥
विशेषस्य व्यावृत्तस्वभावस्य रूपहानिः स्यादतो विशेषत्वं न
जातिः । समवायसम्बन्धाभावात् समवायो न जातिः । परत्वम-
धिकदेशवृत्तित्वम्। अपरत्वमल्पदेशवृत्तित्वम्। सकलजात्यपेक्ष-
याऽधिकदेशवृत्तित्वात् सत्तायाः परत्वम्। एतद्बोधनायैव द्रव्यादि
त्रिकवृत्तिरित्युक्तम्। तदपेक्षया चान्यासां जातीनामपरत्वम्॥८॥
१ भाव यह कि यदि विशेषपदार्थमें विशेषत्वरूप जाति मान ली जाय तो उसीसे उसको
व्यावर्तकत्व कहना होगा; क्योंकि सामान्याश्रयको सामान्यरूपसे भेदसाधकताका नियम है
परन्तु विशेषपदार्थको सामान्यरूपसे भेद साधकता बन नहीं सकती क्योंकि उनके स्वतः
व्यावर्त कत्वात्मक रूपकी हानि होती है.
२ समवायको या अभावको जातिवाला माननेसे प्रतियोगिताऽनुयोगिताऽन्यतरसम्बन्धसे
समवायाभावही बाधक है अर्थात् समवायमें प्रतियोगिताऽनुयोगिताऽन्यतर सम्बन्धसे समवाय
नहीं रहता. इति.
१४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-न्यायसिद्धान्तमें घटपटादि यावत् पदार्थ अपने २ घटत्व पटत्वादि
धम्मोंसे परस्पर पृथक् बनेरहते हैं, परन्तु विशेष पदार्थ उनसे उलटाहै; अर्थात्
नित्य द्रव्योंको पृथक् करता हुआ आप स्वयं पृथक् बना रहता है. यही इसका
स्वरूप है. अब इससे उलटा यदि इसमें विशेषत्व धर्म मानलिया जाय तो इसके
'स्वतओ व्यावृत्तत्व' रूप वास्तव स्वरूपकी हानि होगी, याते विशेषत्व धर्म्म जातिरूप
नहीं है ॥ ५ ॥ जाति अपने अधिकरणोंमें समवायसम्बन्धसे रहतीहै, यह पूर्व
कहचुके हैं. एवं इसमें समवायसम्बन्धके अभावसे समवायमें समवायत्व धर्म्म
जातिरूप नहीं है ॥६॥ अधिक देशमें रहनेवालीका नाम परसत्ता है; और न्यून
देशमें रहनेवालीका नाम अपरसत्ता है. घटत्त्वादि यावत् जातियोंकी अपेक्षा
अधिक देशमें रहनेवाली होनेसे सत्ता पर है इसी वार्त्ताके बोधनार्थ मूलमें
“द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु” अर्थात् द्रव्यादि तीनमें रहनेवाली कहा. सत्ताकी अपेक्षासे
घटत्वादि यावत् जातियां अपर हैं ॥ ८ ॥
परभिन्ना तु या जातिः सैवापरतयोच्यते ।
द्रव्यत्वादिकजातिस्तु परा,परतयोच्यते ॥ ९ ॥
व्यापकत्वात्परापि स्याद्व्याप्यत्वादपरापि च ॥
भाषा-परसत्तासे भिन्न जातिको अपरजाति कहतेहैं और द्रव्यत्वादिक
जातियां तो पर भी हैं तथा अपरभी हैं ॥ ९ ॥ जात्यन्तरकी अपेक्षा
व्यापक होनेसे वही जाति पर कही जाती है. तथा व्याप्य होनेसे उसीमें अपर
व्यवहार होताहै.
