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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 350 में से

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पृष्ठ 26

२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
समवायसे मिश्रित, प्राग्भावादि अनेकविध अभावोंकी प्रकाशक ऐसे यह बुद्धिमें
विराजमान शुभयुक्तियुक्त न्यायसिद्धान्तरूप मोतियोंकी माला विश्वनाथ
पण्डितने विष्णु परमात्मा के वक्षःस्थलमें अर्पण करी हुई, पण्डित लोगोंके चित्तों
को बहुत काल पर्यन्त आनन्द विस्तीर्ण करे ॥ ३ ॥ इस पूर्व कथनसे
द्रव्यादि पदार्थवत्त्वेन रूपेण मुक्तावलीनिरूपित सादृश्य ग्रन्थमें कहा अर्थात् जैसे
मोतियोंकी माला द्रव्यसाध्या है तथा गुणसे (सूत्र) से गुन्थिा है एवं पुण्यवान् पुरुषोंके
पूर्वकृत सत्कर्मोंकी बोधिका है, और मोतियोंकी प्राचीन जातियोंसे तथा उनमें
होनेवाले महत्त्व निर्मलत्व आदि धर्मोंसे निरंतर सम्बन्धवाली है तथा तेजो-
अभावमें अर्थात् अन्धकारमें प्रकर्षरूपसे उजाला करती है ॥ वैसेही यह मेरा
मुक्तावलीरूप ग्रन्थभी मोतियोंकी मालाकी तरह पूर्ण गुण रखता है ॥ ३ ॥
विघ्नविघाताय कृतं मंगलं शिष्यशिक्षायै निबध्नाति । नूतनेति ।
भाषा-ग्रन्थ लिखनेमें जो विघ्न, उनके विनाशके लिये किये मङ्गलको शिष्य
लोगोंकी शिक्षाके अर्थ (अर्थात् मेरी तरह मेरी शिष्यपरंपराभी कार्यमात्रके
आद्यमें कृष्णपरमात्माका स्मरण करे) ग्रन्थकार, ग्रन्थके आदिमें लिखता है
नूतनेति ।
नूतनजलधररुचये गोपवधूटीदुकूलचौराय ।
तस्मै कृष्णाय नमः संसारमहीरुहस्य बीजाय ॥१॥
भाषा-नवीन मेघके सदृश कान्तिवाले, तथा गोपोंकी नव युवतियोंके वस्त्र
चुरानेवाले, संसाररूप वृक्षके कारणभूत जगत् प्रसिद्ध श्रीकृष्ण देवको
नमस्कार है ॥ १ ॥
१ विघाताय । यहां वि+घात = दोपद हैं. प्रथमका नाम उपसर्ग है और
द्वितीयका नाम प्रातिपदिक है, उनमें द्वितीयपदको तो स्वार्थवाचकत्व सर्वतंत्रसिद्धान्त
सिद्ध है परन्तु उपसर्गपदको कई आचार्य्य वाचकत्व मानते हैं, और कई पदान्तरयोगसे
द्योतकत्व मानते हैं. प्रकृतमें द्योतकत्व वादीके मतमें तो यद्यपि दोष नहीं, परन्तु वाच-
कत्व वादीके मतमें ( उत्पत्तिवाली वस्तुका अभाव ) ‘घात’ पदहीका अर्थ होनेसे ‘ वि ’
पद अनर्थक प्रतीत होता है; तथापि आचार्योंका यह संकेत है कि-जहां विशिष्ट
वाचक पदके समीप विशेषणवाचक पदान्तर होय वहां विशिष्ट वाचक पदको विशेष्य मात्र
वाचकत्व होता है. इससे प्रकृतमें यह सिद्ध हुआ कि-केवल ‘ घात ’ पदका अर्थ शुद्ध
अभाव मात्र है, और ‘ वि ’ विशेषणके मिलानेमें “ उत्पत्तिवालेका अभाव ” यह अर्थ
हुआ. एवं दोनों मतमें कुछ दोष नहीं.