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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

१८८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
पदोंके अर्थके जाननेवाले पुरुषको ( सहकार ) आम्रादि पदोंकी सहकारतासे 'पिक'
पदकी शक्ति कोकिला नामक पक्षीविशेषमें स्वयं ग्रहण होजातीहै-इति ८ ।
तत्र जातावेव शक्तिर्न तु व्यक्तौ, व्यभिचारादानन्त्याच्च। व्यक्तिं
विना च जातिभानस्यासम्भवाद्यक्तेरपि भानमिति केचित् ।
तन्न। शक्तिं विना व्यक्तिभानानुपपत्तेः ।
भाषा-( तत्र ) उसमेंभी मीमांसक लोग यह कहतेहैं कि-घटादिपदोंकी घट-
त्वादिजातिहीमें शक्ति है, किन्तु कम्बुग्रीवादिमद्व्यक्तिमें नहीं. उसमें कारण यह है
कि, व्यक्तिमें शक्तिग्रहणका व्यभिचार है अर्थात् जिस व्यक्तिमें शक्ति ग्रहण नहींभी
करी वहांभी शाब्दबोधका उदय होताहै; परन्तु वहां शाब्दबोध कारणीभूत शक्तिज्ञान
नहीं है इसलिये व्यभिचार है और यदि जातिमें शक्ति स्वीकार करें तो व्यभिचार
नहीं है; क्योंकि जात्या वहांभी शक्ति गृहीत हो चुकी है और व्यक्तियां अनन्त हैं
इसलिये प्रत्येक व्यक्तिमें शक्ति माननेमें गौरवभी है और व्यक्तिसे विना केवल
जातिका भान तो होही नहीं सकता किन्तु जातिभासक सामग्रीही व्यक्तिका भास-
कभी माननी होगी; इसलिये व्यक्तिका भान तो अर्थसेही सिद्ध है; उसमें शक्ति मान
नेकी कोई आवश्यकता नहीं है. यह सब मीमांसकका मन्तव्य है । ( तन्न ) सो
समीचीन नहीं है; क्योंकि यदि व्यक्तिमें पदकी शक्ति न होय तो व्यक्तिका भान
नहीं हुआ चाहिये.
न च व्यक्तौ लक्षणा। अनुपपत्तिप्रतिसन्धानं विनापिव्यक्तिबोधात्।
न च व्यक्तिशक्तावानन्त्यम्, सकलव्यक्तावेकस्या एव शक्तेः स्वी-
कारात् । नचाननुगमः, गोत्वादेरेवानुगमकत्वात् ।
शंका-हम व्यक्तिमें लक्षणा मानलेंगे. समाधान-लक्षणा वहां मानी जातीहै.
जहां किसीतरहकी अनुपपत्ति होय और व्यक्तिमें तो किसीतरहकी अनुपपत्तिभी
दीखनहीं पड़ती. यहां लक्षणा माननेका कौन प्रयोजन है? शंका-व्यक्तिमें शक्ति
माननेमें गौरव तो है; क्योंकि व्यक्तियां अनन्त हैं इसलिये शक्तियांभी अनन्तही माननी
पड़ेंगी.समाधान-यावत् व्यक्तियोंमें हम एकही शक्तिका स्वीकार करतेहैं इसलिये
गौरव नहीं है.शंका-घटपटादि व्यक्ति योंको अननुगत होनेसे विषयतासम्बन्धसे शक्ति
ज्ञान कारणतामें अवच्छेदकत्वधर्मका अभावरूप अननुगम होगा. समाधान-
गोत्वघटत्वादि धर्मोंसे अनुगम होसक्ताहै अर्थात् गोव्यक्तिविषयक शाब्दबोधके प्रति
गोत्वविशिष्टविषयक शक्तिज्ञानत्वेन कारणताके होनेसे अननुगमरूप दोष नहीं है.

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८९
किंच गौः शक्येति शक्तिग्रहो यदि तदा व्यक्तौ शक्तिः, यदि तु
गोत्वं शक्यमिति शक्तिग्रहः तदा गोत्वप्रकारकपदार्थस्मरणं शा-
ब्दबोधश्च न स्यात्, समानप्रकारकत्वेन शक्तिज्ञानस्य पदार्थ-
स्मरणं शाब्दबोधं प्रति च हेतुत्वात् ।
भाषा-( किञ्च ) यदि “गौः गोपदशक्यः” इत्याकारक शक्तिज्ञान हुआ है
तो व्यक्तिहीमें शक्ति अनुभवसिद्ध है और यह विशिष्टज्ञान प्रमात्मकभी होसकताहै
क्योंकि आपके सिद्धान्तमें अन्यथा ख्यातिका अस्वीकार है और यदि “गोत्वं गोपा-
दशक्यम्” इत्याकारक शक्तिज्ञान हुआहै तो गोपदसे गोत्वप्रकारक पदार्थका अर्थात्
गोव्यक्तिका स्मरण तथा गोत्वप्रकारक गोविशेष्यक शाब्दबोधका उदय नहीं होना
चाहिये; क्योंकि यह नियमहै कि-यत्प्रकारक यद्विशेष्यक शब्दशक्तिका ग्रहण हुआहै
वह शब्दशक्तिग्रह तत्प्रकारक पदार्थस्मरणके प्रति तथा तत्प्रकारक तद्विशेष्यक
शाब्दबोधके प्रति कारण होताहै.
किंच गोत्वे यदि शक्तिस्तदा गोत्वत्वं शक्यतावच्छेदकं वाच्यम्,
गोत्वत्वं तु गवेतरासमवेतत्वे सति सकलगोसमवेतत्वं तथा च
गोव्यक्तीनां शक्यतावच्छेदकेऽनुप्रवेशात्तत्रैव गौरवम् ।
भाषा-( किञ्च ) यदि गोपदकी ( गोत्व ) जातिहीमें शक्ति मान लीजाय तो
शक्यतावच्छेदक धर्म गोत्वके सिरपर गोत्वत्वही कहना होगा. फिर वह गोत्वत्वंभी
‘किमाकारक’ है? ऐसी जिज्ञासावाले पुरुषको “गवेतरासमवेतत्वे सति सकलगोस-
मवेतत्वं--अर्थात् गोव्यक्तिसे इतर व्यक्तियोंमें असमवेत होना और केवल गोव्यक्तिमात्र
में समवेत होनाही गोत्वमें गोत्वत्व है” यही उत्तर कहना होगा.(तथाच) इस कथनसे
गोव्यक्तियोंकाभी शक्यतावच्छेदक कोटिमें प्रवेश होनेसे तथा शाब्दबोधकी कारणतावच्छे-
दककोटिमें प्रवेश होनेसे आपहीको गौरव होगा.
तस्मात्तत्तज्जात्याकृतिविशिष्टतत्तद्व्यक्तिबोधानुपपत्त्या कल्प्य-
माना शक्तिर्जात्याकृतिविशिष्टव्यक्तौ विश्राम्यतीति ।
भाषा-(तस्मात्) इसलिये केवल जातिमें या (आकृति) अवयवसंस्थानमें या
व्यक्तिमात्रमें शक्ति माननेसे (तत्तत्) उस २ गोत्वादिजाति तथा (तत्तत्)
उस २ शृङ्गशासनादि अवयवसंस्थानविशिष्ट (तत्तत्) उस २ गोआदि व्यक्तियोंके
बोधकी अनुपपत्ति होनेसे बुद्धिपूर्वक शक्तिकी कल्पना जात्याकृतिविशिष्ट व्यक्तिमें
विश्रान्त होतीहै-इति ।