व्यापकत्वादिति। पृथिवीत्वाद्यपेक्षया व्यापकत्वादधिकदेशवृत्ति-
त्वाद्द्रव्यत्वादेः परत्वम् । सत्ताऽपेक्षया व्याप्यत्वादल्पदेशवृत्ति-
त्वाच्च द्रव्यत्वस्याऽपरत्वम् । तथाच धर्मद्वयसमावेशादुभयमवि-
रुद्धम् ।
भाषा-पृथिवीत्वादि जातियोंकी अपेक्षासे व्यापकरूपसे अधिक देशमें वर्तनेवाली
होनेसे द्रव्यत्व आदि जातियोंको परत्व है. तैसे सत्ताकी अपेक्षा व्याप्यरूपसे अल्प
देशमें रहनेवाली होनेसे द्रव्यत्वादि जातियोंको अपरत्व है. इस रीतिसे एक
व्यक्तिमें धर्म्मद्वयका समावेश परस्पर विरुद्ध नहीं है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १५
विशेषं निरूपयति, अन्त्य इति-
भाषा-'अन्त्यः इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार विशेषका निरूपण करता है-
अन्त्यो नित्यद्रव्यवृत्तिर्विशेषः परिकीर्त्तितः ॥१०॥
भाषा-नित्य द्रव्योंके अवसानमें वर्त्तनेवालेका नाम विशेष कथन किया है॥१०॥
अन्तेऽवसाने वर्तते इत्यन्त्यो यदपेक्षया विशेषो नास्तीत्यर्थः ।
एकमात्रवृत्तिरिति फलितोऽर्थः । घटादीनां द्वयणुकपर्यन्तानां
तत्तदवयवभेदात् परस्परं भेदः परमाणूनां परस्परं भेदको विशेष
एव। स तु स्वत एव व्यावृत्तस्तेन तत्र विशेषान्तरापेक्षा नास्ती
ति भावः ।
भाषा-अन्तमें अर्थात् अवसानमें जो वर्त्ते उसका नाम 'अन्त्य' है, अर्थात् जिसकी
अपेक्षा दूसरा कोई विशेष नहीं है. फलितार्थ यह कि-विशेष पदार्थ प्रत्येक नित्य
द्रव्यकी एक व्यक्तिमात्रमें रहता है. घटादि स्थूलकार्योंसे लेकर द्वयणुकादि
सूक्ष्म कार्योंपर्य्यन्त अपने २ कपालपरमाणु आदि अवयवोंके भेदसे परस्पर भेद है,
परन्तु परमाणुओं का परस्पर भेदक विशेष पदार्थही है; वह आप स्वतः व्यावृत्तस्व-
रूप है, इससे उसमें विशेषान्तर कल्पना करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ १० ॥
समवायं दर्शयति, घटादीनामिति-
भाषा-'घटादीनां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार समवाय को दिखलाताहै-
घटादीनां कपालादौ द्रव्येषु गुणकर्मणोः ॥
तेषु जातेश्च सम्बन्धः समवायः प्रकीर्तितः ॥ ११ ॥
भाषा-घटादि कार्योंका अपने कारण कपालादिकोंके साथ, तथा गुणकर्मोंका
द्रव्योंके साथ, एवं जातिका द्रव्यगुण कर्म तीनोंके साथ जो सम्बन्ध, उसका नाम
समवाय कहाहै ॥ ११ ॥
१ यहां ईश्वरकी नित्यज्ञानवत्त्वेन तथा आकाशकी शब्दसमवायिकारणत्वेन
व्यावृत्तिको मानते हुए विशेष पदार्थके माननेवालेभी कईएक पण्डित लोग ईश्वरमें तथा
आकाशमें विशेषपदार्थकी वृत्तिता नहीं मानते हैं, और नवीन लोग तो यह कहते हैं कि-
विशेषके अतिरिक्त पदार्थ माननेमें कोई प्रमाण नहीं है. जैसे-विशेष पदार्थ स्ववृत्ति धर्मसे
विना स्वयं व्यावृत्त हैं, वैसेही नित्य द्रव्योंकोभी मान सकते हैं. एवं विशेष पदार्थके
अतिरिक्त माननेका कुछ उपयोग नहीं.
१६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अवयवावयविनोर्जातिव्यक्त्योर्गुणगुणिनोः क्रियाक्रियावतो-
र्नित्यद्रव्यविशेषयोश्च यः सम्बन्धः स समवायः । समवायत्वं
नित्यसम्बन्धत्वम् ।
भाषा-अवयव अवयवी का जाति व्यक्ति का गुण गुणी का क्रिया
क्रियावालेका, नित्य द्रव्य विशेष का जो सम्बन्ध, उसका नाम समवाय है.
समवाय नाम नित्य होनेवाले सम्बन्ध विशेषका है.
