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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 350 में से

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पृष्ठ 230

२०६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली-- [ शब्द-
क्वचित्संशयरूपस्य क्वचिन्निश्चयरूपस्यापि योग्यताया ज्ञानस्य
सम्भवात् ।
शंका-हरएकस्थलमें वाक्यार्थबोध अपूर्वही होता है; परन्तु योग्यताके प्रथम
कारणता माननेमें शाब्दबोधमें वह अपूर्वता नहीं रहती. इसलिये योग्यताज्ञानको
शाब्दबोधके पहले हरएक स्थलमें कारण माननेका कुछ काम नहीं है. समाधान-
हरएकस्थलमें 'तत्तत्'पदजन्य 'तत्तत्' पदार्थके स्मरण होनेसे योग्यताका ज्ञान कहीं
संशयरूपसे और कहीं निश्चयरूपसे शाब्दबोधके पूर्व अवश्य विद्यमान रहता है.
नव्यास्तु योग्यताया ज्ञानं न शाब्दज्ञाने कारणम्, 'वह्निना सिञ्च-
ति' इत्यादौ सेके वह्निकरणकत्वाभावरूपाऽयोग्यता(निश्चयेन
प्रतिबन्धान्न शाब्दबोधः। तदभावनिश्चयस्य लौकिकसन्निकर्षज-
न्यदोषविशेषाजन्यज्ञानमात्रे प्रतिबन्धकत्वाच्छाब्दबोधं प्रत्यपि
प्रतिबन्धकत्वं सिद्धम् । योग्यताज्ञानविलम्बाच्च शाब्दबोध-
विलम्बोऽसिद्ध इति वदन्ति ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
भाषा-और नवीनलोग तो यह कहतेहैं कि- योग्यताका “ ज्ञान शाब्दबोधमें
कारणही नहीं है. “वह्निना सिञ्चति” इत्यादि स्थलमें सेचनक्रियामें वह्निकरण-
त्वाभावरूप अर्थात् सेचनरूपा क्रिया वह्निसे नहीं होसकती इत्याकारक जो अयो-
ग्यताका निश्चय एतादृश निश्चयको विपरीत शाब्दबोधके प्रति प्रतिबन्धकता है;
क्योंकि पूर्वबाधस्थल उक्तरीतिसे अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित तद्धर्मिक
तदभावका निश्चय लौकिकसन्निकर्षाजन्य तथा दोषविशेषाजन्य ज्ञानमात्रके प्रति
प्रतिबन्धक है. इसलिये शाब्दज्ञानके प्रतिभी प्रतिबन्धक होसकता है और योग्यता-
ज्ञानके विलम्बसे शाब्दबोधमें विलम्बभी किसी स्थलविशेषमें सिद्ध नहीं है. इस
लिये योग्यताका ज्ञान शाब्दबोधमें कारण नहीं है-इति ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
आकांशां निर्वक्ति, यत्पदेनेत्यादि-
भाषा-‘यत्पदेन’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आकांक्षाको कहतेहैं-
यत्पदेन विना यस्याऽननुभावकता भवेत् ।
आकांक्षा-
भाषा-जिस पदसे बिना जिस पदमें ( अननुभावकता ) शाब्दबोधजननकी
असमर्थता है उस पदकी उस पदके साथ आकांक्षा है.