१९० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
शक्तं पदम् । तच्चतुर्विधम् । क्वचिद्यौगिकं, क्वचिद्रूढं, क्वचिद्यो-
गरूढं क्वचिद्यौगिकरूढम् ।
भाषा-वाचकतासम्बन्धसे शक्तिविशिष्टका नाम 'पद' है; वह चार प्रकारका है
कहीं यौगिक है १, कहीं रूढ है २, कहीं योगरूढ है ३, और कहीं यौगिकरूढहै ४.
यत्रावयवार्थ एव बुध्यते तद्यौगिकम्, यथा पाचकादिपदम् । १ ।
भाषा-जो अपने अवयवोंसे स्वार्थका बोधक हो वह 'यौगिक' पद है; ऐसे पाचक
पाठकादि अनन्त पद हैं " पचतीति पाचकः" यहां 'पच' धातु कर्तामें 'ण्वुल
प्रत्ययका विधान है, एवं "पठतीति पाठकः" यहां 'पठ' धातु कर्तामें 'ण्वुल'
प्रत्ययका विधान है. एवं पाकक्रिया करनेवालेका नाम 'पाचक' तथा पाठक्रिया
करनेवालेका नाम 'पाठक' शब्दके अवयवोंहीसे लाभ हुआ १ ।
यत्रावयवशक्तितैरपेक्ष्येण समुदायशक्तिमात्रेण बुध्यते तद्रूढम्,
यथा गोमण्डलादिपदम् । २ ।
भाषा-जो अवयवशक्तिकी अपेक्षासे विना समुदाय शक्तिसे स्वार्थका बोधक हो
वह रूढ पद है, ऐसे 'गोमण्डलादि' अनन्त पद हैं अर्थात् यहां 'गो' पदकी समु-
दायशक्ति गौव्यक्तिमें है और मंडलपदकी समुदायशक्ति सूर्यादिरोधक कुण्डलाकार
परिवारादिमें है, एवं यहां समुदायशक्तिसे शाब्दबोध होताहै, इसलिये अवयवशक्ति
विचारकी कुछ आवश्यकता नहीं है. २ ।
यत्र त्ववयवशक्तिविषये समुदायशक्तिरप्यस्ति तद्योगरूढम्,
यथा पङ्कजादिपदम् । तथाहि । पङ्कजपदमवयवशक्त्या पङ्क-
जनिकर्तृत्वरूपमर्थं बोधयति,समुदायशक्त्या च पद्मत्वेन रूपेण
पद्मं बोधयति।न च केवलावयवशक्त्या कुमुदे प्रयोगः स्यादिति
वाच्यम् । रूढिज्ञानस्य केवलयौगिकार्थज्ञाने प्रतिबन्धकत्वादिति
प्राञ्चः ।
भाषा-एवं जो पद अवयव तथा समुदाय उभयशक्तिद्वारा स्वार्थका बोधक
हो वह 'योगरूढ' है, ऐसे पंकजादि पद हैं. ( तथाहि ) वह ऐसे है कि--एकही
'पंकज' पद अपनी " पंकात् जायते इति पंकजः" इत्याकारक अवयवशक्तिसे
पंकसे उत्पन्न होनेवाली वस्तुको कहता है और समुदायशक्तिसे पद्मत्वेन रूपेण
( पद्म ) कमलका बोधक है. शंका-केवल अवयवशक्तिहीसे यदि 'पंकज' पदका

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९१
( कुमुद ) श्वेतउत्पलमें प्रयोग मान लिया जाय तो हानि क्या है ? समाधान-
ऐसे स्थलमें प्राचीन लोग रूढिज्ञानको केवल यौगिकार्थज्ञानके प्रति प्रतिबन्धक
मानतेहैं; इसलिये अवयवशक्तिसे 'पंकज' पदका श्वेतोत्पलमें प्रयोग मानना उचित नहीं.
वस्तुतस्तु समुदायशक्त्योपस्थितपद्मेऽवयवार्थपङ्कजनिकर्तु-
रन्वयो भवति सान्निध्यात्। यत्र रूढ्यर्थस्य बाधः प्रतिसन्धीयते
तत्र लक्षणया कुमुदादेर्बोधः, यत्र तु कुमुदत्वेन रूपेण बोधे न
तात्पर्यज्ञानं पद्मत्वस्य च बाधस्तत्रावयवशक्तमात्रेण निर्वाह
इत्यप्याहुः। यत्र तु स्थलपद्मादावयवार्थबाधस्तत्र समुदा-
यशक्त्या पद्मत्वेन रूपेण बोधः । यदि तु स्थलपङ्कजं वि-
जातीयमेव तदा लक्षणैव । ३ ।
भाषा-और वास्तवमें तो यह वार्ता है कि-समुदायशक्तिद्वारा उपस्थित हुए
पद्ममें अवयवार्थ पंकसे उत्पन्न होनेवालेका सान्निध्यसे अन्वय होता है. भाव यह
कि- अवयवशक्तिसेभी प्रथम समुदायशक्तिद्वारा उपस्थितवस्तुहीका लाभ होता है
और जिस स्थलमें रूढिशक्तिसे अर्थका बाध प्रतीत होवे अर्थात् अर्थ न बन सके
वहां लक्षणावृत्तिसे कुमुदादि बोधमेंही वक्ताका तात्पर्य जानना उचित है और
जहां कुमुदत्वेन रूपेण कुमुदके बोधमें वक्ताका तात्पर्य ज्ञान नहीं है और पद्मत्वेन
रूपेण पद्मका जहां बाध प्रतीत होरहाहै वहां केवल अवयवशक्ति मात्रहीसे निर्वाह
करना उचित है. ऐसेभी कहतेहैं जहां कहीं ( स्थल ) सूकीभूमिमें उत्पन्न हुए पद्म
आदिमें 'पङ्कज' शब्दके अवयवार्थका बाध प्रतीत हो वहां समुदायशक्तिहीसे पद्म-
त्वेन रूपेण पद्मका बोध होताहै और यदि स्थलमें होनेवाला पद्म जलमें उत्पन्न
हुए पद्मसे विलक्षण अभिमत होय तौ उसमें ' पङ्कज ' पदकी लक्षणाही माननी
उचित है ३।
यत्रावयवार्थरूढ्यर्थयोः स्वातन्त्र्येण बोधस्तद्यौगिकरूढम्,
यथोद्भिदादिपदम् । तत्र हि उद्भेदनकर्ता तरुगुल्मादिरपि बु-
ध्यते यागविशेषोऽपीति । ४ ।
भाषा-एवं जिससे अवयवार्थका तथा रूढ्यर्थका स्वतन्त्ररूपसे बोध हो अर्थात्
वस्तुविशेषको अवयवशक्तिसे तथा अन्यवस्तुविशेषको समुदायशक्तिसे बोधन करै
वह पद ' यौगिकरूढ ' है; ऐसे उद्भिद आदि पद हैं. यह ' उद्भिद ' पद “ ऊर्द्धं
भिन्नत्ति इति उद्भिद् ” इस व्युत्पत्तिसे अवयवशक्तिद्वारा ( तरुगुल्म ) वृक्षलतादि
का बोधक है और समुदायशक्तिसे उद्भिद नामक यागकाभी बोधक है-इति ४ ।

१९२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
लक्षणा शक्यसम्बन्धस्तात्पर्यानुपपत्तितः ॥ ८२ ॥
भाषा-शक्यके सम्बन्धविशेषका नाम लक्षणा है और तात्पर्यानुपपत्ति लक्ष-
णमें बीज है ॥ ८२ ॥
लक्षणा शक्यसम्बन्धः इत्यादि । गङ्गायां घोष इत्यादौ गङ्गाप-
दस्य शक्यार्थे प्रवाहरूपे घोषस्यान्वयानुपपत्तिस्तात्पर्यानुपप-
त्तिर्वा यत्र प्रतिसन्धीयते तत्र लक्षणया तीरस्य बोधः ।
भाषा-“जहत्स्वार्था अजहत्स्वार्था भेदसे लक्षणा दो प्रकारकी है. उसमें प्रथम
कहतेहैं-“ गंगायां घोषः” इत्यादि वाक्यस्थलमें गंगापदके शक्यार्थ प्रवाहमें
(घोष) पदार्थ गोपालग्रामका अन्वय नहीं होसकता और घोष पदार्थ गोपाल
ग्रामका गंगापदके शक्यार्थ प्रवाहमें अन्वय करनेसे वक्ताका तात्पर्य्यभी नहीं बन
सकता; क्योंकि जलप्रवाहमें गोपालग्रामकी स्थितिकाही असम्भव है; इसलिये
“ गंगायां घोषः” इस वाक्यमें 'गंगा' पद स्वशक्यार्थ प्रवाहके तीरमें लाक्षणिक
है. परम्परा सम्बन्धसे स्वार्थबोधन करनेवाला पद लाक्षणिक होता है प्रकृतमें
स्वशक्य संयोगरूप 'गंगा' पदका तीरसे परम्परासम्बन्ध है; इसलिये 'गंगा'
पद लाक्षणिक है. ऐसे स्थलमें लक्षणावृत्तिहीसे तीरका बोध होता है.
सा च शक्यसम्बन्धरूपाः। तथाहि। प्रवाहरूपशक्यार्थसम्बन्धस्य
तीरे गृहीतत्वात्तीरस्य स्मरणं, ततः शाब्दबोधः । परंतु यद्य-
न्वयानुपपत्तिर्लक्षणाबीजं स्यात्तदा यष्टीः प्रवेशयेत्यत्र लक्षणा न
स्यात्, यष्टिषु प्रवेशान्वयस्यानुपपत्तेरभावात् , तत्र च यष्टिप्र-
वेशे भोजनतात्पर्यानुपपत्त्या यष्टिधरेषु लक्षणा ।
भाषा-वह लक्षणा शक्यका सम्बन्धरूप होती है. (तथाहि) वह ऐसे है कि-
प्रवाहरूप जो शक्यार्थ उसका संयोगसम्बन्ध तीरके साथ गृहीतही एव है. 'गंगा'
पदसे गंगातीरका स्मरण हुआ. तदनन्तर 'गंगातीरे घोषः' यह शाब्दबोध हुआ
परन्तु हरएक स्थलमें यदि अन्वयानुपपत्तिही लक्षणाका बीज मान लिया जाय
तो 'यष्टीः प्रवेशय' इत्यादि स्थलमें लक्षणा नहीं होनी चाहिये; क्योंकि (यष्टि)
लाठियोंमें प्रवेशरूप अन्वयकी अनुपपत्ति नहीं है अर्थात् केवल लाठियोंका प्रवेशभी
गृहमें बनसकता है परन्तु कहनेवालेने भोजनके तात्पर्य्यसे यष्टियोंके प्रवेशकी आज्ञा
करी है. एवं केवल लाठियोंके प्रवेशसे भोजनरूप तात्पर्य्यकी अनुपपत्ति होनेसे