तत्र प्रमाणं तु गुणक्रियादिविशिष्टबुद्धिर्विशेषणविशेष्यसम्बन्ध
विषया विशिष्टबुद्धित्वात् दण्डीपुरुष इतिविशिष्टबुद्धिवदित्यनु
मानेन संयोगादि बाधात् समवायसिद्धिः। नच स्वरूपसम्बन्धेन
सिद्धसाधनम् । अर्थान्तरं वा अनन्तस्वरूपाणां सम्बधत्वकल्पने
गौरवाल्लाघवादेकसमवायसिद्धेः । नच समवायस्यैकत्वे वायौ रूप
वत्ता बुद्धिप्रसङ्गः तत्र रूपसमवायसत्त्वेऽपि रूपाभावात् ।
भाषा-उसकी सिद्धिमें अनुमान प्रमाण है. जैसे ' दण्डी पुरुषः ' यह विशिष्ट
बुद्धिः दण्डरूप विशेषण तथा पुरुषरूप विशेष्य, दोनोंको ग्रहण करती हुई, उन
दोनोंके संयोगरूप सम्बन्धकोभी विषय करती है. वैसेहि, गुण क्रियादि विशिष्ट
बुद्धिभी विशिष्ट बुद्धि होनेसे गुणक्रियादि विशेषण तथा गुणक्रियादिमान्
विशेष्य इन दोनोंको विषय करतीं हुई इन दोनोंके सम्बन्धकोभी विषय करती है.
१ शंका-यद्यपि लाघवसे एक समवाय सिद्ध होनेसे प्राचीनोंके मतमें दोष नहीं
तथापि समवाय नाना माननेवाले नवीनोंके मतमें उक्तानुमानसे समवायसिद्धि नहीं होती।
किन्तु समवाय नाना कल्पनाकी अपेक्षा स्वयं उपस्थित स्वरूप नाना माननेही उचित हैं.
(समा०) नव्यमतमें समवायेन पटकार्यके प्रति तादात्म्येन तन्तुओंको हेतुता है. पटमें
रहनेवाली कार्य्यताका अवच्छेदक सम्बन्ध समवाय है. शंका-समवायके स्थानमें स्वरूप
सम्बन्ध मानके भी कार्य कारण भावकी कल्पना होसकती है (समा०) एवं जिसमें
समवायेन कार्य्यकी उत्पत्ति होती है वह समवायि कारण है.) यह समवायिकारणकी व्यवस्था
न रहेगी. शंका-जिसमें सम्बद्ध होकर कार्य्य उत्पन्न होय वह समवायि कारण ऐसा
कहनेसेभी निर्वाह होसकता है. (समा०) ऐसे कहनेसे कपालोंमें सम्बद्ध जो घटका
ध्वंस उसके प्रतिभी कपालोंको समवायि कारणता माननी होगी यह उचित नहीं
इससे यह सिद्ध हुआ कि भावकार्य्यमें रहनेवाला जो कार्य्यतारूप धर्म, उसका अवच्छे-
दक सम्बन्ध समवाय है. एवं कार्य्यतावच्छेदक सम्बन्धविधया नव्यमतमेंभी समवाय
की सिद्धि हुई.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३७
इस अनुमानसे संयोगसम्बन्धका तो प्रकृतमें बाध है इसलिये समवायही की
सिद्धि होती है; क्योंकि संयोग दो द्रव्यपदार्थों हीका होताहै. शंका-अयुत
सिद्ध पदार्थोंका स्वरूप सम्बन्ध कहनेवाले मीमांसकके मतमें इस अनुमानसे
सिद्ध साधन हुआ और समवायसाधनके लिये प्रवृत्त नैयायिकको अर्थान्तर हुआ,
अर्थात् समवायसाधनार्थ प्रवृत्त नैयायिकको स्वरूपकी सिद्धि हुई तो अर्थान्तर हुआ.
समाधान-अनेक स्वरूप सम्बन्ध कल्पना करनेमें गौरव है, इससे लाघवसे प्रकृता
नुमानद्वारा एक समवाय की सिद्धि माननीही उचित है. शंका-यदि समवाय
एक है तो स्पर्शसमवाय तथा रूपसमवायको एक होनेसे वायुमें रूपवत्ता बुद्धिको
प्रमात्व होना चाहिये. समाधान-वायुमें रूपसमवायके होनेसेभी प्रतियोगित्व
सम्बन्धसे रूपके वहां न होनेसे वायुमें रूपवत्ता प्रतीति नहीं होती.
