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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 350 में से

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पृष्ठ 225

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०१
रीतिसे तत्पुरुषस्थलमें लक्षणाभी माननी पड़ेगी और लक्षणा जघन्यवृत्ति है. यदि
प्रकारान्तरसे शक्तिवृत्तिसे निर्वाह होय सके तो लक्षणा माननी उचित नहीं. एवं
“ निषादश्चासौ स्थपतिश्चेति निषादस्थपतिः ” इत्याकारक कर्मधारयसमासही
मानना उचित है; क्योंकि लक्षणा नहीं माननी पड़ती.
न च निषादस्य सङ्करजातिविशेषस्य वेदानधिकाराद्याजनासं-
भव इति वाच्यम्, निषादस्य विद्याप्रयुक्तेस्तत एव कल्पनात् ।
शंका-‘स्थपति’ शब्द स्वामीका वाचक है. एवं इस वाक्यमें कर्मधारयसमास
माननेसे निषादरूप स्थपतिकाही बोध होगा; परन्तु उसका प्रकृतमें उपयोग नहीं
क्योंकि निषादनामक संकरजातिविशेषको “ स्त्रीशूद्रौ नाधीयाताम् ” इस वचनसे
वेदपठनका अधिकार नहीं और अध्ययनविधि सिद्धज्ञानके न होनेसे उसको
याजनभी नहीं बन सकता. इसलिये तत्पुरुषसमासद्वाराही निषादोंके स्वामी किसी
ब्राह्मण या क्षत्रियका ग्रहण करना उचित है. एवं उसको याजनका सम्भव होनेसे
वाक्य सार्थक होसकता है. समाधान–निषादको याजनके लिये यथासम्भव
वेदविद्याप्रयुक्तभी होना चाहिये. इस वार्त्ताकी कल्पनाभी हम ( तत एव ) निषादके
प्रति श्रुतिबोधित याजनानुपपत्तिसेही करसकतेहैं.
लाघवेन मुख्यार्थस्यान्वये तदनुपपत्त्या कल्पनायाः फलमुख-
गौरवत्याऽदोषत्वादिति ।
शंका–निषादको वेदविद्याकी कल्पना करनेमें आपको गौरव होगा.समाधान–
कर्मधारयसमासद्वारा प्रथम मुख्यार्थके साथ अन्वय होनेके पीछे उस अन्वयकी
अनुपपत्तिसें निषादको विद्याकी कल्पना करनी फलमुखगौरव है; इसलिये वह दोष
कर नहीं है.
उपकुम्भमर्द्धपिप्पलीत्यादौ परपदे तत्सम्बन्धिनि लक्षणा पूर्वपदा-
र्थप्रधानतया चान्वयबोध इति । इत्थं च समासे न क्वापि शक्तिः
पदशक्त्यैव निर्वाहादिति ।
भाषा–एवं “ उपकुम्भम्, अर्द्धपिप्पली ” इत्यादि प्रयोगस्थलोंमें कुम्भ-
पिप्पली आदि परपदोंकी कुम्भपिप्पली आदिके सम्बन्धिमें लक्षणा माननी. एवं
“ कुम्भसम्बन्ध्यभिन्नं समीपं ” तथा “ पिप्पलीसम्बन्ध्यभिन्नमर्द्धं ” इत्याकारक
पूर्वपदार्थप्रधान शाब्दबोध ऐसे स्थलोंमें हो सकतेहैं. ( इत्थञ्च ) इस पूर्वोक्त रीतिसे
वैयाकरणोंके अभिमतसमासमें शक्ति कहींभी नहीं बन सकती; क्योंकि हरएकस्थल-
में समासघटकीभूत पदशक्तिलक्षणाहीसे निर्वाह होसकता है–इति ।
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