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९३
‘ यष्टि ’ पदकी यष्टिधरमें लक्षणा करनी चाहिये अर्थात् वक्ता अपने भृत्यविशेषको
यह कहता है कि, लाठीवाले साधुओंको भोजन जिमानेके लिये गृहके भीतर
लेजाओ इत्यादि. औरभी अनेक उदाहरणस्थल जहत्स्वार्थाके होसकतेहैं.
एवं काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यादौ काकपदस्य दध्युपघातके
लक्षणा सर्वतो दधिरक्षायास्तात्पर्यविषयत्वात् । एवं छत्रिणो
यान्तीत्यादौ छत्रिपदस्यैकसार्थवाहित्वे लक्षणा । इयमेवाजह-
त्स्वार्था लक्षणेत्युच्यते, एकसार्थवाहित्वेन रूपेण छत्रित-
दन्ययोर्बोधात् ।
भाषा-एवं “ काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्, छत्रिणो यान्ति ” इत्यादि स्थलोंमें
‘ अजहत्स्वार्था लक्षणा ’ है. यहां ‘ काक ’ पदकी दधिके विघातक बिडालादि
जीवमात्रमें लक्षणा है; क्योंकि यहां वक्ताका भृत्यादिके प्रति कहनेका तात्पर्य यह
है कि-“ दधि रखना; काक या और कोई जीव दधिको भक्षण न करजावे ” इति ।
एवं ‘ छत्रिणो यान्ति ’ इस स्थलमेंभी ‘ छत्रि ’ पदकी एकसार्थवाहित्व विशिष्टमें
अर्थात् एकसाथ चलनेवाले पुरुषमात्रमें लक्षणा है; क्योंकि यहांभी छातेवाले पुरुषका
तथा उनके साथियोंका एकसार्थवाहित्वेन रूपेण बोध होताहै.
यदि चान्वयानुपपत्तिर्लक्षणाबीजं स्यात्तदा कचिद्गङ्गापदस्य
तीरे कचिद्घोषपदस्य मत्स्यादौ लक्षणेति नियमो न
स्यात् ।
भाषा-लक्षणास्थलमें यह नियम है कि-जिस स्थलमें जो पद वक्ताने जिस
अर्थबोधनके तात्पर्यसे उच्चारण किया है, वह पद उसी अर्थमें अवश्य लाक्षणिक
होता है, परन्तु यदि अन्वयानुपपत्ति लक्षणाका बीज मान लिया जाय तो कहीं
‘ गंगा ’ पदकी तीरमें और कहीं ‘ घोष ’ पदकी मत्स्यादि जलजीवोंमें लक्षणा नहीं
होनी चाहिये; क्योंकि ‘ गंगा ’ पदका तीरमें तात्पर्यग्रह स्थलमें एवं घोषपदका
मत्स्यादिमें तात्पर्यग्रह स्थलमें घोषकी तीरमें तथा मत्स्यादिकोंकी प्रवाहमें अन्व-
यानुपपत्ति नहीं है.
इदं तु बोध्यम् । शक्यार्थसम्बन्धो यदि तीरत्वेन रूपेण गृहीत-
स्तदा तीरत्वेन तीरबोधः, यदि तु गङ्गातीरत्वेन रूपेण गृही-
तस्तदा तेनैव रूपेण स्मरणम् ।
१६

१९४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ श० -
भाषा-( इदन्तु बोध्यम् ) यहभी यहां जानने योग्य है कि-शक्यार्थ प्रवाहका
सम्बन्ध यदि तीरत्वेन रूपेण तीरके साथ ग्रहण हुआ है तो शाब्दबोधभी तीरत्वेन
रूपेण तीरहीका होगा और यदि गंगातीरत्वेन रूपेण तीरका सम्बन्ध गृहीत हुआहै
तो शाब्दबोधभी गंगातीरत्वेन रूपेणही होगा.
अत एव लक्ष्यतावच्छेदके न लक्षणा, तत्प्रकारकबोधस्य तत्र
लक्षणां विनाऽप्युपपत्तेः । परं त्वेवं क्रमेण शक्यतावच्छेदकेऽपि
शक्तिर्न स्यात्, तत्प्रकारक शक्यार्थस्मरणं प्रति तत्पदस्य साम-
र्थ्यमित्यस्य सुवचत्वादिति विभावनीयम् ।
भाषा-( अतएव ) तद्धर्मविशिष्टमें लक्षणा ग्रहणको तिसी रूपसे पदार्थउप-
स्थिति तथा शाब्दबोधके प्रति हेतुता होनेहीसे लक्षतावच्छेदकतीरत्वादि धर्मोंमेंभी
लक्षणा माननेका कुछ काम नहीं; क्योंकि तीरत्वादि धर्मप्रकारक तीरविशेष्यक बोध
लक्षणासे विनाभी ऐसे स्थलमें उत्पन्न होसकताहै; परन्तु इसी क्रमसे शक्यतावच्छे-
दकमेंभी शक्ति नहीं माननी चाहिये; क्योंकि लक्षणास्थलकी तरह यहांभी “ तत्
घटत्वादिप्रकारक शब्दार्थ घटादिस्मरणके प्रति ( तत् ) घटादिपदका सामर्थ्य है ”
इत्याकारक नियम सुवच होसकताहै, परन्तु आचार्य्यलोगोंने लक्षतावच्छेदकमें
लक्षणाको नहीं माना और शक्यतावच्छेदकमें शक्तिको मानाहै इसका क्या कारण
है ? ( इति विभावनीयम् ) यह वार्ता विद्वान् लोगोंको विचारणीय है. जहत्स्वार्थल
क्षणाहीका भेद एक लक्षितलक्षणानामसे प्रसिद्ध है.
यत्र तु शक्यार्थस्य परम्परासम्बन्धरूपा लक्षणा सा लक्षितलक्ष-
णेत्युच्यते । यथा द्विरेफादिपदे रेफद्वयसम्बन्धो भ्रमरपदे ज्ञायते
भ्रमरपदस्य च सम्बन्धो भ्रमरे ज्ञायते तत्र लक्षितलक्षणा ।
भाषा-जिस स्थलमें शक्यार्थका परंपरासम्बन्धरूपा लक्षणा है वह लक्षितल-
क्षणा कही जातीहै. जैसे “ द्विरेफो रौति ” इस स्थलमें द्विरेफादि पदमें रेफद्वयका
सम्बन्ध ‘ भ्रमर ’ इस पदमें जाना जाताहै और ‘ भ्रमर ’ पदका सम्बन्ध ( भ्रमर )
मधुपजन्तुमें जाना जाताहै; ऐसे स्थलमें लक्षितलक्षणा होतीहै. “ द्विरेफो रौति ”
इत्यादि स्थलमें ‘ स्ववाच्यरेफद्वयघटितपदवाच्यत्व ’ आदिरूप परम्परासम्बन्ध है.
किंतु लाक्षणिकं पदं नानुभावकं लाक्षणिकार्थस्य शाब्दबोधे
तु पदान्तरं कारणम्, शक्तिलक्षणान्यतरसम्बन्धेनेतरपदार्थान्वि-

