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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 30

६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
सिद्धिः। न च शरीराजन्यत्वेन कर्तृजन्यत्वसाधकेन सत्प्रतिपक्ष इति
वाच्यम्, अप्रयोजकत्वात्। मम३ तु कर्तृत्वेन कार्यत्वेन कार्यकारण-
भाव एवानुकूलस्तर्कः। “द्यावाभूमी जनयन् देव एक आस्ते
विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता” इत्यादय आगमा अप्यनुसन्धेयाः १
संसाररूप जो महीरुह ( वृक्ष ) उसका बीज अर्थात् निमित्त कारणभूत । इस
पूर्व कथनसे ईश्वरमें प्रणाम भी प्रदर्शन किया है । तथाहि । जैसे घटादि
कार्य कुलालादिकर्तासे जन्य हैं, वैसेही पृथिवीअंकुरादि कार्यभी कर्ताही से
जन्य हैं. पृथिवीअंकुरादिका कर्ता कोई अस्मदादि जीव तो बन ही नहीं सकता,
इसलिये तत्कर्त्तृत्वेन ईश्वरकी सिद्धि होसकती है. शंका-कर्तासे अजन्यत्व-
का साधक जो शरीराजन्यत्वरूप हेतु, उससे ‘ क्षित्यंकुरादि ’ अनुमान सत्प्रति-
पक्ष होगा. समाधान-यह कथन सम्यक् नहीं क्योंकि शरीराजन्यत्व रूप हेतुमें
अनुकूलतर्कका अभाव है और सिद्धान्तानुमानमें तो कर्तृत्वेन कार्यत्वेन रूपेण
जो परस्पर कार्यकारणभाव, वही अनुकूल तर्क है. एवं अनुमानसे ईश्वर
सिद्ध हुआ तो “आकाश तथा पृथवीका प्रादुर्भावकारक एक देव परमात्मा सदा
विराजमान है. वह विश्वका कर्ता है तथा संसारका पालक है ” इत्यादि-
अर्थबोधक वेदवाक्यभी ईश्वरसद्भावमें प्रमाण होसकते हैं ॥ १ ॥
१ “क्षित्यंकुरादिकं कर्तृजन्यं शरीराजन्यत्वात् । ध्वंसविशेषवत्” यह ईश्वर निराकारक
वादीका प्रयोग है; इससे सिद्धान्तीका प्रयोग सत्प्रतिपक्ष है.
२ “अप्रयोजकत्वात् । व्यभिचारशंकोत्थानेऽनुकूलतर्काभावादित्यर्थः ” भाव यह है
कि—वादीके प्रयोगमें यदि “शरीराजन्यत्वमस्तु कर्तृजन्यत्वं मास्तु ” इत्याकारक व्यभिचार
शंकाका उत्थान होय तो उसका वारक अनुकूल तर्क नहीं मिलता, क्योंकि तर्कका स्वरूप
प्रायः कार्यकारणभावभंगप्रसंगरूप होता है; सो प्रकृतमें वादीने “ यदि कर्तृजन्यत्वं
न स्यात् तर्हि शरीराजन्यत्वमपि न स्यात् ” यही कहना होगा; परन्तु इससेभी वादीके
प्रयोगमें व्यभिचारशंका निवृत्त नहीं होती क्योंकि कर्तृजन्यत्वका तथा शरीराजन्यत्वका
परस्पर कार्यकारणभाव यदि प्रथम कहीं प्रसिद्ध होय तो उसका “न स्यात् न स्यात् ”
कहके भंगप्रसंग दिया जाय. सो तो कहीं प्रसिद्ध है ही नहीं इसलिये वादीका प्रयोग अप्रयो-
जक है.
३ और मुझ सिद्धान्तीके प्रयोगमें तो व्यभिचार शंकाका निवर्तक “यदि कर्तृजन्यत्व
न स्यात् तर्हि कार्य्यत्वमेव न स्यात्” इत्याकारका कार्यकारणभाव भंगप्रसंगरूप अनुकू
तर्क मिल सकता है क्योंकि कर्तृजन्यत्वका तथा कार्य्यत्वका परस्पर कार्यकारणभा
प्रसिद्ध है. एवं ईश्वरसाधक अनुमान सत्प्रतिपक्ष नहीं है.