न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष- ]
प्राचुर्य्ये वा बोध्यम् । प्रचुरस्यैव चास्य बलवत्तरविघ्न निराक-
रणे कावणत्वम् । विघ्नध्वंसस्तु मङ्गलस्य द्वारमित्याहुः प्राञ्चः ॥
भाषा-( समाधान ) अनिन्दित जो शिष्ट पुरुषोंका प्रयत्न उस प्रयत्नका मङ्गलको
विषयीभूत होनेसे मङ्गलकी सफलताका अनुमान होता है. एवं ( तत्र ) मङ्गले
विशेषरूपसे फलकी जिज्ञासा हुई तो दृष्ट फलका सम्भव होय तो अदृष्टकी
कल्पना करनी अयोग्य है. प्रकृतमें “आरब्धं कर्म्ममे निर्विघ्नं परिसमाप्यताम्” इस
कामनासे प्रवृत्त पुरुषकी कामना विषयरूपसे उपस्थित होनेसे हम मङ्गलका
फल ग्रन्थकी समाप्तिरूपही कल्पना करते हैं. ( इत्थञ्च ) इसरीतिसे मङ्गलसमाप्ति
रूप फलवाला हुआ तो जिस नास्तिकादिके ग्रन्थके आद्यमें मङ्गल न देखनेमें आवे
वहांभी उस ग्रन्थकर्ताके पूर्व जन्म जन्मान्तरके किये मङ्गलकी कल्पना अर्थात्
अनुमान कर लेना होता है और जिस ( कादम्बरी ) ग्रन्थविशेषकी मङ्गल
होनेमेंभी समाप्ति नहीं हुई है वहां कोई बलिष्ठ विघ्न किंवा विघ्नोंका समुदाय
जानना चाहिये. बलिष्ठ विघ्नविशेष अथवा विघ्नोंके समुदायके विनाशार्थ, बलिष्ठ
मङ्गल समुदायहीकी कारणता है. और प्राचीन आचार्य लोग तो विघ्नध्वंसको
मङ्गलका व्यापार कहते हैं.
नव्यास्तु मङ्गलस्य विघ्नध्वंस एव फलम्। समाप्तिस्तु बुद्धिप्रति-
भादिकारणकलापात् । नचैवं स्वतःसिद्धविघ्नविरहवता कृतस्य
मङ्गलस्य निष्फलत्वापत्तिरिति वाच्यम्, इष्टापत्तेः। विघ्नशङ्कया
तदाचरणात् तथैव शिष्टाचारात् । नच तस्य निष्फलत्वे तद्बो-
धकशिष्टाचारानुमित²वेदप्रामाण्यापत्तिरितिवाच्यम्, सति³ विघ्ने
तन्नाशस्यैव वेदबोधितत्वात् । अत एव पापभ्रमेण कृतस्य प्राय-
( १ ) " बुद्धिस्तात्कालिकी ज्ञेया मतिरागामिगोचरा ॥ प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभां
विदुः ॥ इस वचनसे विलक्षण बुद्धिका नाम प्रतिभा है.
( २ ) यहां फलसाधनांशमें भ्रांतिरहित का नाम शिष्ट है; उन शिष्टोंके आचारसे
अर्थात् प्रयत्नसे अनुमित “ समाप्तिकामो मङ्गलमाचरेत् ” इत्यादि वेदवचन उसको अप्रमा-
ण्यापत्ति होगी इस वचनके अनुमापक अनुमानका आकार “ मङ्गलं वेदबोधितकर्तव्यताकं
अलौकिकाविगीतशिष्टाचारविषयत्वात् दर्शादिवत् ” इत्यादि है.
( ३ ) एवं स्वतः सिद्ध विघ्नविरहवाले पुरुषमें विघ्नात्मक प्रतियोगिरूप कारणके न
होनेसे विघ्नध्वंसरूप कार्यके अनुदयकी उपपत्ति हुई तो मङ्गलमें कारणताभी अबाधित
रही और कारणताबोधक वेदकोभी अप्रमाणता न हुई.