न चैवमभावस्यापि वैशिष्ट्यं सम्बन्धान्तरं सिद्ध्येदिति वाच्यम्,
तस्य नित्यत्वे भूतले घटानयनानन्तरमपि घटाभावबुद्धिप्रसंगात्,
घटाभावस्य तत्र सत्त्वात्, तस्यच नित्यत्वात्। अन्यथा देशान्तरे
ऽपि तत्प्रतीतिर्न स्यात्, वैशिष्ट्यस्य च तत्र सत्त्वात्, ममतुमते घटे
पाकरक्ततादशायां श्यामरूपस्य नष्टत्वात् न तद्वत्ता बुद्धिः। वै-
शिष्ट्यस्यानित्यत्वे त्वनन्तवैशिष्ट्यकल्पने तवैव गौरवम् ।
इत्थंच तत्तत्कालीनतत्तद्भूतलादिकं तत्तदभावानां सम्बन्धः॥११॥
शंका-इसरीतिसे अभावका भी भूतलादिकोंमें 'वैशिष्ट्य' संज्ञक सम्बन्धा-
न्तर अतिरिक्त पदार्थ सिद्ध होगा. समा०-अतिरिक्त मानना यदि आपको
अंगीकार होय तो हम पूछते हैं कि-क्या वह वैशिष्ट्य नित्य है अथवा अनित्य
है ? यदि नित्य कहो तो भूतलमें घट लानेके पश्चात्भी घटाभाव बुद्धि होनी
१ अर्थात् “ घटाभाववद्भूतलं ” इत्यादि ज्ञानकालीन घटाभावविषयक बुद्धि
विशिष्ट तत्तद्भूतलादिक तत्तदभावोंका स्वरूपसम्बन्ध है. भाव यह कि-तत्तत्क्षणा-
त्मक कालभी अभावके स्वरूपमें विशेषणरूपेण भान होताहै ऐसा हमको अभिमत है. एवं
यद्यपि घटात्यन्ताभाव स्वरूपेण भूतलादिकोंमें नित्य है इसलिये घट विद्यमान दशामेंभी
“ घटाभाववद्भूतलं ” इत्याकारक बुद्धि हुई चाहिये ॥ तथापि “घटाभाववद्भूतलं” इत्यादि
ज्ञानकालिक तत्तत्क्षणरूप विशेषणके अभाव होनेसे घटसत्त्वकालमें घटाभावावगाहनी
प्रतीति नहीं होसकती क्योंकि उस कालमें तत्तद्क्षणरूप विशेषणके न होनेसे विशेषणाभाव
प्रयुक्त विशिष्टाभाव कह सकते हैं.
२
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१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
चाहिये, क्योंकि घटाभाव नित्य है, याते घटवाले भूतलभेंभी घटाभाव सिद्ध है
( अन्यथा ) घटाभावको अनित्य मानो तो घटशून्यदेशमेंभी घटाभावकी
प्रतीति नहीं हुई चाहिये; क्योंकि घटाभाव सर्वत्र एक जैसा है, सो वह
घटके लानेसे नाश हो चुका है और अभाव का ‘वैशिष्ट्य’ संज्ञक सम्बन्ध तो घट
के लानेसेभी भूतलेमें विद्यमान है. शंका- समवायको एक माननेवाले तुम
सिद्धान्तीके मतमेंभी अग्निसंयोगसे रक्त हुए घटमें प्रथम होनेवाले श्यामरूप-
का समवाय तो है, वहां श्यामरूपवत्ता बुद्धि होनी चाहिये? समाधान- मेरे मतमें
तो घटकी पाकरक्तता दशामें श्यामरूपका नाश हुआ है, उसके समवायके होनेसेभी
प्रतियोगित्वसम्बन्धसे उसके न होनेसे ‘तद्वत्ता बुद्धि’ नहीं होती; क्योंकि प्रत्यक्षमें
विषयकोभी विषयत्वेन कारणता है और तुम यदि ‘वैशिष्ट्य’ को अनित्य मानो
तो अनन्त वैशिष्ट्य कल्पनामें तुमको गौरवभी होगा. शंका- वैशिष्ट्यको न
मानकर यदि घटाभावकाभूतलादिमें स्वरूपसम्बन्धभी माने तो तौभी पूर्ववत् घटवाले
भूतलभेंभी घटाभावबुद्धि होनी चाहिये? **समाधान-**हमारे मतमें केवल स्वरूप
मात्रही सम्बन्ध नहीं है; किन्तु, घटाभावज्ञानकालमें जिस जिस भूतलमं घटाभाव
बुद्धि है वह वह भूतलादिकही उस उस अभावका स्वरूपसम्बन्ध विशेष है, इस
रीतिसे पूर्वोक्त अतिप्रसंगभी नहीं है ॥ ११ ॥
अभावं विभजते, अभावस्त्विति-
भाषा-‘अभावस्तु’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार अभावका विभाग दिखलाता है-
अभावस्तु द्विधा संसर्गान्योऽन्याभावभेदतः ॥
भाषा-संसर्गाभाव तथाअन्योन्याभाव भेदसे अभाव दो प्रकारका है.