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९५
तस्स्वशक्यार्थशाब्दबोधं प्रति पदानां सामर्थ्यावधारणात् । वाक्ये
तु शक्तेरभावाच्छक्यसम्बन्धरूपा लक्षणाऽपि नास्ति ।
भाषा-( किन्तु ) परन्तु ‘ लाक्षणिक ’ पद ( अनुभावक ) शाब्दबोधका जनक
नहीं है किन्तु लाक्षणिकार्थके शाब्दबोधमें ( पदान्तर ) घोषादि पदान्तर कारण हैं;
क्योंकि शक्तिसम्बन्धसे या लक्षणासम्बन्धसे उपस्थित जो ( इतरपदार्थ ) तीरादि
उस तीरादिके साथ अन्वित जो ( स्व ) घोषादिपद शक्यार्थ गोपालग्राम तादृश
तीराद्यन्वित गोपालग्रामविषयक शाब्दबोधके प्रति ( पदानां ) घोषादि पदोंका
सामर्थ्य निश्चय होताहै; शक्तपदही होताहै; वाक्य नहीं होता. इसलिये वाक्यमें
शक्तिका अभाव होनेसे शक्यसम्बन्धरूपा लक्षणाभी वाक्यमें नहीं है.
यत्र गंभीरायां नद्यां घोष इत्युक्तं तत्र नदीपदस्य नदीतीरे लक्ष-
णा , गंभीरापदार्थस्य नद्या सहाभेदेनान्वयः क्वचिदेकदेशान्व-
यस्यापि स्वीकृतत्वात् ।
शंका-“ गम्भीरायां नद्यां घोषः ” इत्यादि वाक्यस्थलमें ‘ नदी ’ पदकी
नदीतीरमें लक्षणा माननेसे गम्भीरपदार्थका नदीरूप पदार्थके एकदेशके साथ
अन्वय मानना होगा अर्थात् नदीपदबोध्य जो ‘ नदीतीर ’ उसका एकदेश जो नदी
उसके साथ'गम्भीर'पदका अन्वय मानना होगा, परन्तु ऐसा माननेसे“पदार्थः पदार्थेना-
न्वेति न तु पदार्थैकदेशेन ” इस नियमके साथ विरोध होताहै और “ नीलो घटः ”
इत्यादि स्थलोंमें नीलपदार्थका घटपदार्थ एकदेश घटत्वादिमें अन्वय बोधवारणार्थ इस
नियमका माननाभी आवश्यक है; इसलिये “ गम्भीरायां नद्यां घोषः” इत्यादिस्थलमें
पदलक्षणाका असम्भव होनेसे वाक्यलक्षणाही माननी उचित है. समाधान-
“ गम्भीरायां नद्यां घोषः ” इत्यादि स्थलमें केवल ‘ नदी ’ पदकी नदीतीरमें लक्षणा
है और गम्भीरपदार्थका नदीके साथ अभेदान्वय है अर्थात् गम्भीराभिन्न जो नदी
तादृश नदीतीरमें घोष है; यह बोध हुआ. ( क्वचित् ) “ चैत्रस्य गुरुकुलम् ” इत्यादि
स्थलविशेषोंमें एकदेशअन्वयभी विद्वान् लोगोंके अभिमत है. यहां चैत्रोत्तरवर्त्ति षष्ठ्य-
र्थसम्बन्धका गुरुके साथ अन्वय है.
यदि तत्रैकदेशान्वयो न स्वीक्रियते तदा नदीपदस्य गंभीरनदी-
तीरे लक्षणा गंभीरापदं तात्पर्यग्राहकम् । बहुव्रीहावप्येवम् ।
तत्र हि चित्रगुपदादौ यद्येकदेशान्वयः स्वीक्रियते तदा गोपदस्य

१९६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
गोस्वामिनि लक्षणा गवि चित्राभेदान्वयः । यदि त्वेकदेशान्वयो
न स्वीक्रियते तदा गोपदस्य चित्रगोस्वामिनि लक्षणा चित्रपदं
तात्पर्यग्राहकम् ।
भाषा-परन्तु यदि यहां एकदेशान्वय न स्वीकार होय तो “ गम्भीरायां नद्यां
घोषः” इत्यादि स्थलमें 'नदी' पदकी गम्भीरनदीतीरमें लक्षणा करनी और 'गम्भीर'
पदको “ नदीपदं गम्भीरनदीतीरविषयकबोधजनकं भवतु ” इत्याकारक वक्ताकी
इच्छारूप जो तात्पर्य तादृश तात्पर्यका ग्राहक है. ऐसेही बहुव्रीहिसमासस्थलमेंभी
वाक्यके अवयवहीमें लक्षणा माननी उचित है. “ चित्रा गावो यस्यासौ चित्रगुः ”
इत्यादि बहुव्रीहिस्थलमें यदि एकदेशान्वय स्वीकृत होय तो 'गो'पदकी गैयोंके स्वामीमें
लक्षणा करनी और 'चित्रा'पदार्थका गोपदार्थके साथ अभेदान्वय करना परन्तु यदि
एकदेशान्वय न अभिमत होय तो गोपदकी चित्रगैयोंके स्वामीमें लक्षणा करनी और
‘ चित्र ’ पदको पूर्वोक्त रीतिसे वक्तृतात्पर्यका ग्राहक समझना.
एवमारूढवानरो वृक्ष इत्यत्र वानरपदस्य वानरावेशकर्मणि लक्ष-
णा, आरूढपदं च तात्पर्यग्राहकम् । एवमन्यत्रापि ।
भाषा-ऐसेही “ आरूढो वानरोऽयमसौ आरूढवानरो वृक्षः ” इत्यादि स्थलमें
'वानर' पदकी वानरके आरोहणरूप कर्ममें लक्षणा करनी और पूर्वोक्तरीतिसे 'आरूढ'
पद वक्तृतात्पर्यका ग्राहक समझना यही क्रम और और प्रयोग स्थलोंमेंभी जानलेना.
तत्पुरुषे तु पूर्वपदे लक्षणा । तथाहि । राजपुरुषादिपदे राज-
पदार्थेन पुरुषादिपदार्थस्य साक्षान्नान्वयो निपातातिरिक्तनामार्थ-
योर्भेदेनान्वयबोधस्याव्युत्पन्नत्वात्, अन्यथा राजा पुरुष इत्य-
त्रापि तथाऽन्वयबोधः स्यात् ।
भाषा-एवं तत्पुरुष समासस्थलमें पूर्वपदमें लक्षणा होतीहै अर्थात् पूर्वपद लाक्षणिक
होताहै. (तथाहि) जैसे “ राज्ञः पुरुषः राजपुरुषः ” इत्यादि षष्ठीतत्पुरुष समासस्थलमें
राजपदार्थके साथ पुरुषपदार्थका साक्षात् सम्बन्धसे अन्वय नहीं है;क्योंकि अव्ययनि-
पातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंका भेद सम्बन्धसे अन्वय बोध (अव्युत्पन्न) असिद्ध है;
( अन्यथा ) यदि अव्ययनिपातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंकाभी भेद सम्बन्धसे अन्वय-
बोध मानलिया जाय तो “ राजा पुरुषः ” इत्यादि स्थलोंमेंभी भेदसम्बन्धसे अन्व-
यबोध होना चाहिये.

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९७
पटो न घट इत्यादौ घटपटाभ्यां नञः साक्षादेवान्वयान्निपाता-
तिरिक्तेति नीलो घट इत्यादौ नामार्थयोरभेदसम्बन्धेनान्वया-
द्भेदेनेति ।
भाषा-“घटो न पटः” इत्यादि स्थलमें घटपटके साथ नञ् अर्थभेदका साक्षात् ही
अन्वय होताहै अर्थात् किसीप्रत्ययार्थके द्वारा नहीं होता; इसलिये नियममें निपाता-
तिरिक्त कहा. नञ् निपात है, इसीसे इसके योगसे भेदेन अन्वयबोध होसकताहै. परन्तु
निपातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंका भेदसम्बन्धसे अन्वयबोध नहीं होसकता “नीलो
घटः ” इत्यादि स्थलोंमें नामार्थनामार्थोंका अभेदसम्बन्धसे अन्वय होताहै; इसलिये
नियममें भेदेन कहा अर्थात् निपातातिरिक्त नामार्थनामार्थका अभेदेन अन्वयबोध तो
सिद्धही है परन्तु भेदसम्बन्धसे अन्वयबोध अव्युत्पन्न है “एवं राजपुरुषः” इत्यादि-
स्थलमेंभी निपातातिरिक्त नामार्थोंकी उपस्थिति होती है. यहांभी भेदेन अन्वयबोध
नहीं होसकेगा और अभेदेन विवक्षित नहींहै इसलिये कोई उपायान्तर सोचना चाहिये.
न च राजपुरुष इत्यादौ लुप्तविभक्तेः स्मरणं कल्प्यमिति वाच्य-
म् । अस्मृतविभक्तेरपि ततो बोधोदयात् । तस्माद्राजपदादौ
राजसम्बन्धिनि लक्षणा, तस्य च पुरुषेण सहाभेदान्वयः ।
द्वन्द्वे तु धवखदिरौ छिन्धीत्यादौ धवः खदिरश्च विभक्त्यर्थद्वि-
त्वप्रकारेण बुध्यते तत्र न लक्षणा ।
शंका-“राजपुरुषः” इत्यादिस्थलमें राजपदोत्तरवर्त्ति लुप्त हुई षष्ठीविभक्तिके
स्मरणकी कल्पना कर उस विभक्तिके सम्बन्धादि अर्थद्वाराही राजाका तथा पुरुषका
परस्पर अन्वय होगा इसलिये पूर्वोक्त नियमके साथ विरोध नहींहै. समाधान-जिस
पुरुषको विभक्तिका स्मरण नहींभी होता अर्थात् प्रकृतिप्रत्ययानभिज्ञ पुरुषकोभी
(ततो) “राजपुरुषः” इत्यादि वाक्यसे शाब्दबोधका उदय होना अनुभवसिद्ध है.
(तस्मात्) इसलिये‘राजपुरुषः’ इत्यादिस्थलोंमें राजादि पदोंकी राजसम्बन्धिमें लक्षणा
मानके उस सम्बन्धीका पुरुषके साथ अभेदान्वय बोध माननाही उचित है.
“एवं राजसम्बन्ध्यभिन्नः पुरुषः” इत्याकारक शाब्दबोध होगा. एवं “धवखदि-
रौ च्छिन्धि” इत्यादि इतरेतरद्वन्द्वस्थलमें द्वितीयाविभक्तिके द्विवचनार्थ द्वित्वप्रकारसे
धव तथा खदिर दोनोंका बोध होताहै इसलिये वहां लक्षणा माननेकी अवश्य-
कता नहीं है.

