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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 350 में से

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पृष्ठ 215

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९१
( कुमुद ) श्वेतउत्पलमें प्रयोग मान लिया जाय तो हानि क्या है ? समाधान-
ऐसे स्थलमें प्राचीन लोग रूढिज्ञानको केवल यौगिकार्थज्ञानके प्रति प्रतिबन्धक
मानतेहैं; इसलिये अवयवशक्तिसे 'पंकज' पदका श्वेतोत्पलमें प्रयोग मानना उचित नहीं.
वस्तुतस्तु समुदायशक्त्योपस्थितपद्मेऽवयवार्थपङ्कजनिकर्तु-
रन्वयो भवति सान्निध्यात्। यत्र रूढ्यर्थस्य बाधः प्रतिसन्धीयते
तत्र लक्षणया कुमुदादेर्बोधः, यत्र तु कुमुदत्वेन रूपेण बोधे न
तात्पर्यज्ञानं पद्मत्वस्य च बाधस्तत्रावयवशक्तमात्रेण निर्वाह
इत्यप्याहुः। यत्र तु स्थलपद्मादावयवार्थबाधस्तत्र समुदा-
यशक्त्या पद्मत्वेन रूपेण बोधः । यदि तु स्थलपङ्कजं वि-
जातीयमेव तदा लक्षणैव । ३ ।
भाषा-और वास्तवमें तो यह वार्ता है कि-समुदायशक्तिद्वारा उपस्थित हुए
पद्ममें अवयवार्थ पंकसे उत्पन्न होनेवालेका सान्निध्यसे अन्वय होता है. भाव यह
कि- अवयवशक्तिसेभी प्रथम समुदायशक्तिद्वारा उपस्थितवस्तुहीका लाभ होता है
और जिस स्थलमें रूढिशक्तिसे अर्थका बाध प्रतीत होवे अर्थात् अर्थ न बन सके
वहां लक्षणावृत्तिसे कुमुदादि बोधमेंही वक्ताका तात्पर्य जानना उचित है और
जहां कुमुदत्वेन रूपेण कुमुदके बोधमें वक्ताका तात्पर्य ज्ञान नहीं है और पद्मत्वेन
रूपेण पद्मका जहां बाध प्रतीत होरहाहै वहां केवल अवयवशक्ति मात्रहीसे निर्वाह
करना उचित है. ऐसेभी कहतेहैं जहां कहीं ( स्थल ) सूकीभूमिमें उत्पन्न हुए पद्म
आदिमें 'पङ्कज' शब्दके अवयवार्थका बाध प्रतीत हो वहां समुदायशक्तिहीसे पद्म-
त्वेन रूपेण पद्मका बोध होताहै और यदि स्थलमें होनेवाला पद्म जलमें उत्पन्न
हुए पद्मसे विलक्षण अभिमत होय तौ उसमें ' पङ्कज ' पदकी लक्षणाही माननी
उचित है ३।
यत्रावयवार्थरूढ्यर्थयोः स्वातन्त्र्येण बोधस्तद्यौगिकरूढम्,
यथोद्भिदादिपदम् । तत्र हि उद्भेदनकर्ता तरुगुल्मादिरपि बु-
ध्यते यागविशेषोऽपीति । ४ ।
भाषा-एवं जिससे अवयवार्थका तथा रूढ्यर्थका स्वतन्त्ररूपसे बोध हो अर्थात्
वस्तुविशेषको अवयवशक्तिसे तथा अन्यवस्तुविशेषको समुदायशक्तिसे बोधन करै
वह पद ' यौगिकरूढ ' है; ऐसे उद्भिद आदि पद हैं. यह ' उद्भिद ' पद “ ऊर्द्धं
भिन्नत्ति इति उद्भिद् ” इस व्युत्पत्तिसे अवयवशक्तिद्वारा ( तरुगुल्म ) वृक्षलतादि
का बोधक है और समुदायशक्तिसे उद्भिद नामक यागकाभी बोधक है-इति ४ ।