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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 350 में से

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पृष्ठ 227

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०३
सन्निधिका नाम 'आसत्ति' है. प्रकृतमें वक्ताका तात्पर्य तो 'नील' पदार्थका 'पट' पदार्थके
साथ अन्वयबोधका है और पदोंका परस्पर सन्निधान 'नील' पदका 'घट' पदके साथ
है;वह सन्निधान वक्तृतातपर्यशून्य होनेसे आसत्ति नहीं कहासकता, परंतु ऐसे स्थलमें
‘ नीलाभिन्नो घटः ” इत्यादि शाब्दबोध श्रोताको होताहै, वह केवल आसत्तिके
भ्रमसे समझना चाहिये. आसत्तिके भ्रमसे शाब्दबोधमें भ्रम नाभी होय तो हानि नहींहैः
ननु यत्र 'छत्री कुण्डली वासस्वी देवदत्तः' इत्युक्तं तत्रोत्तरपद-
स्मरणेन पूर्वपदस्मरणस्य नाशादव्यवधानेन तत्तत्पदस्मरणास-
म्भव इति चेत् । न। प्रत्येकपदानुभवजन्यसंस्कारैश्चरमस्य ता-
वत्पदविषयकस्मरणस्याव्यवधानेनोत्पत्तेः ।
शंका—आपने अव्यवधानसे पदोंकी उपस्थिति शाब्दबोधमें कारण कही;परन्तु
जहां “छत्री कुण्डली वासस्वी देवदत्तः ” इत्याकारक अनेकपदघटित वाक्य
वक्ताने कहाहै वहां ( २७ वी कारिका ) की व्याख्यामें प्रोक्त आपके “ योग्य
विभुविशेषगुणानां स्वोत्तरवर्त्तिगुणनाश्यत्वात् ” इस सिद्धान्तानुसार उत्तरपदके स्मर-
णसे पूर्वपदके स्मरणका नाश होनेसे अव्यवधानरूपसे उत्तरपदके स्मरणका असम्भव-
है. समाधान—हरएक पदके अनुभवसे उत्पन्न हुए संस्कारोंसे अन्तमें होनेवाले पद-
विषयक स्मरणका अव्यवधानसे होना सम्भव है.
नानासन्निकर्षैरेकप्रत्यक्षस्येव नानासंस्कारैरेकस्मरणोत्पत्तेरपि
सम्भवात् । तावत्पदसंस्कारसहितचरमवर्णज्ञानस्योद्बोधकत्वा-
त् । कथमन््यथा नानावर्णैरेकपदस्मरणम् ।
भाषा—जैसे एकही कालमें घटचक्षुःसंयोग तथा पटचक्षुःसंयोगरूप नाना
सन्निकर्षोंसे “ इमौ घटपटौ ” इत्याकारक एकही प्रत्यक्ष होता है; वैसेही नाना
संस्कारोंसे एक स्मरणकी उत्पत्तिभी होसकती है; इसमें कोई बाधक नहीं है. पूर्व-
पदोंके संस्कारसहित जो अन्तिम वर्णका ज्ञान वही उस स्मरणमें उद्बोधक है. यदि
नानासंस्कारोंको एक स्मरणजनकता न मानी जाय तो ( कथमन््यथा ) नानावर्णोंके
प्रत्येक संस्कारोंसे नानावर्णगोचर एकपदका स्मरणभी कैसे होगा? अर्थात् नहीं होना
चाहिये. एवं ऐसे माननेसे सर्वत्र शाब्दबोधकी अनुपपत्ति होगी; इसलिये हरएक
स्थलमें पदजन्य पदार्थोंपस्थिति समूहालम्बनात्मकही शाब्दबोधमात्रमें कारण
माननी उचित है.
परंतु तावत्पदार्थानां स्मरणादेकदैव खले कपोतन्यायात् तावत्प-