१९८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
न च साहित्ये लक्षणीति वाच्यम् । साहित्यशून्ययोरपि द्वन्द्वद-
र्शनात् ।
मीमांसक-धव खदिर उभयमें रहनेवाला जो सहवृत्तित्वरूप साहित्य उस
साहित्यके आश्रयमें यदि 'खदिर' पदकी लक्षणा मान लीजाय तो हानि क्या है?
समाधान-सहवृत्तित्वरूप साहित्यसे शून्य हिम विन्ध्यादिपदार्थोंकाभी " हिम
विन्ध्यौ " इत्याकारक ऐतरेतरयोगरूप द्वन्द्व देखा जाताहै इसलिये द्वन्द्वस्थलमें
उत्तरपदकी साहित्याश्रयमें लक्षणा माननी उचित नहीं है.
न चैकक्रियान्वयित्वरूपं साहित्यमस्तीति वाच्यम्।क्रियाभेदेपि
धवखदिरौ पश्य छिन्धीत्यादिदर्शनात् साहित्यस्याननुभवाच्च ।
तस्मात् साहित्यादिकं नार्थः । अतएव राजपुरोहितौ सायुज्य-
कामौ यजेयातामित्यत्र लक्षणाभावाद्द्वन्द्व आश्रीयते तस्मात्सा-
हित्यंनार्थः । किंतु वास्तवो भेदो यत्र तत्र द्वन्द्वः ।
शंका-हम सहवृत्तित्वरूप साहित्यके तात्पर्यसे यहां लक्षणा नहीं कहते किन्तु
एकक्रियान्वयित्वरूप साहित्यके तात्पर्यसे कहतेहैं. एवं छेदनरूपा जो एकक्रिया
तादृश एकक्रियान्वयित्व धव तथा खदिर उभयमें विद्यमान है. इस रीतिसे एक
क्रियान्वयित्वरूप साहित्यके आश्रयमें 'खदिर' पदकी लक्षणा मान लीजाय तो क्या
हानि है? समाधान-" धवखदिरौ छिन्धि पश्य" इत्यादि प्रयोगस्थलमें क्रियाके
भेद होनेसेभी द्वन्द्व देखाजाताहै.भाव यह कि-एक क्रियान्वयित्वरूप साहित्य यदि
नियमसे इतरेतरयोगद्वन्द्वस्थलमें रहे तो उसके आश्रयमें 'खदिर' पदकी लक्षणाभी
मान लीजाय; परन्तु उसका तो "धवखदिरौ छिन्धि पश्य" इत्यादि क्रियान्वयस्थलमें
व्यभिचार प्रतीत होताहै. इसलिये साहित्यमें लक्षणा माननी उचित नहीं और
वास्तवमें एकक्रियान्वयित्वरूप साहित्यका " धवखदिरौ छिन्धि " इत्यादिवाक्यके
शाब्दबोधमें अनुभवभी नहीं होता. ( अतएव ) द्वन्द्वस्थलमें लक्षणाके अभाव होने-
सेही " राजपुरोहितौ सायुज्यकामौ यजेयाताम्-अर्थात् सायुज्यमुक्तिकी कामनावाले
राजा तथा पुरोहित दोनों यजन करें " इत्यादि वाक्यस्थलमें लक्षणाके अभावसे
द्वन्द्वका आश्रयण पूर्व आचार्यलोगोंने कियाहै. ( तस्मात् ) इसलिये साहित्य किसी
पदका अर्थ नहींहै किन्तु पदार्थद्वयका जहां वास्तवभेद होताहै वहां द्वन्द्वसमास
होताहै.

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २९९
न च नीलघटयोरभेद इत्यादौ कथमिति वाच्यम् । तत्र नीलप-
दस्य नीलत्वे घटपदस्य घटत्वे लक्षणा, अभेद इत्यस्य चाश्रया-
भेद इत्यर्थात् । समाहारद्वन्द्वे तु यदि समाहारोऽप्यनुभूयत इ-
त्युच्यते तदाऽहिनकुलमित्यादौ परपदेऽहिनकुलसमाहारे लक्ष-
णा पूर्वपदं तात्पर्यग्राहकम् ।
शंका-“नीलो घटः-इत्यत्र नीलघटयोरभेदः” इत्यादिवाक्यस्थलमें “नील-
घटयोः” यह द्वन्द्व कैसे हुआ? अर्थात् यह वाक्य असंगतभी नहीं और समासभी
“नीलश्च घटश्च नीलघटौ, तयोः नीलघटयोः ‘नीलो घटः’ इत्यत्राभेदः” यही
मानना होगा, फिर वास्तवसे पदार्थद्वयभेदस्थलमें द्वन्द्व होताहै यह नियम आपका
कहां रहा? समाधान-ऐसे स्थलमें ‘नील’ पदकी नीलत्वमें तथा ‘घट’ पदकी घटत्वमें
लक्षणा मानकर द्वन्द्व हुआ है और ‘अभेद’ यह शब्द आश्रयाभेदका बोधक है
अर्थात् ‘नीलत्वघटत्वाश्रययोरभेदः” यह वाक्यार्थ हुआ. एवं समाहारद्वन्द्व स्थलमें
यदि किसी विद्वान्को (समाहार) समुच्चयका अनुभवभी होता होय तो “अहिन-
कुलम्’ इत्यादि वाक्योंमें (पर) नकुलादिपदोंकी अहिनकुलसमाहारमें लक्षणा
माननी और (पूर्व) अहिआदि पदको पूर्वोक्त रीतिसे तात्पर्यका ग्राहक जानना
उचित है.
न च भेरीमृदंगं वादयेत्यत्र कथं समाहारस्यान्वयः, अपेक्षाबुद्धि-
विशेषरूपस्य तस्य वादनासम्भवादिति वाच्यम् । परम्परास-
म्बन्धेन तदन्वयात् ।
शंका-“भेरीमृदङ्गं वादय” इत्यादि स्थलमें समाहारका वादन क्रियामें
अन्वय कैसे होगा? क्योंकि अनेक पदार्थोंमें एकत्वावगाहन करनेवाली अपेक्षा बुद्धिही
विशेषरूप समाहारका वादन नहीं बनसकता. भाव यह कि-अभिघाताख्य संयोगा-
वच्छिन्नक्रिया वादनपदार्थ है. सो उसका अपेक्षाबुद्धिविशेषरूप समाहारमें होनाही
असम्भव है. समाधान-ऐसे स्थलमें ‘स्वाश्रयवृत्तित्व’ रूप परम्परासम्बन्ध
मानके वादनक्रियाका समाहारमें अन्वय है. यहां ‘स्व’ शब्दसे अपेक्षाबुद्धिविशे-
षरूप समाहार, उसका आश्रयविषयतासम्बन्धसे भेरीमृदङ्गादि तद्वृत्तित्व वादन-
रूपा क्रियाको इति एतादृशपरम्परासम्बन्धसे अन्वय होसकताहै.
एवं पञ्चमूलीत्यादावपि । परे त्वहिनकुलमित्यादावहिश्च नकुलश्च
बुध्यते प्रत्येकमेकत्वान्वयः, समाहारसंज्ञा च यत्रैकत्वं नपुं-

