न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९७
पटो न घट इत्यादौ घटपटाभ्यां नञः साक्षादेवान्वयान्निपाता-
तिरिक्तेति नीलो घट इत्यादौ नामार्थयोरभेदसम्बन्धेनान्वया-
द्भेदेनेति ।
भाषा-“घटो न पटः” इत्यादि स्थलमें घटपटके साथ नञ् अर्थभेदका साक्षात् ही
अन्वय होताहै अर्थात् किसीप्रत्ययार्थके द्वारा नहीं होता; इसलिये नियममें निपाता-
तिरिक्त कहा. नञ् निपात है, इसीसे इसके योगसे भेदेन अन्वयबोध होसकताहै. परन्तु
निपातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंका भेदसम्बन्धसे अन्वयबोध नहीं होसकता “नीलो
घटः ” इत्यादि स्थलोंमें नामार्थनामार्थोंका अभेदसम्बन्धसे अन्वय होताहै; इसलिये
नियममें भेदेन कहा अर्थात् निपातातिरिक्त नामार्थनामार्थका अभेदेन अन्वयबोध तो
सिद्धही है परन्तु भेदसम्बन्धसे अन्वयबोध अव्युत्पन्न है “एवं राजपुरुषः” इत्यादि-
स्थलमेंभी निपातातिरिक्त नामार्थोंकी उपस्थिति होती है. यहांभी भेदेन अन्वयबोध
नहीं होसकेगा और अभेदेन विवक्षित नहींहै इसलिये कोई उपायान्तर सोचना चाहिये.
न च राजपुरुष इत्यादौ लुप्तविभक्तेः स्मरणं कल्प्यमिति वाच्य-
म् । अस्मृतविभक्तेरपि ततो बोधोदयात् । तस्माद्राजपदादौ
राजसम्बन्धिनि लक्षणा, तस्य च पुरुषेण सहाभेदान्वयः ।
द्वन्द्वे तु धवखदिरौ छिन्धीत्यादौ धवः खदिरश्च विभक्त्यर्थद्वि-
त्वप्रकारेण बुध्यते तत्र न लक्षणा ।
शंका-“राजपुरुषः” इत्यादिस्थलमें राजपदोत्तरवर्त्ति लुप्त हुई षष्ठीविभक्तिके
स्मरणकी कल्पना कर उस विभक्तिके सम्बन्धादि अर्थद्वाराही राजाका तथा पुरुषका
परस्पर अन्वय होगा इसलिये पूर्वोक्त नियमके साथ विरोध नहींहै. समाधान-जिस
पुरुषको विभक्तिका स्मरण नहींभी होता अर्थात् प्रकृतिप्रत्ययानभिज्ञ पुरुषकोभी
(ततो) “राजपुरुषः” इत्यादि वाक्यसे शाब्दबोधका उदय होना अनुभवसिद्ध है.
(तस्मात्) इसलिये‘राजपुरुषः’ इत्यादिस्थलोंमें राजादि पदोंकी राजसम्बन्धिमें लक्षणा
मानके उस सम्बन्धीका पुरुषके साथ अभेदान्वय बोध माननाही उचित है.
“एवं राजसम्बन्ध्यभिन्नः पुरुषः” इत्याकारक शाब्दबोध होगा. एवं “धवखदि-
रौ च्छिन्धि” इत्यादि इतरेतरद्वन्द्वस्थलमें द्वितीयाविभक्तिके द्विवचनार्थ द्वित्वप्रकारसे
धव तथा खदिर दोनोंका बोध होताहै इसलिये वहां लक्षणा माननेकी अवश्य-
कता नहीं है.