अभावत्वं द्रव्यादिषट्कान्योऽन्याभाववत्त्वम् । संसर्गेति । संस-
र्गाभावान्योन्याभावभेदादित्यर्थः । अन्योन्याभावस्यैकविधत्त्वा-
त्तद्विभागाभावात् ।
भाषा-द्रव्यादि षट्कसे भिन्नका नाम अभाव है. यह सामान्यरूपसे अभावका
लक्षण है. वह अभाव संसर्गाभाव और अन्योन्याभाव भेदसे दो प्रकारका है. अन्यो-
न्याभावको एक तरहका होनेसे उसका विभाग नहीं है.
१ यह अभावका लक्षण अन्योऽन्याभावघटित है और वक्ष्यमाण अन्योन्याभावका लक्षण
सामान्यरूपसे अभावघटित है, एवं यह लक्षण परस्पराश्रयरूप दोषसे दूषित हुआ, इस लिये
समवाय सामानाधिकरण्यान्यतर सम्बन्धविच्छिन्न प्रतियोगिताक सत्ताभावरूप ही अभावका
निर्वचन मानना उचित है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १९
संसर्गाभावं विभजते, प्रागभाव इति-
भाषा-'प्रागभाव' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार संसर्गाभावके विभागको दिखलाताहै-
प्रागभावस्तथा ध्वंसोऽप्यत्यन्ताभाव एव च ॥ १२॥
एवं त्रैविध्यमापन्नः संसर्गाभाव इष्यते ॥
भाषा-प्रागभाव तैसे ध्वंस और अत्यन्ताभाव ॥ १२ ॥ एवं तीन भेदोंको प्राप्त
हुआ एकही संसर्गाभाव है.
संसर्गाभावत्वं अन्योन्याभावभिन्नाभावत्वम् । अन्योऽन्याभावत्वं
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावत्वम्। विनाश्यभा-
वत्वं प्रागभावत्वम् । जन्याभावत्वं ध्वंसत्वम् । नित्यसंसर्गाभा-
वत्वं अत्यन्ताभावत्वम् । यत्र तु भूतलादौ घटादिकमपसारितं
पुनरानीतं च तत्र घटकालस्य सम्बन्धाघटकतयाऽत्यन्ताभावस्य
नित्यत्वेऽपि घटकाले न घटात्यन्ताभावबुद्धिः । तत्रोत्पादविना-
शशाली चतुर्थोऽयमभाव इति केचित् ।
भाषा-अन्योन्याभावसे भिन्न अभावका नाम 'संसर्गाभाव' है और जिसकी तादा-
त्म्यसम्बन्धावच्छिन्ना प्रतियोगिता होय उसका नाम 'अन्योन्याभाव' है; विनाश
होनेवाले अभावका नाम 'प्रागभाव' है. एवं उत्पन्न होनेवाले अभावका नाम
ध्वंस है. अधिकरणपदार्थमें वस्तुके सदा सम्बन्धाभावका नाम 'अत्यन्ता-
भाव' है. जहां किसी एक भूतलदेशसे घटादि निकाल दिये और कालान्तरमें
फिर वहींदी स्थापन किये; वहां विशेषणरूप वर्तमान घटकालको अभावके स्वरूप-
सम्बन्धमें अविष्ट होनेसे अत्यन्ताभावके नित्य होनेसेभी घटकालमें घटात्यन्ता-
भावबुद्धि नहीं होती. कई एक आचार्य ऐसे स्थलमें उत्पत्तिविनाशवाला चौथा
अभाव मानते हैं.