२०० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
सकत्वं च प्राणितूर्येत्यादिसूत्रेणोक्तं तत्रैव, अन्यत्रैकवचनमसाध्वि-
ति इत्याहुः ।
भाषा-एवं “ पञ्चमूली ” इत्यादि द्विगुअर्थसमाहारस्थलमेंभी उत्तरपदकी
समाहारमें लक्षणा तथा पूर्वपदको तात्पर्य ग्राहकत्व मानना उचित है और ( परेतु )
नवीन नैयायिक तो यह मानतेहैं कि-“अहिनकुलम् ” इत्यादि स्थलमें अहि तथा
नकुल दोनोंका बोध होता है किन्तु समाहारका बोध नहीं होता और एकवचन
बोधित एकत्वसंख्याका अहि तथा नकुल प्रत्येकके साथ अन्वय है; इसलिये
‘ अहिनकुलं ’ इत्यादि लक्ष समाहारद्वन्द्वका नहीं है; किन्तु समाहारसंज्ञा वहां होती
है, जहां एकवचनान्तता तथा नपुंसकता “ द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् २ । ४।२।
इत्यादि सूत्रसे बोधित होय. एवं समाहारके उदाहरण “ पाणिपादम् ” इत्यादि
जानने चाहिये. एवं ( अन्यत्र ) समाहारातिरिक्त द्वन्द्वस्थलमें यदि एकवचन होय
तो असाधु जानना चाहिये ( इत्याहुः ) यह सब नवीनोंका कथन है.
पितरौ श्वशुरावित्यादौ पितृपदे जनकदम्पत्योः श्वशुरपदे स्त्री-
जनकदम्पत्योर्लक्षणा । एवमन्यत्रापि । घटा इत्यादौ तु न लक्ष-
णा, घटत्वेन रूपेण नानाघटोपस्थितिसम्भवात् ।
भाषा-एवं “ पितरौ, श्वशुरौ ” इत्यादि एकशेष समासस्थलमें ‘ पितृ ’ पदकी
पुरुषके जनक माता पिता दोनोंमें लक्षणा तथा ‘ श्वशुर ’ पदकी स्त्रीके जनक
माता पिता दोनोंमें लक्षणा है. ऐसेही और स्थलोंमेंभी जानलेना ‘ घटाः ’ इत्यादि
प्रयोगस्थलमें लक्षणया नानाघटकी उपस्थिति नहीं है किन्तु ‘घट’ पदं उच्चारणसे
घटत्वेन रूपेणही नानाघट उपस्थितिका सम्भव होसकता है.
कर्मधारयस्थले तु नीलोत्पलमित्यादावभेदसम्बन्धेन नीलपदार्थ
उत्पलपदार्थे प्रकारः तत्र च न लक्षणा, अत एव निषादस्थपतिं
याजयेदित्यत्र न तत्पुरुषो लक्षणापत्तेः किंतु कर्मधारयो लक्ष-
णाभावात् ।
भाषा-एवं “ नीलोत्पलं ” इत्यादि कर्मधारयसमासस्थलमें नीलपदार्थ उत्प-
लपदार्थमें अभेदसम्बन्धसे प्रकार है. इसलिये यहांभी लक्षणा नहीं है. ( अतएव )
कर्मधारयस्थलमें लक्षणा नहीं है. इसलिये “ निषादस्थपतिं याजयेत ” इत्यादि
श्रुतिवाक्यस्थलमें निषादानां स्थपतिः निषादस्थपतिः ” इत्याकारक तत्पुरुषसमास
का आश्रयण विद्वान् लोगोंने नहीं किया है. क्योंकि तत्पुरुष माननेसे पूर्वोक्त

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०१
रीतिसे तत्पुरुषस्थलमें लक्षणाभी माननी पड़ेगी और लक्षणा जघन्यवृत्ति है. यदि
प्रकारान्तरसे शक्तिवृत्तिसे निर्वाह होय सके तो लक्षणा माननी उचित नहीं. एवं
“ निषादश्चासौ स्थपतिश्चेति निषादस्थपतिः ” इत्याकारक कर्मधारयसमासही
मानना उचित है; क्योंकि लक्षणा नहीं माननी पड़ती.
न च निषादस्य सङ्करजातिविशेषस्य वेदानधिकाराद्याजनासं-
भव इति वाच्यम्, निषादस्य विद्याप्रयुक्तेस्तत एव कल्पनात् ।
शंका-‘स्थपति’ शब्द स्वामीका वाचक है. एवं इस वाक्यमें कर्मधारयसमास
माननेसे निषादरूप स्थपतिकाही बोध होगा; परन्तु उसका प्रकृतमें उपयोग नहीं
क्योंकि निषादनामक संकरजातिविशेषको “ स्त्रीशूद्रौ नाधीयाताम् ” इस वचनसे
वेदपठनका अधिकार नहीं और अध्ययनविधि सिद्धज्ञानके न होनेसे उसको
याजनभी नहीं बन सकता. इसलिये तत्पुरुषसमासद्वाराही निषादोंके स्वामी किसी
ब्राह्मण या क्षत्रियका ग्रहण करना उचित है. एवं उसको याजनका सम्भव होनेसे
वाक्य सार्थक होसकता है. समाधान–निषादको याजनके लिये यथासम्भव
वेदविद्याप्रयुक्तभी होना चाहिये. इस वार्त्ताकी कल्पनाभी हम ( तत एव ) निषादके
प्रति श्रुतिबोधित याजनानुपपत्तिसेही करसकतेहैं.
लाघवेन मुख्यार्थस्यान्वये तदनुपपत्त्या कल्पनायाः फलमुख-
गौरवत्याऽदोषत्वादिति ।
शंका–निषादको वेदविद्याकी कल्पना करनेमें आपको गौरव होगा.समाधान–
कर्मधारयसमासद्वारा प्रथम मुख्यार्थके साथ अन्वय होनेके पीछे उस अन्वयकी
अनुपपत्तिसें निषादको विद्याकी कल्पना करनी फलमुखगौरव है; इसलिये वह दोष
कर नहीं है.
उपकुम्भमर्द्धपिप्पलीत्यादौ परपदे तत्सम्बन्धिनि लक्षणा पूर्वपदा-
र्थप्रधानतया चान्वयबोध इति । इत्थं च समासे न क्वापि शक्तिः
पदशक्त्यैव निर्वाहादिति ।
भाषा–एवं “ उपकुम्भम्, अर्द्धपिप्पली ” इत्यादि प्रयोगस्थलोंमें कुम्भ-
पिप्पली आदि परपदोंकी कुम्भपिप्पली आदिके सम्बन्धिमें लक्षणा माननी. एवं
“ कुम्भसम्बन्ध्यभिन्नं समीपं ” तथा “ पिप्पलीसम्बन्ध्यभिन्नमर्द्धं ” इत्याकारक
पूर्वपदार्थप्रधान शाब्दबोध ऐसे स्थलोंमें हो सकतेहैं. ( इत्थञ्च ) इस पूर्वोक्त रीतिसे
वैयाकरणोंके अभिमतसमासमें शक्ति कहींभी नहीं बन सकती; क्योंकि हरएकस्थल-
में समासघटकीभूत पदशक्तिलक्षणाहीसे निर्वाह होसकता है–इति ।
१७

२०२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
आसत्तियोग्यताकांक्षा तात्पर्यज्ञानमिष्यते ॥८२ ॥
कारणं -
भाषा-आसत्ति, योग्यता, आकांक्षा और तात्पर्यज्ञान ये चार शाब्दबोधमें
कारण हैं ॥ ८२ ॥
आसत्तिरित्यादि । आसत्तिज्ञानं योग्यताज्ञानमाकांक्षाज्ञानं
तात्पर्यज्ञानं च शाब्दबोधे कारणम् ॥
भाषा-अर्थात् आसत्तिका ज्ञान योग्यताका ज्ञान आकांक्षाका ज्ञान और वक्ताके
तात्पर्यका ज्ञान ये चार ज्ञान शब्दमात्रके शाब्दबोधमें कारण हैं.
तत्रासत्तिपदार्थमाह, सन्निधानं त्विति-
भाषा-उनमें ' सन्निधानन्तु ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आसत्तिपदार्थको
कहते हैं.
-सन्निधानं तु पदस्यासत्तिरुच्यते ।
भाषा-पदोंकी परस्पर ( सन्निधि ) समीपताका नाम 'आसत्तिः' है.
यत्पदार्थस्य यत्पदार्थेनान्वयोऽपेक्षितस्तयोरव्यवधानेनोपस्थि-
तिः कारणम् । तेन 'गिरिर्भुक्तमग्निमान् देवदत्तेन' इत्यादौ न
शाब्दबोधः ।
भाषा-जिस पदार्थका जिस पदार्थके साथ अन्वय अपेक्षित होय उन दोनोंकी
पदोंद्वारा (अव्यवधानेन) अव्यवहितरूपसे उपस्थापितिभी शाब्दबोधमें कारण है. इसलिये
“गिरिर्भुक्तं अग्निमान् देवदत्तेन” इत्यादि वाक्योंसे शाब्दबोध नहीं होताहै; क्योंकि
यहां गिरिपदार्थ तथा भुक्तपदार्थका परस्पर अन्वयबोध वक्ताके तात्पर्यका विषय नहीं
है.किन्तु गिरिपदार्थ तथा अग्निमान् पदार्थका परस्पर अन्वयबोध वक्ताके तात्पर्यका
विषय है परन्तु वे दोनों परस्पर अव्यवहित नहीं हैं .एवं ऐसे स्थलमें आसत्तिके न
होनेसे शाब्दबोधभी नहींहोता.
'नीलो घटो द्रव्यं पटः' इत्यादावासत्तिभ्रमाच्छाब्दबोधः । आस-
त्तिभ्रमाच्छाब्दभ्रमाभावेऽपि न क्षतिः।
भाषा-एवं जहां “नीलो घटो द्रव्यं पटः” इत्यादि वाक्यस्थलमें नीलपदार्थ
तथा पटपदार्थके परस्पर अन्वयबोधमें वक्ताका तात्पर्य है;वहां 'नील'पदकी तथा 'घट'
पदकीभी परस्पर आसत्ति नहींहै.भाव यह कि-वक्ताके तात्पर्यविशिष्ट पदोंकी परस्पर

