न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
आसत्तियोग्यताकांक्षा तात्पर्यज्ञानमिष्यते ॥८२ ॥
कारणं -
भाषा-आसत्ति, योग्यता, आकांक्षा और तात्पर्यज्ञान ये चार शाब्दबोधमें
कारण हैं ॥ ८२ ॥
आसत्तिरित्यादि । आसत्तिज्ञानं योग्यताज्ञानमाकांक्षाज्ञानं
तात्पर्यज्ञानं च शाब्दबोधे कारणम् ॥
भाषा-अर्थात् आसत्तिका ज्ञान योग्यताका ज्ञान आकांक्षाका ज्ञान और वक्ताके
तात्पर्यका ज्ञान ये चार ज्ञान शब्दमात्रके शाब्दबोधमें कारण हैं.
तत्रासत्तिपदार्थमाह, सन्निधानं त्विति-
भाषा-उनमें ' सन्निधानन्तु ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आसत्तिपदार्थको
कहते हैं.
-सन्निधानं तु पदस्यासत्तिरुच्यते ।
भाषा-पदोंकी परस्पर ( सन्निधि ) समीपताका नाम 'आसत्तिः' है.
यत्पदार्थस्य यत्पदार्थेनान्वयोऽपेक्षितस्तयोरव्यवधानेनोपस्थि-
तिः कारणम् । तेन 'गिरिर्भुक्तमग्निमान् देवदत्तेन' इत्यादौ न
शाब्दबोधः ।
भाषा-जिस पदार्थका जिस पदार्थके साथ अन्वय अपेक्षित होय उन दोनोंकी
पदोंद्वारा (अव्यवधानेन) अव्यवहितरूपसे उपस्थापितिभी शाब्दबोधमें कारण है. इसलिये
“गिरिर्भुक्तं अग्निमान् देवदत्तेन” इत्यादि वाक्योंसे शाब्दबोध नहीं होताहै; क्योंकि
यहां गिरिपदार्थ तथा भुक्तपदार्थका परस्पर अन्वयबोध वक्ताके तात्पर्यका विषय नहीं
है.किन्तु गिरिपदार्थ तथा अग्निमान् पदार्थका परस्पर अन्वयबोध वक्ताके तात्पर्यका
विषय है परन्तु वे दोनों परस्पर अव्यवहित नहीं हैं .एवं ऐसे स्थलमें आसत्तिके न
होनेसे शाब्दबोधभी नहींहोता.
'नीलो घटो द्रव्यं पटः' इत्यादावासत्तिभ्रमाच्छाब्दबोधः । आस-
त्तिभ्रमाच्छाब्दभ्रमाभावेऽपि न क्षतिः।
भाषा-एवं जहां “नीलो घटो द्रव्यं पटः” इत्यादि वाक्यस्थलमें नीलपदार्थ
तथा पटपदार्थके परस्पर अन्वयबोधमें वक्ताका तात्पर्य है;वहां 'नील'पदकी तथा 'घट'
पदकीभी परस्पर आसत्ति नहींहै.भाव यह कि-वक्ताके तात्पर्यविशिष्ट पदोंकी परस्पर