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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 350 में से

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पृष्ठ 223

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २९९
न च नीलघटयोरभेद इत्यादौ कथमिति वाच्यम् । तत्र नीलप-
दस्य नीलत्वे घटपदस्य घटत्वे लक्षणा, अभेद इत्यस्य चाश्रया-
भेद इत्यर्थात् । समाहारद्वन्द्वे तु यदि समाहारोऽप्यनुभूयत इ-
त्युच्यते तदाऽहिनकुलमित्यादौ परपदेऽहिनकुलसमाहारे लक्ष-
णा पूर्वपदं तात्पर्यग्राहकम् ।
शंका-“नीलो घटः-इत्यत्र नीलघटयोरभेदः” इत्यादिवाक्यस्थलमें “नील-
घटयोः” यह द्वन्द्व कैसे हुआ? अर्थात् यह वाक्य असंगतभी नहीं और समासभी
“नीलश्च घटश्च नीलघटौ, तयोः नीलघटयोः ‘नीलो घटः’ इत्यत्राभेदः” यही
मानना होगा, फिर वास्तवसे पदार्थद्वयभेदस्थलमें द्वन्द्व होताहै यह नियम आपका
कहां रहा? समाधान-ऐसे स्थलमें ‘नील’ पदकी नीलत्वमें तथा ‘घट’ पदकी घटत्वमें
लक्षणा मानकर द्वन्द्व हुआ है और ‘अभेद’ यह शब्द आश्रयाभेदका बोधक है
अर्थात् ‘नीलत्वघटत्वाश्रययोरभेदः” यह वाक्यार्थ हुआ. एवं समाहारद्वन्द्व स्थलमें
यदि किसी विद्वान्को (समाहार) समुच्चयका अनुभवभी होता होय तो “अहिन-
कुलम्’ इत्यादि वाक्योंमें (पर) नकुलादिपदोंकी अहिनकुलसमाहारमें लक्षणा
माननी और (पूर्व) अहिआदि पदको पूर्वोक्त रीतिसे तात्पर्यका ग्राहक जानना
उचित है.
न च भेरीमृदंगं वादयेत्यत्र कथं समाहारस्यान्वयः, अपेक्षाबुद्धि-
विशेषरूपस्य तस्य वादनासम्भवादिति वाच्यम् । परम्परास-
म्बन्धेन तदन्वयात् ।
शंका-“भेरीमृदङ्गं वादय” इत्यादि स्थलमें समाहारका वादन क्रियामें
अन्वय कैसे होगा? क्योंकि अनेक पदार्थोंमें एकत्वावगाहन करनेवाली अपेक्षा बुद्धिही
विशेषरूप समाहारका वादन नहीं बनसकता. भाव यह कि-अभिघाताख्य संयोगा-
वच्छिन्नक्रिया वादनपदार्थ है. सो उसका अपेक्षाबुद्धिविशेषरूप समाहारमें होनाही
असम्भव है. समाधान-ऐसे स्थलमें ‘स्वाश्रयवृत्तित्व’ रूप परम्परासम्बन्ध
मानके वादनक्रियाका समाहारमें अन्वय है. यहां ‘स्व’ शब्दसे अपेक्षाबुद्धिविशे-
षरूप समाहार, उसका आश्रयविषयतासम्बन्धसे भेरीमृदङ्गादि तद्वृत्तित्व वादन-
रूपा क्रियाको इति एतादृशपरम्परासम्बन्धसे अन्वय होसकताहै.
एवं पञ्चमूलीत्यादावपि । परे त्वहिनकुलमित्यादावहिश्च नकुलश्च
बुध्यते प्रत्येकमेकत्वान्वयः, समाहारसंज्ञा च यत्रैकत्वं नपुं-