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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 350 में से

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पृष्ठ 216

१९२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
लक्षणा शक्यसम्बन्धस्तात्पर्यानुपपत्तितः ॥ ८२ ॥
भाषा-शक्यके सम्बन्धविशेषका नाम लक्षणा है और तात्पर्यानुपपत्ति लक्ष-
णमें बीज है ॥ ८२ ॥
लक्षणा शक्यसम्बन्धः इत्यादि । गङ्गायां घोष इत्यादौ गङ्गाप-
दस्य शक्यार्थे प्रवाहरूपे घोषस्यान्वयानुपपत्तिस्तात्पर्यानुपप-
त्तिर्वा यत्र प्रतिसन्धीयते तत्र लक्षणया तीरस्य बोधः ।
भाषा-“जहत्स्वार्था अजहत्स्वार्था भेदसे लक्षणा दो प्रकारकी है. उसमें प्रथम
कहतेहैं-“ गंगायां घोषः” इत्यादि वाक्यस्थलमें गंगापदके शक्यार्थ प्रवाहमें
(घोष) पदार्थ गोपालग्रामका अन्वय नहीं होसकता और घोष पदार्थ गोपाल
ग्रामका गंगापदके शक्यार्थ प्रवाहमें अन्वय करनेसे वक्ताका तात्पर्य्यभी नहीं बन
सकता; क्योंकि जलप्रवाहमें गोपालग्रामकी स्थितिकाही असम्भव है; इसलिये
“ गंगायां घोषः” इस वाक्यमें 'गंगा' पद स्वशक्यार्थ प्रवाहके तीरमें लाक्षणिक
है. परम्परा सम्बन्धसे स्वार्थबोधन करनेवाला पद लाक्षणिक होता है प्रकृतमें
स्वशक्य संयोगरूप 'गंगा' पदका तीरसे परम्परासम्बन्ध है; इसलिये 'गंगा'
पद लाक्षणिक है. ऐसे स्थलमें लक्षणावृत्तिहीसे तीरका बोध होता है.
सा च शक्यसम्बन्धरूपाः। तथाहि। प्रवाहरूपशक्यार्थसम्बन्धस्य
तीरे गृहीतत्वात्तीरस्य स्मरणं, ततः शाब्दबोधः । परंतु यद्य-
न्वयानुपपत्तिर्लक्षणाबीजं स्यात्तदा यष्टीः प्रवेशयेत्यत्र लक्षणा न
स्यात्, यष्टिषु प्रवेशान्वयस्यानुपपत्तेरभावात् , तत्र च यष्टिप्र-
वेशे भोजनतात्पर्यानुपपत्त्या यष्टिधरेषु लक्षणा ।
भाषा-वह लक्षणा शक्यका सम्बन्धरूप होती है. (तथाहि) वह ऐसे है कि-
प्रवाहरूप जो शक्यार्थ उसका संयोगसम्बन्ध तीरके साथ गृहीतही एव है. 'गंगा'
पदसे गंगातीरका स्मरण हुआ. तदनन्तर 'गंगातीरे घोषः' यह शाब्दबोध हुआ
परन्तु हरएक स्थलमें यदि अन्वयानुपपत्तिही लक्षणाका बीज मान लिया जाय
तो 'यष्टीः प्रवेशय' इत्यादि स्थलमें लक्षणा नहीं होनी चाहिये; क्योंकि (यष्टि)
लाठियोंमें प्रवेशरूप अन्वयकी अनुपपत्ति नहीं है अर्थात् केवल लाठियोंका प्रवेशभी
गृहमें बनसकता है परन्तु कहनेवालेने भोजनके तात्पर्य्यसे यष्टियोंके प्रवेशकी आज्ञा
करी है. एवं केवल लाठियोंके प्रवेशसे भोजनरूप तात्पर्य्यकी अनुपपत्ति होनेसे