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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 350 में से

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पृष्ठ 229

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०५
भाषा-( इदन्तु बोध्यम् ) इतना यहां औरभी विशेष जानना उचित है कि--
जहां वक्ताने ' द्वारं ' इतना मात्र कहा है, वहां ( पिधेहि ) अर्थात् 'बन्द करो'
इत्यादि पदके ज्ञानहीसे शाब्दबोध होता है किन्तु द्वारके ( पिधान ) निरोधनादिरूप
अर्थज्ञानसे शाब्दबोध नहीं होता;क्योंकि 'तत्तत्' पदजन्य 'तत्तत्' पदार्थ उपस्थितिको
तत्तत् शाब्दबोधमें हेतुता निश्चित है. ( किञ्च ) क्रियाकर्मादि पदोंकी उस उस विशेष
रूपहीसे परस्पर आकांक्षा देखनेमें आतीहै किन्तु " द्वारं कर्मत्वं, पिधानं कृतिः "
इत्याकारक विपरीत वाक्य योजनासे द्वारकर्मक पिधानात्मकान्वयबोध नहीं
होसकता एवं प्रकृतमेंभी ' पिधेहि ' इस क्रियापदके बिना केवल 'द्वारं ' इस
पदसे शाब्दबोध होना दुर्घट है.
तथा पुष्पेभ्य इत्यादौ स्पृहयतीति पदाध्याहारं विना चतुर्थ्यनु-
पपत्तेः पदाध्याहार आवश्यकः ।
भाषा-ऐसेही यदि ' स्पृहयति ' इत्यादि क्रियापदका अध्याहार न कियाजाय
तो 'पुष्पेभ्यः ' इत्यादि कर्मपदोंमें चतुर्थीविभक्तिका होनाभी दुर्घट है अर्थात्
'स्पृहेरीप्सितः । १ । ४ । ३६ । " इस अनुशासनसे कर्मत्वार्थक चतुर्थीका 'स्पृह-
यति ' आदिके योगहीसे विधान कियाहै; इसलिये हरएक साकांक्षित स्थलमें पदका
अध्याहार अवश्य करना चाहिये.
योग्यतां निर्वक्ति, पदार्थ इत्यादिना-
भाषा-'पदार्थे' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार योग्यताका निरूपण करताहै-
पदार्थे तत्र तद्वत्ता योग्यता परिकीर्तिता ॥८३॥
भाषा-एक पदार्थमें अपर पदार्थवत्ताका नाम योग्यता कहा है ॥ ८३ ॥
एकपदार्थेऽपरपदार्थसम्बन्धो योग्यतेत्यर्थः। तज्ज्ञानाभावाच्च 'व-
ह्निना सिञ्चति'इत्यादौ न शाब्दबोधः ।
भाषा-अर्थात् एक पदार्थमें अपरपदार्थके सम्बन्धविशेषका नाम योग्यता है.
उस योग्यताका ज्ञान जहां " वह्निना सिञ्चति " इत्यादि वाक्योंमें नहीं होता वहां
शाब्दबोधभी नहीं होता अर्थात् सेचनक्रियाकी जलमें योग्यता है वह्निमें नहीं;
इसलिये यहां शाब्दबोध नहीं होता.
नन्वेतस्या योग्यताया ज्ञानं शाब्दबोधात्प्राक् सर्वत्र न सम्भव-
ति वाक्यार्थस्यापूर्वत्वादिति चेत् । न । तत्तत्पदार्थस्मरणे सति