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०३
सन्निधिका नाम 'आसत्ति' है. प्रकृतमें वक्ताका तात्पर्य तो 'नील' पदार्थका 'पट' पदार्थके
साथ अन्वयबोधका है और पदोंका परस्पर सन्निधान 'नील' पदका 'घट' पदके साथ
है;वह सन्निधान वक्तृतातपर्यशून्य होनेसे आसत्ति नहीं कहासकता, परंतु ऐसे स्थलमें
‘ नीलाभिन्नो घटः ” इत्यादि शाब्दबोध श्रोताको होताहै, वह केवल आसत्तिके
भ्रमसे समझना चाहिये. आसत्तिके भ्रमसे शाब्दबोधमें भ्रम नाभी होय तो हानि नहींहैः
ननु यत्र 'छत्री कुण्डली वासस्वी देवदत्तः' इत्युक्तं तत्रोत्तरपद-
स्मरणेन पूर्वपदस्मरणस्य नाशादव्यवधानेन तत्तत्पदस्मरणास-
म्भव इति चेत् । न। प्रत्येकपदानुभवजन्यसंस्कारैश्चरमस्य ता-
वत्पदविषयकस्मरणस्याव्यवधानेनोत्पत्तेः ।
शंका—आपने अव्यवधानसे पदोंकी उपस्थिति शाब्दबोधमें कारण कही;परन्तु
जहां “छत्री कुण्डली वासस्वी देवदत्तः ” इत्याकारक अनेकपदघटित वाक्य
वक्ताने कहाहै वहां ( २७ वी कारिका ) की व्याख्यामें प्रोक्त आपके “ योग्य
विभुविशेषगुणानां स्वोत्तरवर्त्तिगुणनाश्यत्वात् ” इस सिद्धान्तानुसार उत्तरपदके स्मर-
णसे पूर्वपदके स्मरणका नाश होनेसे अव्यवधानरूपसे उत्तरपदके स्मरणका असम्भव-
है. समाधान—हरएक पदके अनुभवसे उत्पन्न हुए संस्कारोंसे अन्तमें होनेवाले पद-
विषयक स्मरणका अव्यवधानसे होना सम्भव है.
नानासन्निकर्षैरेकप्रत्यक्षस्येव नानासंस्कारैरेकस्मरणोत्पत्तेरपि
सम्भवात् । तावत्पदसंस्कारसहितचरमवर्णज्ञानस्योद्बोधकत्वा-
त् । कथमन््यथा नानावर्णैरेकपदस्मरणम् ।
भाषा—जैसे एकही कालमें घटचक्षुःसंयोग तथा पटचक्षुःसंयोगरूप नाना
सन्निकर्षोंसे “ इमौ घटपटौ ” इत्याकारक एकही प्रत्यक्ष होता है; वैसेही नाना
संस्कारोंसे एक स्मरणकी उत्पत्तिभी होसकती है; इसमें कोई बाधक नहीं है. पूर्व-
पदोंके संस्कारसहित जो अन्तिम वर्णका ज्ञान वही उस स्मरणमें उद्बोधक है. यदि
नानासंस्कारोंको एक स्मरणजनकता न मानी जाय तो ( कथमन््यथा ) नानावर्णोंके
प्रत्येक संस्कारोंसे नानावर्णगोचर एकपदका स्मरणभी कैसे होगा? अर्थात् नहीं होना
चाहिये. एवं ऐसे माननेसे सर्वत्र शाब्दबोधकी अनुपपत्ति होगी; इसलिये हरएक
स्थलमें पदजन्य पदार्थोंपस्थिति समूहालम्बनात्मकही शाब्दबोधमात्रमें कारण
माननी उचित है.
परंतु तावत्पदार्थानां स्मरणादेकदैव खले कपोतन्यायात् तावत्प-

२०४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
दार्थानां क्रियाकर्मभावेनान्वयबोधरूपः शाब्दबोधो भवतीति
केचित् । “वृद्धा युवानः शिशवः कपोताः खले यथाऽमी युगपत्
पतन्ति ॥ तथैव सर्वे युगपत् पदार्थाः परस्परेणान्वयिनो
भवन्ति ”।
भाषा-(परन्तु) यहां कई एक प्राचीन लोग ऐसे मानते हैं कि-उन उन पदजन्य
पदार्थोंके स्मरणसे एककालावच्छेदेन ही ‘ खले कपोतन्यायं’ से उन उन पदार्थोंका
क्रियाकर्मभावसे अन्वयरूप शाब्दबोध होजाता है अर्थात् जैसे वृद्ध युवा तथा बाल
अवस्थाके ( कपोत ) कबूतर ( खले ) सबीज केदारमें सभी एकही कालमें ऊपरसे
उड़ते २ गिरते हैं, वैसेही सभी पदार्थ एकही कालमें उपस्थित हुए परस्पर अन्वयको
प्राप्त होते हैं-इति ।
अपरे तु “ यद्यदाकांक्षितं योग्यं सन्निधानं प्रपद्यते । तेन
तेनान्वितः स्वार्थः पदैरेवावगम्यते” । तथा च खण्डवाक्यार्थ-
बोधानन्तरं तथैव पदार्थस्मृत्या महावाक्यार्थबोध इत्यप्याहुः ।
एतेन तावद्वर्णाभिव्यङ्ग्यः पदस्फोटोऽपि निरस्तः । तत्तद्व-
र्णसंस्कारसहितचरमवर्णोपलम्भेन तद्व्यञ्जकेनैवोत्पत्तेरिति ।
भाषा-(अपरेतु ) दूसरे कई एक आचार्य ऐसा कहते हैं कि-जो जो पद
परस्पर आकांक्षा योग्यता तथा सन्निधिके युक्त हैं, उन उन पदोंके साथ अन्वित
हुआ पदार्थभी उन पदोंसेही ज्ञात होजाता है. ( तथाच ) एवं खण्डवाक्यार्थबोधके
अनन्तर अर्थात् पदजन्य पदार्थबोधके अनन्तर वैसेही पदार्थस्मरणद्वारा महा-
वाक्यार्थबोध होता है. इस पूर्वोत्तर कथनसे वैयाकरणोंके अभिमत जो
(वर्णाभिव्यङ्ग्य ) वर्णोंसे बोधित पदस्फोट इसकाभी निरास जानलेना चाहिये;
क्योंकि पूर्व पूर्व वर्णोंके संस्कारसहित जो अन्तिम वर्णका उपलाभ, उस उपलाभ
को पदका व्यञ्जक माननेसेभी निर्वाह होसकता है.
इदं तु बोध्यम् । यत्र द्वारमित्युक्तं तत्र पिधेहीति पदस्य ज्ञाना-
देव बोधो न तु पिधानादिरूपार्थज्ञानात्, पदजन्यपदार्थोपस्थिते-
स्तच्छाब्दबोधे हेतुत्वात् । किञ्च क्रियाकर्मपदानां तेन तेनैव
सह साकांक्षत्वात् तेन क्रियापदं विना कथं शाब्दबोधः स्यात् ।

