न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
सकत्वं च प्राणितूर्येत्यादिसूत्रेणोक्तं तत्रैव, अन्यत्रैकवचनमसाध्वि-
ति इत्याहुः ।
भाषा-एवं “ पञ्चमूली ” इत्यादि द्विगुअर्थसमाहारस्थलमेंभी उत्तरपदकी
समाहारमें लक्षणा तथा पूर्वपदको तात्पर्य ग्राहकत्व मानना उचित है और ( परेतु )
नवीन नैयायिक तो यह मानतेहैं कि-“अहिनकुलम् ” इत्यादि स्थलमें अहि तथा
नकुल दोनोंका बोध होता है किन्तु समाहारका बोध नहीं होता और एकवचन
बोधित एकत्वसंख्याका अहि तथा नकुल प्रत्येकके साथ अन्वय है; इसलिये
‘ अहिनकुलं ’ इत्यादि लक्ष समाहारद्वन्द्वका नहीं है; किन्तु समाहारसंज्ञा वहां होती
है, जहां एकवचनान्तता तथा नपुंसकता “ द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् २ । ४।२।
इत्यादि सूत्रसे बोधित होय. एवं समाहारके उदाहरण “ पाणिपादम् ” इत्यादि
जानने चाहिये. एवं ( अन्यत्र ) समाहारातिरिक्त द्वन्द्वस्थलमें यदि एकवचन होय
तो असाधु जानना चाहिये ( इत्याहुः ) यह सब नवीनोंका कथन है.
पितरौ श्वशुरावित्यादौ पितृपदे जनकदम्पत्योः श्वशुरपदे स्त्री-
जनकदम्पत्योर्लक्षणा । एवमन्यत्रापि । घटा इत्यादौ तु न लक्ष-
णा, घटत्वेन रूपेण नानाघटोपस्थितिसम्भवात् ।
भाषा-एवं “ पितरौ, श्वशुरौ ” इत्यादि एकशेष समासस्थलमें ‘ पितृ ’ पदकी
पुरुषके जनक माता पिता दोनोंमें लक्षणा तथा ‘ श्वशुर ’ पदकी स्त्रीके जनक
माता पिता दोनोंमें लक्षणा है. ऐसेही और स्थलोंमेंभी जानलेना ‘ घटाः ’ इत्यादि
प्रयोगस्थलमें लक्षणया नानाघटकी उपस्थिति नहीं है किन्तु ‘घट’ पदं उच्चारणसे
घटत्वेन रूपेणही नानाघट उपस्थितिका सम्भव होसकता है.
कर्मधारयस्थले तु नीलोत्पलमित्यादावभेदसम्बन्धेन नीलपदार्थ
उत्पलपदार्थे प्रकारः तत्र च न लक्षणा, अत एव निषादस्थपतिं
याजयेदित्यत्र न तत्पुरुषो लक्षणापत्तेः किंतु कर्मधारयो लक्ष-
णाभावात् ।
भाषा-एवं “ नीलोत्पलं ” इत्यादि कर्मधारयसमासस्थलमें नीलपदार्थ उत्प-
लपदार्थमें अभेदसम्बन्धसे प्रकार है. इसलिये यहांभी लक्षणा नहीं है. ( अतएव )
कर्मधारयस्थलमें लक्षणा नहीं है. इसलिये “ निषादस्थपतिं याजयेत ” इत्यादि
श्रुतिवाक्यस्थलमें निषादानां स्थपतिः निषादस्थपतिः ” इत्याकारक तत्पुरुषसमास
का आश्रयण विद्वान् लोगोंने नहीं किया है. क्योंकि तत्पुरुष माननेसे पूर्वोक्त