अत्र ध्वंसप्रागभावयोरधिकरणे नात्यन्ताभाव इति प्राचीनमतम्।
श्यामघटे रक्तो नास्तीति, रक्तघटे श्यामो नास्तीति धीश्च प्राग-
भावं ध्वंसं चावगाहते, नतु तदत्यन्ताभावम् । नव्यास्तु तत्र
१ द्वितीय नाम इसका शास्त्रमें सामयिकाभाव है. समयविशेषमें होनेवालेका नाम
'सामयिकाभाव' है.
२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
विरोधे मानाभावाद्ध्वंसादिकालावच्छेदेनाऽप्यत्यन्ताभावो वर्तत
इतिप्राहुः। नन्वस्त्वभावानामधिकरणात्मकत्वं लाघवादिति चेत्,
न,अनन्ताधिकरणात्मकत्वकल्पनामपेक्ष्यातिरिक्तकल्पनायाएव
लघीयस्त्वात् । एवं चाधाराधेयभावोऽप्युपपद्यते । एवं च तत्त-
च्छब्दगन्धरसाद्यभावानां प्रत्यक्षत्वमुपपद्यते, अन्यथा तत्तदधि-
करणानां तत्तदिन्द्रियाग्राह्यत्वादप्रत्यक्षत्वं स्यात् । एतेन ज्ञान-
विशेषकालविशेषाद्यात्मकत्वमत्यन्ताभावस्येति प्रत्युक्तम्, अ-
प्रत्यक्षत्वापत्तेः ।
भाषा-यहां प्राचीनाचार्योंका यह सिद्धांत है कि-ध्वंस तथा प्रागभावके
अधिकरणमें अत्यन्ताभाव नहीं रहता है. 'श्यामघटमें रक्तरूप नहीं है तथा रक्तघट-
में श्यामरूप नहीं है,' इत्यादि प्रतीतिसें रक्तरूपके प्रागभावका तथा श्यामरूपके
ध्वंसका अवगाहन होता है; किन्तु, उनके अत्यन्ताभावका अवगाहन नहीं होता,
क्योंकि प्रागभावका तथा ध्वंसका अत्यन्ताभावके साथ विरोध है और नवीन तो
यह कहते हैं कि-उनके परस्पर विरोधमें कोई प्रमाण नहीं. जिस कालमें ध्वंस
तथा प्रागभाव रहते हैं उसी कालमें अत्यन्ताभावभी उसी अधिकरणमें रहताहै
प्रभाकर शंका-लाघवसे अभावोंको तत्तदधिकरणस्वरूपही मानना उचित है.
समा०-अनेक अधिकरणस्वरूप कल्पनाकी अपेक्षा अभावोंकी अतिरिक्त कल्प-
नाही लघुभूता है. एवं अभावोंको अधिकरणोंसे अतिरिक्त माननेसे उनका आ-
धाराधेयभावभी बनसक्ता है. ऐसे माननेसे 'तत् तत्' शब्द गन्धरसादियों के
अभावका प्रत्यक्षभी बनसकता है. (अन्यथा) अभावोंको अधिकरण स्वरूप माने
तो अभावोंका साक्षात्कार नहीं होगा; क्योंकि शब्द गन्ध रसादिके अभावके अ-
धिकरण भूतलजलादि श्रोत्रघ्राणादि इन्द्रियोंसे ग्राह्य नहीं हैं. अभावोंको अधिक-
रणस्वरूप माने तो उनका ग्रहणभी नहीं होगा. इस वक्ष्यमाण कथनसे अत्यन्ताभाव-
को ज्ञानविशेषस्वरूप, अथवा कालविशेषस्वरूप माननेवालोंका सिद्धान्तभी खण्डित
किया, क्योंकि ऐसे माननेसे अत्यन्ताभावका प्रत्यक्ष नहीं होगा.
१ शंका-अभावाधिकरणका भावको तथा अभावप्रतियोगिताक अभावको जैसे आपने
अधिकरणस्वरूप मानकेभी आधाराधेय भावकी उपपत्ति करी है वैसेही प्रत्येक स्थलमें
अभावको अधिकरणस्वरूप मानकर आधाराधेय भावभी मानलिया जाय तो हानि क्या है?
समा०-इस रीतिसे इस दोषके वारण कियेभी 'तत्तत्' शब्द गन्धरसादिके अप्रत्यक्ष होनेका
दोष बना है इसी तात्पर्यसे मुक्तावलीकारने "एवंच "इत्यादि ग्रन्थसे द्वितीय दोष लिखाहै.