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०५
भाषा-( इदन्तु बोध्यम् ) इतना यहां औरभी विशेष जानना उचित है कि--
जहां वक्ताने ' द्वारं ' इतना मात्र कहा है, वहां ( पिधेहि ) अर्थात् 'बन्द करो'
इत्यादि पदके ज्ञानहीसे शाब्दबोध होता है किन्तु द्वारके ( पिधान ) निरोधनादिरूप
अर्थज्ञानसे शाब्दबोध नहीं होता;क्योंकि 'तत्तत्' पदजन्य 'तत्तत्' पदार्थ उपस्थितिको
तत्तत् शाब्दबोधमें हेतुता निश्चित है. ( किञ्च ) क्रियाकर्मादि पदोंकी उस उस विशेष
रूपहीसे परस्पर आकांक्षा देखनेमें आतीहै किन्तु " द्वारं कर्मत्वं, पिधानं कृतिः "
इत्याकारक विपरीत वाक्य योजनासे द्वारकर्मक पिधानात्मकान्वयबोध नहीं
होसकता एवं प्रकृतमेंभी ' पिधेहि ' इस क्रियापदके बिना केवल 'द्वारं ' इस
पदसे शाब्दबोध होना दुर्घट है.
तथा पुष्पेभ्य इत्यादौ स्पृहयतीति पदाध्याहारं विना चतुर्थ्यनु-
पपत्तेः पदाध्याहार आवश्यकः ।
भाषा-ऐसेही यदि ' स्पृहयति ' इत्यादि क्रियापदका अध्याहार न कियाजाय
तो 'पुष्पेभ्यः ' इत्यादि कर्मपदोंमें चतुर्थीविभक्तिका होनाभी दुर्घट है अर्थात्
'स्पृहेरीप्सितः । १ । ४ । ३६ । " इस अनुशासनसे कर्मत्वार्थक चतुर्थीका 'स्पृह-
यति ' आदिके योगहीसे विधान कियाहै; इसलिये हरएक साकांक्षित स्थलमें पदका
अध्याहार अवश्य करना चाहिये.
योग्यतां निर्वक्ति, पदार्थ इत्यादिना-
भाषा-'पदार्थे' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार योग्यताका निरूपण करताहै-
पदार्थे तत्र तद्वत्ता योग्यता परिकीर्तिता ॥८३॥
भाषा-एक पदार्थमें अपर पदार्थवत्ताका नाम योग्यता कहा है ॥ ८३ ॥
एकपदार्थेऽपरपदार्थसम्बन्धो योग्यतेत्यर्थः। तज्ज्ञानाभावाच्च 'व-
ह्निना सिञ्चति'इत्यादौ न शाब्दबोधः ।
भाषा-अर्थात् एक पदार्थमें अपरपदार्थके सम्बन्धविशेषका नाम योग्यता है.
उस योग्यताका ज्ञान जहां " वह्निना सिञ्चति " इत्यादि वाक्योंमें नहीं होता वहां
शाब्दबोधभी नहीं होता अर्थात् सेचनक्रियाकी जलमें योग्यता है वह्निमें नहीं;
इसलिये यहां शाब्दबोध नहीं होता.
नन्वेतस्या योग्यताया ज्ञानं शाब्दबोधात्प्राक् सर्वत्र न सम्भव-
ति वाक्यार्थस्यापूर्वत्वादिति चेत् । न । तत्तत्पदार्थस्मरणे सति

२०६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली-- [ शब्द-
क्वचित्संशयरूपस्य क्वचिन्निश्चयरूपस्यापि योग्यताया ज्ञानस्य
सम्भवात् ।
शंका-हरएकस्थलमें वाक्यार्थबोध अपूर्वही होता है; परन्तु योग्यताके प्रथम
कारणता माननेमें शाब्दबोधमें वह अपूर्वता नहीं रहती. इसलिये योग्यताज्ञानको
शाब्दबोधके पहले हरएक स्थलमें कारण माननेका कुछ काम नहीं है. समाधान-
हरएकस्थलमें 'तत्तत्'पदजन्य 'तत्तत्' पदार्थके स्मरण होनेसे योग्यताका ज्ञान कहीं
संशयरूपसे और कहीं निश्चयरूपसे शाब्दबोधके पूर्व अवश्य विद्यमान रहता है.
नव्यास्तु योग्यताया ज्ञानं न शाब्दज्ञाने कारणम्, 'वह्निना सिञ्च-
ति' इत्यादौ सेके वह्निकरणकत्वाभावरूपाऽयोग्यता(निश्चयेन
प्रतिबन्धान्न शाब्दबोधः। तदभावनिश्चयस्य लौकिकसन्निकर्षज-
न्यदोषविशेषाजन्यज्ञानमात्रे प्रतिबन्धकत्वाच्छाब्दबोधं प्रत्यपि
प्रतिबन्धकत्वं सिद्धम् । योग्यताज्ञानविलम्बाच्च शाब्दबोध-
विलम्बोऽसिद्ध इति वदन्ति ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
भाषा-और नवीनलोग तो यह कहतेहैं कि- योग्यताका “ ज्ञान शाब्दबोधमें
कारणही नहीं है. “वह्निना सिञ्चति” इत्यादि स्थलमें सेचनक्रियामें वह्निकरण-
त्वाभावरूप अर्थात् सेचनरूपा क्रिया वह्निसे नहीं होसकती इत्याकारक जो अयो-
ग्यताका निश्चय एतादृश निश्चयको विपरीत शाब्दबोधके प्रति प्रतिबन्धकता है;
क्योंकि पूर्वबाधस्थल उक्तरीतिसे अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित तद्धर्मिक
तदभावका निश्चय लौकिकसन्निकर्षाजन्य तथा दोषविशेषाजन्य ज्ञानमात्रके प्रति
प्रतिबन्धक है. इसलिये शाब्दज्ञानके प्रतिभी प्रतिबन्धक होसकता है और योग्यता-
ज्ञानके विलम्बसे शाब्दबोधमें विलम्बभी किसी स्थलविशेषमें सिद्ध नहीं है. इस
लिये योग्यताका ज्ञान शाब्दबोधमें कारण नहीं है-इति ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
आकांशां निर्वक्ति, यत्पदेनेत्यादि-
भाषा-‘यत्पदेन’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आकांक्षाको कहतेहैं-
यत्पदेन विना यस्याऽननुभावकता भवेत् ।
आकांक्षा-
भाषा-जिस पदसे बिना जिस पदमें ( अननुभावकता ) शाब्दबोधजननकी
असमर्थता है उस पदकी उस पदके साथ आकांक्षा है.

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०७
येन पदेन विना यत्पदस्यानन्वयानुभावकत्वं तेन पदेन सह तस्या-
कांक्षेत्यर्थः। क्रियापदं विना कारकपदं नान्वयबोधं जनयतीति
तेन तस्याकांक्षा।
भाषा-अर्थात् जिस 'क्रियादि' पदसे विना जिस 'कर्मादिकारक' पदका
अन्वयबोध नहीं होसकता उस क्रियापदके साथ उस 'कारक' पदकी आकांक्षा है.
क्रियापदसे विना केवल 'कारक' पद अन्वय बोधका जनक नहीं होता. इसलिये
'क्रिया'पदके साथ 'कारक' पदकी आकांक्षा है.
वस्तुतस्तु क्रियाकारकपदानां सन्निधानमासत्त्या चरितार्थम्।
परंतु घटकर्मताबोधं प्रति घटपदोत्तरद्वितीयाकांक्षाज्ञानं कार-
णम्, तेन घटः कर्मत्वमानयनं कृतिरित्यादौ न शाब्दबोधः।
भाषा-और वास्तवसे तो क्रियाकारकादिपदोंकी अव्यवधानरूपसे सन्निधि .
अंशका लाभ पूर्वोक्त आसत्तिसेही होचुका है. इसलिये क्रियाकारक पदोंकी
आकांक्षाका पृथक् वर्णन करना उचित नहीं है (परन्तु) तथापि प्रत्ययमें प्रकृति
उत्तरत्वरूप आकांक्षाज्ञान आसत्तिसे पृथक्रूपेण शाब्दबोधमें कारण है; इसलिये
आकांक्षा ज्ञानभी पृथक् कारण है. जैसे घटनिष्ठ कर्मताबोधके प्रति 'घट' पदके
अव्यवहित उत्तर (अमादि) द्वितीयाविभक्तिरूप आकांक्षाका ज्ञान शाब्दबोधमें कारण
है एवं 'घटः कर्मत्वं आनयनं कृतिः' इत्यादि विपरीत वाक्यस्थलोंमें “घटमा-
नय” इत्यादि साकांक्षवाक्यके सदृश शाब्दबोध नहीं होसकता.
'अयमेति पुत्रो राज्ञः पुरुषोऽपसार्यताम्'इत्यादौ तु पुत्रेण सह
राजपदस्य तात्पर्यग्रहात्तेनैवं सहान्वयबोधः। पुरुषेण सह ता-
त्पर्यग्रहे तु तेन सहान्वयबोधः स्यादेव।
भाषा-एवं“अयमेति पुत्रो राज्ञः पुरुषोऽपसार्यताम्” इत्यादि उभयाकांक्षावाक्य
स्थलमें वक्ताके तात्पर्यज्ञानानुरोधसे शाब्दबोध होता है. भाव यह कि-यहां
'राज'पद उत्तरसम्बन्धविशेषकी बोधिका षष्ठीविभक्ति राजपदार्थका पुत्र तथा पुरुष
दोनोंमें अन्वयबोधन करतीहै. यदि पुत्रके साथ अन्वयमें वक्ताका तात्पर्य होय तो
वाक्यार्थ यह होगा कि-'यह राजाका पुत्र आताहै, आगेसे जनसमुदायको कनारे
करो' और यदि पुरुषके साथ अन्वयमें वक्ताका तात्पर्य होय तो वाक्यार्थ यह होगा
कि-राजाका पुरुष आताहै आगेसे अपने पुत्रको कनारे करो. एवं 'पुत्र'पदके साथ