न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 29, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५
श्चित्तस्य निष्फलत्वेऽपि न तद्बोधकवेदाप्रामाण्यम् । मङ्गलं च
विघ्नध्वंसविशेषे कारणम् । विघ्नध्वंसविशेषे च विनायकस्तवपा-
ठादिः, क्वचिच्च विघ्नात्यन्ताभाव एव समाप्तिसाधनं, प्रतिबन्धक-
संसर्गाभावस्यैव कार्यजनकत्वात् । इत्थं च नास्तिकादिकृतग्र-
न्थेषु जन्मान्तरीयमङ्गलजन्यदुरितध्वंसः स्वतः सिद्धविघ्नात्य-
न्ताभावो वाऽस्तीति न व्यभिचार इत्याहुः ॥
भाषा-और चिन्तामणिकार गंगेशोपाध्यायादि नवीन आचार्योंका यह मत
है कि-मङ्गलका विघ्नध्वंसही फल है. ग्रन्थसमाप्ति तो बुद्धिमतिभादि ( स्फु-
र्त्यख्यसंस्कार ) कारणसमुदायसे होती है. शंका- जो पुरुष अपने कार्य्य करने
में स्वतःसिद्ध विघ्नोंके विरहवाला है उसके किये मङ्गलको निष्फलता होगी? समा०-
यह वार्ता हमको इष्ट है; क्योंकि विघ्नोंकी शंकासे उस धार्मिक पुरुषने मंगल किया
है और शिष्ट पुरुषोंका आचरणभी ऐसेही है. शंका- यदि मङ्गल निष्फल होगा
तो उसके बोधक शिष्टाचारातुमित वेदको अप्रमाणता होगी? समा०- विघ्नोंकी
विद्यमानावस्थामें विघ्नोंके नाशका बोधक वेद है अन्यथा नहीं इसीसे पाप भ्रम
से किया हुआ प्रायश्चित्त निष्फलभी है परन्तु उसके बोधक वेदको अप्रमाणता नहीं है
जैसे-विघ्नध्वंस विशेषमें मङ्गल कारण है, वैसेही विघ्नध्वंस विशेषमें (विनायक) ग-
णेशस्तुतिपाठादिभी कारण हैं और किसी स्थलमें विघ्नोंका अत्यन्ताभावही
समाप्तिका साधन है. तात्पर्य्य यह, कि सर्वत्र प्रतिबन्धक संसर्गाभावहीको कार्य
जनकता है. इस रीतिसे नास्तिकादिकृत ग्रन्थोंमें पूर्वजन्मकृत मङ्गलजन्य
पापनाश, अथवा स्वतःसिद्धविघ्नोंका अत्यन्ताभाव समझना चाहिये. एवं व्यतिरेक
व्यभिचार नहीं है। 'आहुः' यह क्रियापद 'नव्याः' इस कर्तृ पदसे अन्वित है.
संसारमहीरुहस्य बीजाय इति । संसार एव महीरुहो वृक्षस्तस्य
बीजाय निमित्तकारणायेत्यर्थः। एतेन ईश्वरे प्रमाणं दर्शितंभवति।
तथाहि।यथा घटादिकार्य्यं कर्तृजन्यं तथा क्षित्यङ्कुरादिकमपि।
नच तत्कर्तृत्वमस्मदादीनां सम्भवति । इत्यतस्तत्कर्तृत्वेनेश्वर-
१ क्षित्यंकुरादिकं “कर्तृजन्यं कार्य्यत्वात्” घटादिवत् यह ईश्वर साधक सिद्धान्तिका
प्रयोग है।
२ भूमण्डलकी रचना तथा अंकुरादिकी उत्पत्ति, जीवप्रयत्नसाध्य कदापि नहीं है.