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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 350 में से

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पृष्ठ 218

१९४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ श० -
भाषा-( इदन्तु बोध्यम् ) यहभी यहां जानने योग्य है कि-शक्यार्थ प्रवाहका
सम्बन्ध यदि तीरत्वेन रूपेण तीरके साथ ग्रहण हुआ है तो शाब्दबोधभी तीरत्वेन
रूपेण तीरहीका होगा और यदि गंगातीरत्वेन रूपेण तीरका सम्बन्ध गृहीत हुआहै
तो शाब्दबोधभी गंगातीरत्वेन रूपेणही होगा.
अत एव लक्ष्यतावच्छेदके न लक्षणा, तत्प्रकारकबोधस्य तत्र
लक्षणां विनाऽप्युपपत्तेः । परं त्वेवं क्रमेण शक्यतावच्छेदकेऽपि
शक्तिर्न स्यात्, तत्प्रकारक शक्यार्थस्मरणं प्रति तत्पदस्य साम-
र्थ्यमित्यस्य सुवचत्वादिति विभावनीयम् ।
भाषा-( अतएव ) तद्धर्मविशिष्टमें लक्षणा ग्रहणको तिसी रूपसे पदार्थउप-
स्थिति तथा शाब्दबोधके प्रति हेतुता होनेहीसे लक्षतावच्छेदकतीरत्वादि धर्मोंमेंभी
लक्षणा माननेका कुछ काम नहीं; क्योंकि तीरत्वादि धर्मप्रकारक तीरविशेष्यक बोध
लक्षणासे विनाभी ऐसे स्थलमें उत्पन्न होसकताहै; परन्तु इसी क्रमसे शक्यतावच्छे-
दकमेंभी शक्ति नहीं माननी चाहिये; क्योंकि लक्षणास्थलकी तरह यहांभी “ तत्
घटत्वादिप्रकारक शब्दार्थ घटादिस्मरणके प्रति ( तत् ) घटादिपदका सामर्थ्य है ”
इत्याकारक नियम सुवच होसकताहै, परन्तु आचार्य्यलोगोंने लक्षतावच्छेदकमें
लक्षणाको नहीं माना और शक्यतावच्छेदकमें शक्तिको मानाहै इसका क्या कारण
है ? ( इति विभावनीयम् ) यह वार्ता विद्वान् लोगोंको विचारणीय है. जहत्स्वार्थल
क्षणाहीका भेद एक लक्षितलक्षणानामसे प्रसिद्ध है.
यत्र तु शक्यार्थस्य परम्परासम्बन्धरूपा लक्षणा सा लक्षितलक्ष-
णेत्युच्यते । यथा द्विरेफादिपदे रेफद्वयसम्बन्धो भ्रमरपदे ज्ञायते
भ्रमरपदस्य च सम्बन्धो भ्रमरे ज्ञायते तत्र लक्षितलक्षणा ।
भाषा-जिस स्थलमें शक्यार्थका परंपरासम्बन्धरूपा लक्षणा है वह लक्षितल-
क्षणा कही जातीहै. जैसे “ द्विरेफो रौति ” इस स्थलमें द्विरेफादि पदमें रेफद्वयका
सम्बन्ध ‘ भ्रमर ’ इस पदमें जाना जाताहै और ‘ भ्रमर ’ पदका सम्बन्ध ( भ्रमर )
मधुपजन्तुमें जाना जाताहै; ऐसे स्थलमें लक्षितलक्षणा होतीहै. “ द्विरेफो रौति ”
इत्यादि स्थलमें ‘ स्ववाच्यरेफद्वयघटितपदवाच्यत्व ’ आदिरूप परम्परासम्बन्ध है.
किंतु लाक्षणिकं पदं नानुभावकं लाक्षणिकार्थस्य शाब्दबोधे
तु पदान्तरं कारणम्, शक्तिलक्षणान्यतरसम्बन्धेनेतरपदार्थान्वि-